कहानी : नफ़रत   Leave a comment

(१)

दो पहाड़ियों को सिर्फ़ पुल ही नहीं जोड़ते

खाई भी जोड़ती है

–   गीत चतुर्वेदी

कोई किसी से कितनी नफ़रत कर सकता है? जब नफ़रत ज़्यादा बढ़ जाती है तो आदमी अपने दुश्मन को मरने भी नहीं देता क्योंकि मौत तो दुश्मन को ख़त्म करने का सबसे आसान विकल्प है। शुरू शुरू में जब मेरी नफ़रत इस स्तर तक नहीं पहुँची थी, मैं अक्सर उसकी मृत्यु की कामना करता था। मंगलवार को मैं नियमित रूप से पिताजी के साथ हनुमान मंदिर में प्रसाद चढ़ाने जाता था। प्रसाद पुजारी को देने के बाद पिताजी हाथ जोड़ कर और आँखें बंद करके प्रार्थना करते थे। मैं भी पिताजी को देखकर वैसा ही करता था। अंतर बस इतना था कि वो संभवतः हनुमान चालीसा पढ़ते थे और मैं उस लड़की की मृत्यु की कामना करता था। जैसे जैसे मेरी नफ़रत बढ़ती गई मैं माँगने लगा कि ये मरे नहीं जिन्दा रहे और जैसे ये मेरे हिस्से का मान सम्मान मुझसे छीन लेती है वैसे ही एक दिन मैं इसके हिस्से का मान सम्मान इससे छीन लूँ।

बचपन से ही वो हर चीज में मुझसे आगे थी। वो मेरे पिताजी के दोस्त की बेटी थी। मेरे पिताजी के सामने उनके दोस्त की कोई हैसियत नहीं थी। वो ठेले पर चाट बेचकर अपने परिवार का पेट पालते थे और मेरे पिताजी कस्बे के एकमात्र पेट्रोल पम्प के मालिक थे। मेरे पिताजी कभी कभार उसके पिताजी की मदद भी कर देते थे। हर बात में मेरा परिवार उसके परिवार से आगे था। मेरे पिताजी के दो बेटे थे यानि कि हम दो भाई थे और उसके पिताजी के तीन बेटियाँ थीं। बेटा न होने का ग़म उसके पिताजी को सालता रहता था। मैं भाइयों में सबसे बड़ा था और वो बहनों में। हम दोनों एक ही विद्यालय में और एक ही कक्षा में पढ़ते थे। अंतर बस इतना था कि वो हर बार कक्षा में प्रथम स्थान पर रहती थी और मैं द्वितीय स्थान पर।

कक्षा में अध्यापक जब भी कोई प्रश्न पूछते वो फट से हाथ उठा देती और पटर पटर प्रश्न का उत्तर देने लगती। उसकी बोली मेरे कानों में पिघले शीशे की तरह टपकती। प्रश्न का उत्तर तो मुझे भी पता होता पर मुझे हाथ उठाने में शर्म महसूस होती थी। मैं थोड़ा सा हकलाता था। कुछ एक वर्ण ऐसे थे जो किसी विशेष वर्ण के बाद आ जाएँ तो मै कितनी भी कोशिस करूँ उनका उच्चारण नहीं कर पाता था। शुरू में एक दो बार मैंने भी हाथ उठाया था। मगर हकलाने के कारण मुझे इतनी शर्मिन्दगी झेलनी पड़ी कि फिर मैंने हाथ उठाना ही बन्द कर दिया।

वो न होती तो निःसंदेह मैं नम्बर वन होता। अध्यापकों को मेरे हकलाने के बावजूद उत्तर सुनना पड़ता क्योंकि शहर से दस किलोमीटर दूर बसे इस छोटे से कस्बे के इस छोटे से विद्यालय में पढ़ने वाले विद्यार्थी पढ़ने में कम और बाकी सारी बातों में ज़्यादा रुचि लेते थे। उन्हें कोई उत्तर याद हो इस बात का तो प्रश्न ही नहीं उठता था। वो न होती तो शायद अध्यापक मेरी मदद करते और तब कक्षा के अन्य कामचोर विद्यार्थी मेरे हकलाने पर मेरा मज़ाक न उड़ाते। वो न होती तो मेरी जिन्दगी कितनी आसान और शानदार होती।

(२)

मुझे तब कुछ राहत मिली जब छठी कक्षा में मैंने राजकीय इण्टर कालेज में प्रवेश लिया। इस कालेज में केवल लड़के ही पढ़ते थे। वो गई राजकीय महिला इण्टर कालेज में। छठवीं से आठवीं कक्षा तक मुझे राहत रही। मैंने इन तीनों कक्षाओं में प्रथम स्थान प्राप्त किया और अध्यापकों का चहेता बना रहा। लेकिन मेरी बदकिस्मती अगर इतनी आसानी से मेरा पीछा छोड़ देती तो बात ही क्या थी। नवीं कक्षा में फिर मुझे उसी समस्या से दो चार होना पड़ा। इस छोटे से शहर में भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, गणित और अंग्रेजी के अच्छे शिक्षक उँगलियों पर गिने जा सकते थे। उनमें से कुछ तो वही थे जो मेरे विद्यालय के अध्यापक थे। ये अध्यापक विद्यालय में कम और अपने घर पर कोचिंग में ज़्यादा पढ़ाया करते थे। इसलिए जिन विद्यार्थियों को पढ़ने में रुचि थी वो इन चारों विषयों की कोचिंग पढ़ा करते थे। मैंने भी इन चारों विषयों की कोचिंग पढ़ने का निर्णय लिया। सबसे पहले मैंने भौतिक विज्ञान पढ़ने का निश्चय किया। भौतिकी में मेरी रुचि थी इसलिए मैं चाहता था कि सुबह ताज़े दिमाग़ से मैं भौतिक विज्ञान पढ़ूँ। मैंने निर्णय लिया कि सुबह सात से आठ के बैच में मैं भौतिक विज्ञान पढ़ूँगा।

यहाँ से फिर वही समस्या पैदा हुई। उसके पिता ने भी उसे उन्हीं अध्यापकों के पास, उसी समय भेजा जब मैं पढ़ने जाता था। उन्होंने संभवतः उसकी सुरक्षा के लिहाज़ से ऐसा किया होगा कि मैं साथ रहूँगा तो वो चिन्ता से मुक्त रहेंगे। लेकिन मेरे लिए वो जी का जंजाल बन गई। अब तो सारे अध्यापक विद्यालय में भी मुझसे ज़्यादा तारीफ़ उसी की करते थे और कहते थे कि वो दसवीं में जिले भर में सबसे ज़्यादा नम्बर लाकर उनका नाम रोशन कर सकती है। हो सकता है उसका नाम बोर्ड की मेरिट लिस्ट में भी रहे। ये सुनकर मेरा रोम रोम जल उठता था।

जैसा अध्यापक सोच रहे थे वैसा ही हुआ। जब परीक्षा परिणाम घोषित हुए तो उसका नाम बोर्ड की मेरिट लिस्ट में पन्द्रहवें स्थान पर था। मैं उससे केवल पन्द्रह नम्बर पीछे था लेकिन मेरिट लिस्ट से बाहर होने के लिए इतने नम्बर बहुत होते हैं। घर वालों और मुहल्ले वालों से जो सम्मान मुझे मिलना चाहिए था वो सारा उसको मिल गया। जब दो लाइनें आस पास खींची हुई हों तो छोटी लाइन को कौन देखता है। यही दुनिया की रीति है। दूसरे, तीसरे, चौथे नंबर वाले को कौन पूछता है? कौन याद रखता है? इन सबको जो सम्मान मिलना चाहिए वो इनसे छीनकर पहले नंबर वाले को दिया जाता है। पहला नंबर सबकुछ है उसके बाद वाले नंबर जो उससे ज़रा सा ही कम हैं, कुछ भी नहीं।

(३)

बारहवीं कक्षा में मेरे और उसके बीच का अंतर कुछ कम हुआ। इस बार वो मेरिट लिस्ट में नहीं थी और मैं उससे केवल पाँच नम्बर कम लाया था। वो तो मुई अंग्रेज़ी धोखा दे गई वरना इस बार मैं उसे पटखनी देने में कामयाब हो जाता। इस बार मैं उसका सारा घमंड तोड़ देता।

बारहवीं कक्षा पास करने के बाद मैं इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा की कोचिंग लेने दिल्ली में अपने मामा के घर चला गया। उसका दिल्ली में कोई नहीं था इसलिए वो लखनऊ में अपने चाचा के पास चली गई जो उन दिनों वकालत करने के बाद किसी बड़े वकील के चेले बनकर कोर्ट-कचहरी का काम सीख रहे थे। उसके चाचा के दो बेटे थे जिन्हें वो पढ़ाती भी थी।

साल बीतते देर नहीं लगी। हम लोग इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा देकर घर वापस आ गये। जब संयुक्त प्रवेश परीक्षा का परिणाम घोषित हुआ तो मैं ख़ुशी से पागल हो गया। मैं सफल हो गया था और वो असफल। वैसे मैं बड़ी मुश्किल से सफल हो पाया था और वरीयता क्रम में मेरा नाम बहुत नीचे था लेकिन उसका तो चुनाव ही नहीं हुआ था। इस बार घर और मुहल्ले वालों के पास मेरी तारीफ़ करने के अलावा और कोई चारा नहीं था।

मैं उसके घर गया। उसकी मम्मी बाहर बरामदे में बैठी थी।

मैंने पूछा, “कलिका कहाँ है”।

उन्होंने जवाब दिया, “अन्दर है। अपने कमरे में। बहुत रो रही है। तुम उसके दोस्त हो जाकर उसे समझाओ। शायद तुम्हारी बात समझ ले।”

मैं मन ही मन हँसा। मैं और उसका दोस्त। मैं तो उसका सबसे बड़ा दुश्मन हूँ। मैं उसके कमरे में गया। दरवाजा अन्दर से बन्द नहीं था। मैं धक्का दिया तो वो खुल गया। वो तकिये में मुँह छिपाकर लेटी हुई थी।

मैंने पुकारा, “कलिका”।

मेरी आवाज सुनकर उसने तकिये से सर उठाया। तकिया उसके आँसुओं से भीगा हुआ था। मेरी दुश्मन मेरे सामने थी। कमजोर, निराश, हारी हुई। अब वक़्त था आखिरी वार करने का।

मैंने कहा, “देखो कलिका ये कोई बड़ी बात नहीं। संयुक्त प्रवेश परीक्षा में कुल चुने गये विद्यार्थियों का केवल दस प्रतिशत लड़कियाँ होती हैं। इसलिए तुम्हारा न चुना जाना कोई बड़ी बात नहीं। देखो दसवीं और बारहवीं की परीक्षा तो कोई भी रट कर पास कर लेता है लेकिन संयुक्त प्रवेश परीक्षा में चुने जाने के लिए तेज़ दिमाग चाहिए। वो सब के पास नहीं होता। ख़ास कर लड़कियों के पास। विश्व भर में किये गये विभिन्न अध्ययनों से पता चला है कि लड़कियों के दिमाग का आयतन लड़कों से एक सौ पच्चीस घन सेन्टीमीटर कम होता है। मुझे तो लगता है कि तुम्हें गणित छोड़कर कोई और विषय चुन लेना चाहिए। वैसे देखो अभी प्रदेश की प्रवेश परीक्षा का परिणाम आने वाला है। शायद उसमें तुम्हारा चुनाव हो जाय।”

ये सब बोलते हुए मैं एक बार भी नहीं हकलाया। ये तो चमत्कार हो गया। मेरी बात सुनकर वो जोर जोर से रोने लगी। मैं तुरन्त उसके कमरे से बाहर आ गया।

उसकी माँ ने पूछा, “क्या हुआ बेटा”।

मैंने कहा, “अ…..आन्टी, वो तो कोई बात सुनने को ही तैयार नहीं है। मेरे विचार में उसे अ…अच्छी तरह रोने देना ही ठीक रहेगा। एक बार उसके दिल का गुबार निकल गया तो सब ठीक हो जाएगा।”

“और बेटा तुम मिठाई कब खिला रहे हो”।

“अ..अभी तो बड़ी तेज़ धूप है। शाम को बाजार से लेकर आता हूँ अ…आन्टी”।

ये कहकर मैं फौरन वहाँ से चलता बना। मेरा काम हो गया था।

(४)

जब प्रदेश की प्रवेश परीक्षा का परिणाम आया तो पता चला कि उसका भी चुनाव हो गया है। इस परीक्षा में वरीयता क्रम में वो मुझसे तीन सौ पैंतीस स्थान नीचे थी। मुझे कितना सुकून मिला मैं बता नहीं सकता। बहरहाल मैंने प्रौद्योगिकी संस्थान, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया और उसने मोतीलाल नेहरू इंजीनियरिंग कॉलेज, इलाहाबाद में। मुझे सिविल इंजीनियरिंग में प्रवेश मिला और उसे मैकेनिकल इंजीनियरिंग में।

तीन साल कैसे गुज़र गये पता ही नहीं चला। चौथे साल की शुरुआत से ही कैंपस में विभिन्न कंपनियों का आना शुरू हो गया। मैं अपनी कक्षा का टॉपर था इसलिए स्क्रीनिंग में हर बार मैं चुन लिया जाता था लेकिन साक्षात्कार में मेरा हकलाना मेरे चुने जाने की राह में बाधक बन जाता था। मेरे देखते ही देखते मेरे ज़्यादातर दोस्तों को विभिन्न कंपनियों में नौकरी मिल गई। यहाँ तक तो सब ठीक था मगर दशहरे की छुट्टियों में घर आने के बाद मुझे पता चला कि कलिका की नौकरी किसी कंपनी में लग गई है। मैं बता नहीं सकता मुझे कैसा लग रहा था जब वो मुस्कुराती हुई मिठाई लेकर मेरे पास आई।

उसने कहा, “माना मेरा दिमाग़ तुमसे एक सौ पच्चीस घन सेन्टीमीटर कम है लेकिन मेरी संप्रेषण क्षमता तुमसे एक सौ पच्चीस घनमीटर ज़्यादा है। अब जाओ एम. टेक. करो, फिर पी.एच.डी. करो और किसी इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रोफ़ेसर हो जाओ।”

उस दिन मेरे भीतर कुछ मर गया। मेरे मन में उसके प्रति यदि कहीं कोई कोमल भावना थी तो वो ख़त्म हो गई। उस दिन पहली बार मैं बिना कोई संजीदा फ़िल्म देखे रोया। मैं वापस गया कॉलेज गया और कुल मिलाकर सत्रह बार मुझे साक्षात्कार देने का मौका मिला और मैं सब में असफल हुआ। ये साल भी पलक झपकते ही गुज़र गया और जब गेट की परीक्षा का परिणाम घोषित हुआ तो वरीयता सूची में मैं देश भर में पचासवें स्थान पर था। मैंने आईआईटी रुड़की में संरचनात्मक अभियांत्रिकी में एम. टेक. करने के लिए प्रवेश लिया।

यहाँ मेरा पहला साल आराम से गुज़रा। पढ़ने और परीक्षा पास करने में मुझे कोई ख़ास दिक़्कत नहीं होती थी। दूसरे साल से फिर मैंने कॉलेज कैंपस में आने वाली कंपनियों में साक्षात्कार देना शुरू किया। पहली दो कंपनियाँ छोटी छोटी कंपनियाँ थीं जिनमें मैं एक बार फिर साक्षात्कार में असफल रहा। तीसरी कंपनी थी राष्ट्रीय शक्ति निगम, जो देश की सबसे बड़ी जल विद्युत उत्पादक कंपनी थी। इस कंपनी ने साक्षात्कार में मेरे हकलाने के बावजूद मुझे चुन लिया गया। मैंने घर फोन करके सबको बताया। फिर मैंने कलिका की माँ से कलिका का मोबाइल नम्बर लिया। उसे फोन लगाया और अपनी नौकरी के बारे में बताया। ये भी बताया कि मेरी तनख़्वाह उससे डेढ़ गुना होगी। उसने बधाई हो कहकर फोन काट दिया।

मेरा काम हो चुका था। मैं उसे जलाना चाहता था और मुझे पूरा विश्वास था कि इस समय वो पेट्रोल से भी ज़्यादा तेज़ जल रही होगी।

(५)

एम. टेक. करने के बाद मैंने राष्ट्रीय शक्ति निगम में अपना कार्यभार सँभाल लिया। मुझे उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में रामगंगा नदी चल रही परियोजना में भेज दिया गया। यहाँ मेरी कंपनी एक बाँध का निर्माण कर रही थी। बाँध कंक्रीट का बनाया जा रहा था और उसका निर्माण कार्य आधा हो चुका था। वहाँ मुझे पहली बार वह सब अपनी आँखों के सामने देखने का मौका मिला जो मैंने अब तक किताबों में ही पढ़ा था। बड़ी बड़ी मशीनें, जिनके सामने आदमी चींटी जैसा नज़र आता है। बड़े बड़े एक्सकैवेटर, डंपर, डोजर, कम्पैक्टर जब चलते थे तो लगता था कि जैसे बादल गरज रहे हों। ऊँची-ऊँटी टॉवर क्रेनें, बड़े बड़े कंक्रीट पम्प और ढेर सारी कंक्रीट। कंक्रीट को सही जगह और सही तरीके से गिराने में मदद करते हजारों मज़दूर। काम बहुत तेज़ गति से चल रहा था और हमें उम्मीद थी कि ये सब वक़्त से पहले पूरा हो जाएगा। धीरे धीरे मेरा मन काम में रम गया।

सरकारी उपक्रमों में किस आदमी से कौन सा काम लिया जाएगा ये कोई नहीं बता सकता। हो सकता है आप इंजीनियर हों और आपको पेड़ पौधे लगाने का काम दे दिया जाय या आपको मानव संसाधन विभाग में लगा दिया जाय। इस मामले में मैं खुशकिस्मत था कि मुझे वहीं लगाया गया जहाँ मैं चाहता था। सरकारी उपक्रमों का मानव संसाधन विभाग संभवतः सबसे अक्षम विभाग है क्योंकि उसे ये बिल्कुल भी नहीं पता होता कि कौन किस काम के लिए सही रहेगा। सब ट्रायल एण्ड एरर पर चलता है। लग गया तो तीर नहीं तो तुक्का। लेकिन सरकारी उपक्रमों में एक और बात है जो बड़ी अजीब तो है लेकिन बहुधा होती है। जो काम करता है उसे और काम दे दिया जाता है और जो नहीं करता उसे कम से कम काम मिलता है। कुछ दिनों के बाद सिविल के साथ साथ मैकेनिकल विभाग के कुछ कार्यों की जिम्मेदारी भी मेरे पास आ गई। अब मुझे पावर इन्टेक (वो स्थान जहाँ से पानी टरबाइन तक जाने वाली सुरंग में घुसता है) और स्पिलवे (वो स्थान जहाँ से अतिरिक्त पानी को निकाल जाता है) के गेट भी लगवाने थे। ये काम कुल दो सौ पचास करोड़ का था।

उधर कलिका ने मुझसे ज़्यादा वेतन पाने के लिए अपनी पुरानी कंपनी छोड़कर एक दूसरी बड़ी कंपनी में चली गई। ये शायद उसके जीवन की सबसे बड़ी गलती थी। उसका वेतन तो मुझसे ज़्यादा हो गया लगभग डेढ़ गुना। लेकिन उसे ये नहीं मालूम था कि वो जिस कंपनी में जा रही है उसे मेरी परियोजना में ही पावर इन्टेक और स्पिलवे का गेट लगाने का काम सौंपा गया है। भारत में गिनी चुनी ही ऐसी कंपनियाँ हैं जिनके पास इतने बड़े गेट बनाने और लगाने का अनुभव है। कलिका को मेरी परियोजना में उपमहाप्रबंधक बनाकर भेज दिया गया। उसने अपने उच्चाधिकारियों को कहीं और भेजने के लिए पत्र लिखा लेकिन जवाब मिला कि अभी तो आपको जाना ही पड़ेगा। हाँ साल छः महीने में कहीं और जगह खाली होगी तो आपको वहाँ स्थानान्तरित कर दिया जाएगा।

इस तरह कलिका मेरी परियोजना में आई। इस परियोजना की मालिक मेरी कंपनी थी और उसकी कंपनी को इस परियोजना में दौ सौ पचास करोड़ का काम करना था। उसने आते ही बड़ी दक्षता से काम काज सँभाल लिया। हम दोनों जब आमने सामने पड़ते तो मैं नज़र चुराकर निकल जाता। जब कभी उसकी कंपनी के साथ बैठक होती और उसमें कलिका को आना होता मैं बैठक में किसी और को भेज देता। पहले महीने के काम के लिए उसकी कंपनी ने चार करोड़ का बिल भेजा। मैंने उसकी कंपनी के कामों में इतनी कमियाँ निकालीं कि वो बिल केवल डेढ़ करोड़ का रह गया। मेरी कंपनी के वित्त विभाग का एकमात्र उसूल है कि कम से कम भुगतान करो। कम भुगतान में कोई ख़तरा नहीं है अगर कोई गलती बता दे तो उसे अतिरिक्त भुगतान कभी भी किया जा सकता है लेकिन अगर ज़्यादा भुगतान हो गया तो उसे वापस पाना बहुत मुश्किल होता है। डेढ़ करोड़ के बिल में वित्त विभाग ने कुछ और कमियाँ निकालकर उसे एक करोड़ का कर दिया।

जब कलिका की कंपनी के खाते में पैसे पहुँच गए तो वो मेरे पास आई। मैं उसकी सूरत देखते ही समझ गया कि इसे अपने उच्चाधिकारियों से अच्छी ख़ासी डाँट पड़ी है।

वो बोली, “सुरेश, तुमने हमारे पैसे क्यों कम कर दिये।”

मैंने मुँह बनाते हुए उत्तर दिया, “तुम्हारे बिल बहुत सारी कमियाँ थीं जो जिनकी सूचना पत्र द्वारा तुम्हें दे दी जाएगी। उन कमियों को सुधारकर अगले महीने फिर से बिल भेजना।” अब मेरा हक़लाना पूरी तरह ख़त्म हो चुका था। शायद मेरी हकलाहट केवल आत्मविश्वास की कमी के कारण थी जो अब पूरी तरह से दूर हो चुकी थी।

उसने कहा, “तब तक हमारा काम कैसे चलेगा। हमारी कंपनी पहले ही यंत्र एवं उपकरण खरीदने में पचास करोड़ का ऋण ले चुकी है। अब हमारा प्रधान कार्यालय और पैसे भेजने से मना कर रहा है। अगर आप हमारे मासिक बिल का भुगतान नहीं करेंगे तो हम आगे का काम करने के लिए पैसे कहाँ से लाएँगें।”

मैंने कहा, “मुझे नहीं पता। तुमने सारे गेट बनाने का कान्ट्रैक्ट लिया है। तुम्हें गेट बनाना है। इसके लिए पैसे कहाँ से आएँगे ये तुम्हारी सरदर्दी है। मैं तुम्हें उतना ही भुगतान करवा सकता हूँ जितने का काम तुमने अच्छी तरह किया है। अगर किसी काम में जरा भी कमी होगी तो उसका भुगतान तब तक नहीं होगा जब तक कि वो कमी दूर न हो जाय। अगर तुम्हारी कंपनी ये काम नहीं कर सकती तो मना कर दे। हम तुम्हारे जोख़िम और लागत पर किसी और से करवा लेंगे। तुम्हारी कंपनी को ब्लैक लिस्ट कर देंगे और उसके बाद तुम्हें इस देश में कोई भी सरकारी / अर्द्धसरकारी कंपनी कान्ट्रैक्ट नहीं देगी।”

मुझे लगा कि अब वो रो देगी। अगर वो रो देती या एक बार गिड़गिड़ाकर मुझसे प्लीज़ कह देती तो मैं पूरक बिल बनाकर उसका भुगतान करवा देता। लेकिन वो एक झटके से उठी और बार निकल गई। तभी चाय वाला चाय लेकर भीतर आया। उसको दफ़्तर खाली दिखा तो वो बोला, “साहब आपने तो दो कप चाय मँगाई थी”।

मैंने कहा, “एक कप मुझे दे दे। एक कप तू पी लेना। इतनी देर लगती है चाय बनाने में।”

चाय वाले ने एक कप चाय मेरे सामने रखी और मेरे गुस्से को देखते हुए चुपचाप खिसक लेने में ही अपनी भलाई समझी।

(६)

अगले दिन मुझे परियोजना के महाप्रबंधक ने बुलाया। मैं उनके कार्यालय में गया तो उन्होंने मिलने से पहले मुझे दो घंटे बाहर इंतजार करवाया। वो ऐसा तब करते थे जब किसी पर गुस्सा हों। मैं समझ नहीं पा रहा था कि हमेशा मुझसे खुश रहने वाले महाप्रबंधक मुझसे नाराज़ क्यों हैं। मैं उनके सामने गया तो बोले, “देखो सुरेश, जब कान्ट्रैक्टर कोई काम करता है उसका काम का उचित भुगतान करना हमारा कर्यव्य बन जाता है। ये कंपनी इतनी बड़ी इसीलिए हुई है क्योंकि हमारे सारे कान्ट्रैक्टर यह विश्वास करते हैं कि यदि वो हमारे लिए अच्छा काम करेंगे तो हम उसके बदले उन्हें उचित भुगतान करेंगे। अब तक तो तुम्हारे खिलाफ़ मुझे कोई शिकायत नहीं प्राप्त हुई थी। इस बार तुमसे ऐसी गलती क्यूँ हो गई।”

मैं अपने बचाव में बोला, “उन्होंने जो बिल भेजा था उसमें बहुत गलतियाँ थीं। ऐसा ग़लत बिल अगर मैं पास कर देता तो कल को हम लोग सतर्कता विभाग की जाँच में फँस सकते थे। मैंने उन गलतियों के बारे में कान्ट्रैक्टर को पत्र लिख दिया है। अब अगले महीने जब वो गलतियाँ दूर कर लेंगे तो मैं भुगतान के लिए भेज दूँगा।”

महाप्रबंधक बोले, “अगले महीने नहीं इसी महीने करना है। आज सुबह ही कान्ट्रैक्टर काम बंद कर देने की धमकी देकर गया है। हमारी परियोजना समय से पहले पूरी होने जा रही है और ये बाकी कंपनियों के लिए एक मील का पत्थर होगी। मैं नहीं चाहता कि कुछ छोटी मोटी गलतियों की वज़ह से काम को किसी भी तरह का कोई नुकसान हो। कान्ट्रैक्टर बिल सुधारकर कल ही भेज देगा और तुम उसे जाँच करके शीघ्रातिशीघ्र भुगतान के लिए भेज देना। वित्त विभाग को भी मैं समझा दूँगा कि वो इतनी छोटी गलतियों के लिए पैसे न रोकें।”

मैं क्या कहता बात अब मेरे हाथ से निकल चुकी थी। मैं बोला, “ठीक है सर मैं पूरक बिल बना कर भेज दूँगा।”

महाप्रबंधक बोले, “ये हुई न बात। आगे से ऐसी शिकायत मेरे पास नहीं आनी चाहिए।”

मैं महाप्रबंधक कार्यालय से बाहर निकला। गुस्से के मारे मेरा चेहरा तमतमा रहा था। तो इस लड़की की दुम ने मेरे खिलाफ़ महाप्रबंधक से शिकायत कर दी। इसे तो ऐसी जगह ले जाकर मारूँगा जहाँ इसे पानी भी नसीब नहीं होगा। लेकिन नहीं, इसे मैं मारूँगा नहीं। मार दिया तब तो ये मुक्त हो जाएगी। इसे तड़पाऊँगा। बुरी तरह तड़पाऊँगा। इसे मैं मारूँगा नहीं।

उस रात मैंने एक सपना देखा। बड़ा अजीब सा सपना। इतना अजीब कि वो सपना मुझे आज भी ज्यों का त्यों याद है। मैं स्पिलवे की नींव के पास खड़ा था। जहाँ हज़ारों की संख्या में मज़दूर काम करते हैं वहाँ उस समय कोई नहीं था। सिर्फ़ मैं अकेला था। बिल्कुल अकेला। मैंने जोर से आवाज़ लगाई तो मेरी आवाज़ स्पिलवे के विशालकाय पियर से टकराकर वापस आ गई। अचानक ऊपर स्पिलवे के पुल पर से कलिका की आवाज़ आई, “यहाँ आ जाओ। मैं यहाँ हूँ।”

मैंने वहीं से एक छलाँग लगाई चालीस मीटर ऊँची छँलाग और सीधे उसके सामने पहुँच गया। वो आश्चर्य से मुझे देखने लगी और इसी पल का फ़ायदा उठाकर मैंने उसका गला दबाना शुरू कर दिया। उसने कोई विरोध नहीं किया। मैंने देखा उसकी आँखें धीरे धीरे अपने कोटरों से बाहर निकल आईं। उसकी गर्दन एक तरफ़ झूल गई। फिर मैंने उसे अपने कंधे पर उठाया और उसकी लाश को ले जाकर रामगंगा नदी में डाल दिया। मुझे पूरा यकीन था कि रामगंगा का तेज़ बहाव उसकी लाश के इतने टुकड़े करेगा कि वो पहचान में भी नहीं आएगी। तभी किसी ने पीछे से मेरे कंधे पर हाथ रखा। मैंने चौंक कर पीछे देखा। मेरे पीछे भी मैं ही खड़ा था। अचानक पीछे से मैंने मुझे एक जोर का धक्का दे दिया और मेरा शरीर रामगंगा नदी में गिरने लगा। मेरे शरीर में एक अजीब सी सनसनी हुई और मेरी नींद टूट गई।

“हे भगवान! कैसा अजीब सपना था। मैं और चाहे जो करूँ कभी उसकी हत्या नहीं कर सकता। ऐसे तो वो मुक्त हो जाएगी और मैं जेल चला जाऊँगा।” मैंने पानी पीते हुए सोचा।

(७)

अगले दिन सुबह मैंने उससे मोबाइल पर बात की। वो स्पिलवे गेट में हो रही वेल्डिंग की जाँच कर रही थी। मैं भी वहीं पहुँचा। वो ऊपर गेट के शीर्ष पर थी। नीचे से ऊपर जाने के लिए लोहे की पाइपों को वेल्ड करके सीढ़ियाँ बनाई गई थीं। मैं रेलिंग का पाइप पकड़कर ऊपर चढ़ने लगा। तभी मेरी उँगली में कुछ घुसा। मैंने झुककर देखा तो पाया कि एक जगह वेल्डिंग ठीक नहीं हुई थी और पाइप का नुकीला सिरा बाहर निकला हुआ था जो ऊपर से दिखाई नहीं देता था। ऐसे में ये किसी को भी चुभ सकता था। मैंने आवाज़ देकर फ़ोरमैन को बुलाया। उससे दुबारा वेल्डिंग करने के लिए कहा और फिर से ऊपर चढ़ने लगा।

वो सफ़ेद हेल्मेट लगाये, धूप से चेहरा बचाने के लिए अपने हाथ से चेहरे पर छाँव किये हुए खड़ी थी। मैंने उसको आवाज़ देकर अपने पास बुलाया। मैं उसे उसके मज़दूरों और वेल्डरों के सामने नहीं डाँटना चाहता था। वो मेरे पास आ गई तो मैं बोला, “तो आखिरकार तुमने महाप्रबंधक से शिकायत कर ही दी न। तुम क्या समझती हो मैं इससे डर जाऊँगा। मैं अगर बिल का भुगतान न करवाना चाहूँ तो कोई मुझे मज़बूर नहीं कर पाएगा। अब तक तो मैं सोच रहा था कि एक दो महीने बाद पूरा भुगतान करवा दूँगा लेकिन अब देखता हूँ तुम्हारा भुगतान कौन करवाता है। कर लो, जहाँ शिकायत करनी हो कर लो।”

उसने मेरी तरफ़ उँगली करके कहा, “देखो सुरेश, मैंने तुम्हारे महाप्रबंधक से कोई शिकायत नहीं की। मैंने सिर्फ़ अपने उच्चाधिकारियों को वस्तुस्थिति से अवगत करवाया। उसके बाद उन्होंने तुम्हारे उच्चाधिकारियों से बात की हो तो मैं नहीं जानती। मैंने केवल अपने कर्तव्य का पालन किया। तुम्हें भुगतान नहीं करना हो तो मत करो। लेकिन इतना जान लो कि दाम नहीं तो काम नहीं।”

इस लड़की से बहस करना बेकार था। ये कभी नहीं डरेगी। ये कभी हार नहीं मानेगी। मैं गुस्से में पैर पटकता हुआ सीढ़ियाँ उतरने लगा। तभी मैंने देखा कि कुछ सरिये जो स्पिलवे के कंक्रीट में आधे घुसे हुए थे सीढ़ियों के रास्ते में आने की वजह से मोड़ दिये गये थे। अब ऊपर का काम होने के बाद उनको सीधा करके आगे की कंक्रीट की जानी थी। ये आठ मिलीमीटर व्यास के सरिये थे जो आसानी से मोड़े जा सकते हैं। मैंने झुककर एक सरिया पकड़ा और उसे सीधा कर दिया अब उसका कुछ हिस्सा सीढ़ियों के भीतर आ गया। ऐसा होना कोई बहुत बड़ी बात नहीं थी। अक्सर ऊपर से कोई छोटा मोटा सामान गिर ही जाता था। ऐसे में उसका सरियों से टकराना और सरियों का थोड़ा सीधा हो जाना कोई बड़ी बात नहीं थी। मैं नीचे उतर आया।

नीचे आकर मैंने उसे फ़ोन लगाया और उसे फ़ौरन नीचे आने के लिए कहा। जब वो सीढ़ियाँ उतरने लगी तो मैंने उसे फिर फोन लगाया और बोला, “चलो ठीक है, इस महीने मैं तुम्हारी छोटी मोटी ग़लतियाँ माफ़ कर देता हूँ। तुम दुबारा बिल भेज दो मैं पूरक बिल बनाकर तुम्हारा भुगतान करवा दूँगा। लेकिन अगले महीने से ऐसी ग़लतियाँ मेरे संज्ञान में नहीं आनी चाहिए।”

वो मुझसे बात करने में व्यस्त थी। उसका दाहिना हाथ मोबाइल थामने में व्यस्त था इसलिए वो बिना रेलिंग पकड़े उतर रही थी। उसने नीचे निकला सरिया नही देखा। सरिया उसके पैरों से उलझा, वो लड़खड़ाई और वो हो गया जिसकी मैंने सपने में भी कल्पना नहीं की थी। मैंने तो सोचा था कि वो मुझसे बात करने में व्यस्त रहेगी तो सरिया नहीं देख पाएगी और सरिये से उसकी पैन्ट का निचला हिस्सा फट जाएगा और उसके पैरों में थोड़ी बहुत खरोंच लग जाएगी। वो फटी पैन्ट पहनकर टहलेगी तो लोग उस पर हँसेंगे और इस तरह मैं अपने अपमान का बदला ले सकूँगा। लेकिन इस तरफ़ तो मेरा ध्यान गया ही नहीं था कि उसे बिना रेलिंग पकडे उतरना पड़ेगा और ऐसे में उसका बैलेंस बिगड़ जाएगा और वो सीधे नीचे गिर जाएगी। सीधे छ: सौ बत्तीस मीटर से छः सौ अठारह मीटर यानी चौदह मीटर नीचे।

(८)

वो सर के बल गिरी। उसका हेलमेट टूट गया और सर पर लगे जोरदार झटके से वो बेहोश हो गई। मैं दौड़ा। पागलों की तरह दौड़ा। वो बेहोश थी। मैंने उसे बाँहों में उठाया और फौरन अपनी गाड़ी में लिटा दिया। तीन मिनट बाद मैं साइट पर बने छोटे से चिकित्सालय में पहुँचा। वहाँ डॉक्टर ने उसकी मरहम पट्टी की और और कुछ इन्जेक्शन दिये। इन्जेक्शन देने के दस मिनट बाद भी जब उसे होश नहीं आया तो डॉक्टर को चिन्ता हुई। डॉक्टर ने टार्च जलाकर उसकी आँखों का निरीक्षण किया तो उसके चेहरे पर चिन्ता की लकीरें उभर आईं। डॉक्टर ने कहा, “इन्हें जल्द से जल्द दिल्ली ले जाइये। शायद इनके मस्तिष्क को चोट पहुँची है वरना अब तक तो इन्हें होश आ जाना चाहिए था। जल्दी कीजिए वरना अगर दिमाग के अंदर खून रिस कर इकट्ठा हो रहा होगा तो खून के बढ़ते दबाव के कारण दिमाग़ क्षतिग्रस्त हो सकता है और ये कोमा में जा सकती हैं या इनकी मौत भी हो सकती है।”

तब तक उसकी कंपनी के परियोजना निदेशक वहाँ पहुँच चुके थे। मैंने उनसे बताया कि तुरंत हेलीकॉप्टर का प्रबंध करना पड़ेगा। उन्होंने अपने दिल्ली स्थित मुख्यालय से बात की पता चला कि हेलीकॉप्टर का इंतजाम करने में उनको सात आठ घंटे लग जाएँगें क्योंकि उनकी कंपनी जरूरत के मुताबिक हेलीकॉप्टर का प्रबंध करती है उनके पास कोई स्थाई हेलीकॉप्टर या किसी विमान कंपनी के साथ स्थायी अनुबंध नहीं है।

सात आठ घंटे में तो क्या से क्या हो जाएगा। गनीमत थी कि मेरी कंपनी का अनुबंध दिल्ली स्थित निजी विमान कंपनी पवनहंस से था। जिसको ऐसी आकस्मिक परिस्थितियों में फ़ोन कर देने भर से वो हैलीकॉप्टर भेज देते थे। मगर ये सुविधा केवल हमारी कंपनी के कर्मचारियों के लिए थी। मैंने उसकी कंपनी के परियोजना निदेशक को बताया तो उन्होंने स्वीकृति दी कि सारा खर्च उनकी कंपनी वहन करेगी मैं फ़ौरन हैलीकॉप्टर का इन्तज़ाम करूँ।

मैंने अपने महाप्रबंधक को सारी स्थिति बताई और ये भी बताया (मैं बताना तो नहीं चाहता था) कि मैं इस लड़की को बचपन से जानता हूँ और ये मेरे पड़ोस में ही रहती है। महाप्रबंधक ने कहा कि ठीक है हैलीकॉप्टर मँगवा लो लेकिन सबको यही बताना कि ये लड़की तुम्हारे रिश्ते में है। अगर कहोगे कि कान्ट्रैक्टर की कोई कर्मचारी है तो वो हैलीकॉप्टर भेजने में ना नूकुर करेंगे।

अगले कुछ मिनट मैं फोन पर व्यस्त रहा। उसके बाद मैंने कलिका के शरीर को एम्बुलेंस में लदवाया और ख़ुद भी उसके साथ बैठकर हैलीपैड की ओर चल पड़ा। डॉक्टर भी मेरे साथ ही था। वो बीच बीच में उसकी नब्ज़ देख लेता था।

हैलीपैड वहाँ से चालीस किलोमीटर दूर पिथौरागढ़ शहर में था। पहाड़ों में ये दूरी तय करने में डेढ़ से दो घंटे लगते हैं लेकिन हमें सवा घंटे लगे। हैलीकॉप्टर हम लोगों से पाँच मिनट पहले ही वहाँ पहुँचा था। वहाँ से मैं और डॉक्टर कलिका को लेकर दिल्ली की तरफ उड़ गये।

(९)

कलिका के सर का ऑपरेशन दो घंटे चला। सर्जन ने बाहर निकलकर कहा, “आप लोगों को थोड़ी देर हो गई लेकिन इतनी ज़्यादा भी नहीं हुई कि हम कलिका को बचा न पाते। दिमाग में हो रहे खून के रिसाव से उसके दिमाग पर काफ़ी दबाव पड़ा और दिमाग के कई ऊतक क्षतिग्रस्त हो गए। लेकिन हमने उसकी खोपड़ी का एक हिस्सा काटकर निकाल दिया जिससे दिमाग पर पड़ रहा दबाव ख़त्म हो गया। कुछ दिन बाद जब उसके दिमाग़ में लगे घाव भर जाएँगें तो हम वो हिस्सा वापस लगा देंगे। फ़िलहाल तो वो कोमा में है और जब उसे होश आएगा तभी ठीक से कुछ बताया जा सकेगा कि दिमाग को कितना नुकसान हुआ है।”

जब तक कलिका का ऑपरेशन चल रहा था तब तक मुझे लग रहा था कि डॉक्टर बाहर निकलकर मुझसे कहेगा कि अब सबकुछ ठीक है आप कुछ दिनों बाद इन्हें घर ले जा सकते हैं। यह सोचकर मैंने अब तक कलिका के पिता को फोन नहीं किया था कि सबकुछ ठीक होने के बाद ही उन्हें बताऊँगा। अब मुझमें उन्हें यह बात बताने की हिम्मत नहीं थी। अपनी इस बेटी पर उन्हें बहुत नाज़ था। वो कहते थे कि मेरी ये बेटी बेटे से बढ़कर है। मैं उनसे कैसे कहता कि आपकी बेटी कोमा में है और होश में कब आएगी इस बात की कोई उम्मीद नहीं। दो दिन, दो हफ़्ते, दो साल या फिर कभी नहीं।

ये दिमाग भी बड़ी अजीब शै है। मज़बूत खोपड़ी से ढ़का हुआ लेकिन इतना मुलायम कि ख़ून का ज़रा सा दबाव बर्दाश्त नहीं कर सकता। ये मजबूत खोपड़ी जो इसकी रक्षा करती है भीतर से ख़ून रिसने लग जाय तो इसके लिए नुकसानदेह हो जाती है।

डॉक्टर बता रहा था कि दिमाग़ ख़ुद की मरम्मत भी कर लेता है। यादों तक पहुँचने का पुल टूट जाय तो धीरे धीरे नये पुल बना लेता है। विदेशों में कई मरीज़ तो ऐसे भी देखे गये हैं जो दिमाग के एक हिस्से के नष्ट होने के बाद भी अपना सामान्य जीवन बिता रहे हैं।

आख़िरकार मैंने कलिका के पिताजी को फोन लगाकर सारी बात बताई। वो उड़कर आए और फूट-फूट कर रोए। मैं क्या कहता? मैं क्या करता? बस देखता रहा। सबकुछ होते देखता रहा।

अगर मैं ईश्वर में विश्वास करता तो यह कहकर अपने आप को तसल्ली दे देता कि जो हुआ सब ऊपर वाले की मर्जी से हुआ। अगर मैं किस्मत में यकीन करता तो यह कहकर ख़ुद को समझा लेता कि इसकी किस्मत में यही लिखा था। अगर मैं स्वर्ग-नर्क या आत्मा में यकीन करता तो आत्महत्या कर लेता ताकि अपने इस जघन्य कृत्य के बदले मुझे हमेशा हमेशा के लिए नर्क मिल जाय। अगर मुझे मेरे देश की न्याय प्रक्रिया में यकीन होता तो मैं अपने आपको कानून के हवाले कर देता। लेकिन मुझे पता था कि कानून के पास जाने पर वो मुझे सजा दे देगा और इस तरह मेरी और इसकी दोनों की जिन्दगी बर्बाद कर देगा। कानून सज़ा देने से ज़्यादा और कर भी क्या सकता है। आँख के बदले आँख निकाल लेना न्याय नहीं होता। जिसने आँख निकाली उसके खर्चे पर जिसकी आँख निकाली गई उसे नई आँख देना शायद न्याय के ज़्यादा करीब होगा। आँख के बदले आँख निकालना या जेल भेजना तो बदला लेना है और बदला लेना न्याय कब से हो गया। मैं इसे दुर्घटना मानकर भी अपने को क्षमा कर सकता था लेकिन मुझे पता है कि दुर्घटना होने की संभावना सुरक्षा उपकरणों से और सावधान रहकर बहुत कम की जा सकती है। मैं स्वयं से यह भी नहीं कह सकता कि वो रेलिंग पकड़े बिना उतरेगी यह बात मेरे दिमाग़ में नहीं आई थी क्योंकि मैंने सिगमंड फ़्रायड को पढ़ा है और उनकी ये बात बिल्कुल सही है कि वही बात आपके दिमाग़ में नहीं आती जिसे आप भूल जाना चाहते हैं। अगर मैं कलिका से इतनी नफ़रत न करता तो ये हो ही नहीं सकता था कि ये बात मेरे दिमाग में न आती। मेरी नफ़रत ने मेरे दिमाग को मज़बूर कर दिया इस पर बात पर ध्यान न देने के लिए। अब तो जो कुछ करना होगा मुझे ख़ुद ही करना होगा।

(१०)

मैंने कार्यालय से एक महीने की छुट्टी ले ली। सुबह से शाम, शाम से रात, रात से सुबह बस इंतज़ार, इंतज़ार और इंतज़ार। ऑपरेशन के दौरान ही कलिका को पूरी तरह गंजा कर दिया गया था। दो हफ़्ते बाद जब डॉक्टरों को लगा कि उसके मस्तिष्क में लगा घाव भर चुका है और मस्तिष्क की सूजन खत्म हो चुकी है तब उन्होंने कलिका की खोपड़ी के काटे गये हिस्से को वापस जोड़ दिया। अब हम सबको इन्ज़ार था दिमाग़ के चमत्कार का।

पूरे एक महीने बाद जब हम सबकी उम्मीदें धुँधली हो चुकी थीं। इस ब्रह्मांड की सबसे जटिल संरचना ने अपनी करामात दिखाई। कलिका को होश आ गया। लेकिन वो बहुत कुछ भूल गई थी। उसकी पुरानी यादों तक जाने के लिए दिमाग ने जो पुल बना रखे थे उनमें से अधिकांश टूट चुके थे। जिस दिन मैंने उससे कहा था कि लड़कियों के दिमाग का आयतन लड़कों के दिमाग से कम होता है ठीक उस दिन तक की सारी बात भूल चुकी थी। उसे इतना ही याद था कि मैं उसका दोस्त था और हम दोनों में एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ लगी रहती थी। उसके मन में मेरे लिए कड़वाहट उस दिन से पहले पैदा नहीं हुई थी।

मेरे बारे में भूलने के साथ साथ वो अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई लिखाई भी भूल चुकी थी। इसके अलावा उसके बाएँ हाथ-पाँव भी काम नहीं कर रहे थे। उसकी तात्कालिक स्मरण शक्ति पर भी काफ़ी प्रभाव पड़ा था। शुरू मे तो वो लड़खड़ा लड़खड़ा कर बोलती थी लेकिन कुछ दिनों बाद वो साफ़ साफ़ बोलने लगी। उसकी बहन उसे पकड़कर बाथरूम तक ले जाती थी और वापस लाती थी। मैं दिन भर बैठा उससे बातें करता रहता था। जब मैं उसे बताता था कि कैसे उसने इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा पास की और इंजीनियरिंग में अपने क्लास की टॉपर रही तो उसकी आँखों में आँसू आ जाते थे। दर’असल डॉक्टर ने मुझे कहा था कि इन्हें वो सारी पुरानी बातें बताइये जो ये भूल चुकी हैं इससे इनके दिमाग को पुरानी यादों तक नए पुल बनाने में आसानी होगी। ये समझ लीजिए कि आप जो बताएँगे वो उस पुल के लिए सीमेंट और रेत का काम करेगा। उसमें पानी इनका दिमाग़ ख़ुद मिला लेगा और पुरानी यादों तक पहुंचने के लिए नया पुल बना लेगा।

अब मैं उसे कैसे बताता कि हम दोनों एक दूसरे से नफ़रत करते थे। बेपनाह नफ़रत। वो सीमेंट और रेत जो उसके दिमाग को चाहिए था उसमें ये नफ़रत भी एक अवयव थी जो मैंने उसमें से निकाल ली थी। उसका दिमाग पुल बनाने का प्रयास करता था जो कभी कभी उसकी आँखों में उभरी चमक से मैं महसूस कर लेता था। लेकिन नफ़रत के अभाव में वो पुल बार बार टूट जाता था। एक दिन उसने कहा कि वो आगे पढ़ना चाहती है। पर अब इंजीनियरिंग करने की उसकी उम्र निकल चुकी थी। यदि वो फिर से आगे पढ़ना चाहती भी तो तात्कालिक स्मरण शक्ति कमज़ोर होने से ज़्यादा से ज़्यादा एक औसत दर्ज़े की विद्यार्थी बनकर रह जाती। मैं उसके गंजे सर और लकवाग्रस्त शरीर को देखता और सोचता कि ये मर गई होती तो अच्छा होता। लेकिन इसके न मरने की कामना भी तो मैंने ही की थी बस मुझे ये नहीं पता था कि याददाश्त खोकर ये उस नफ़रत और उससे जुड़े हुए दर्द को भूल जाएगी और मैं अकेला रह जाऊँगा उस नफ़रत का बेपनाह दर्द भुगतने के लिए।

(११)

धीरे धीरे मेरी एक महीने की छुट्टी ख़त्म होने को आ गई। मैंने डॉक्टर से बात की तो उसने कहा “एक दो दिन बाद आप इन्हें घर ले जा सकते हैं। इन्हें पुरानी बातें याद दिलाने की कोशिश करते रहिए। धीरे धीरे इनकी याददाश्त भी वापस आ जाएगी और इनकी बायीं तरफ़ के अंग भी काम करने लग जाएँगें।”

मैं बोला, “कितने दिनों में ऐसा होगा, डॉक्टर साहब।”

डॉक्टर बोला, “दिनों में? ऐसा होने में कम से कम पाँच-छः साल लगेंगे। इससे ज़्यादा भी लग सकते हैं।”

मैंने जाकर कलिका के पिता को बताया। वो रोने लगे। बोले, “हे भगवान, तूने मेरी बेटी की जिन्दगी बर्बाद कर दी। इससे तो अच्छा तूने उसे मौत ही दे दी होती।”

वो बोलते रहे, मैं सुनता रहा। वो रोते रहे, मैं टूटता रहा। वो चुप हुए तो मैंने एक निर्णय लिया। बड़ा ही अजीबोगरीब निर्णय। मैं कलिका के पास गया। उसकी बहन उससे बात कर रही थी। मैंने उसे थोड़ी देर के लिए बाहर जाने को कहा। वो चली गई तो मैं कलिका से बोला, “कलिका, तुम्हारी तबीयत ख़राब थी इसलिए मैंने तुम्हें एक बात नहीं बताई।”

वो बोली, “कौन सी बात?”

मैं बोला, “सच तो ये है कि मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ और तुम भी मुझसे बहुत प्यार करती हो। हम दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया था और घरवालों को बताने ही वाले थे कि ये दुर्घटना घट गई।  मैं तुम्हें अब भी उतना ही प्यार करता हूँ। क्या तुम्हें सचमुच कुछ भी याद नहीं।”

वो बोली, “प्यार-व्यार तो मैं नहीं जानती लेकिन इतना जानती हूँ कि तुम मुझे बचपन से अच्छे लगते थे इसलिए मैं तुमसे प्यार कर बैठी होऊँ तो कोई बड़ी बात नहीं।”

मेरे दिमाग को झटका लगा। ये बचपन से मेरे प्रति आकर्षित थी और मैं बचपन से ही इससे नफ़रत करता था। मैं तो समझता था कि ये भी मुझसे उतनी ही नफ़रत करती होगी जितनी मैं इससे। बहरहाल मेरी मुश्किल आसान हो गई थी। उससे बात करने के बाद मैं सीधा उसके पिता के पास गया और बोला, “अंकल आप को पता नहीं है कि मैं और कलिका बचपन से ही एक दूसरे से बहुत प्यार करते हैं। हम लोग शादी करने के लिए आपसे और पिताजी से बात करने ही वाले थे कि ये दुर्घटना हो गयी। अब कलिका स्वस्थ हो गई है तो मैं चाहता हूँ कि हम दोनों का विवाह जल्द से जल्द हो जाय। मेरे साथ रहने से उसकी याददाश्त भी ज़ल्द वापस आ जाने की संभावना बढ़ जाएगी।”

उसके बाद वही हुआ जो मैंने चाहा। कलिका की मुझसे शादी हो गई। उसके ठीक होने तक देखभाल करने के लिए उसकी माँ भी आकर मेरे साथ ही रहने लगी। हर महीने घर से कोई न कोई आने लगा। कलिका की तात्कालिक स्मरण शक्ति कुछ महीनों में ठीक हो गई और साल भर बीतते बीतते उसके लकवाग्रस्त अंगों में भी काफ़ी सुधार हो गया। अब वो अपने आप चलने फिरने लगी थी। धीरे धीरे उसने घर का सारा काम काज सँभाल लिया। उसकी माँ बहुत खुश थी कि उसकी बेटी की गृहस्थी बस गई। फिर एक दिन उसकी माँ भी वापस चली गई।

(१२)

सब खुश थे। कलिका के घरवाले, मेरे घरवाले, कलिका, सब खुश थे। सिर्फ़ मैं खुश नहीं था। मुझे पता था कि जब तक मैं कलिका को सब सच सच नहीं बता देता उसकी याददाश्त वापस आने की संभावना नगण्य है। अब तक मैं उम्मीद लगाये हुए था कि शायद उसकी याददाश्त बिना मेरे कुछ बताए ही वापस आ जाए। लेकिन समय बीतने के साथ साथ मेरी ये उम्मीद भी धुँधली पड़ती जा रही थी। कभी कभी मैं सोचता कि जैसे सबकुछ चल रहा है चलने दूँ लेकिन मेरा दिमाग़ इसके लिए राज़ी नहीं होता था। वो बार बार कहता था कि एक बेहद ख़ूबसूरत और तेज़  दिमाग को इस तरह अपने फ़ायदे के लिए कैद करके रखने का मुझे कोई हक नहीं है। ये दिमाग़ भी न, जब अड़ जाता है तो इतना परेशान कर देता है कि इसकी बात माननी ही पड़ती है। आखिरकार एक दिन मैंने कलिका को सबकुछ बताने का निर्णय ले लिया।

मैं बोलता जा रहा था और वो चुपचाप सब सुनती जा रही थी। उसके चेहरे पर अजीबोगरीब भाव आ जा रहे थे। यह बताने की मेरी हिम्मत नहीं हुई कि वो सरिया मैंने मोड़ा था जिससे उलझकर वो गिरी थी। जब रामकहानी ख़त्म हुई तो वो एक झटके से उठी और दूसरे झटके से जमीन पर गिर पड़ी। बो बेहोश हो गई थी।

जब उसे होश आया तो अपने साथ उसकी स्मृति को भी वापस ले आया। उसका दिमाग टूटे हुए पुल बना चुका था और अब उसे दुर्घटना होने तक की सारी बातें याद थीं। लेकिन दुर्घटना के बाद से लेकर अब तक की सारी बातें वो भूल चुकी थी। वो भूल चुकी थी कि वो मेरी पत्नी है। उसके कोमा में रहने के दौरान दिमाग पर लगी चोटों के बारे में जो कुछ पढ़ा था उससे मैंने पहले से ही ये अनुमान लगा लिया था कि भविष्य में ऐसा ही कुछ होने वाला है। वैसे भी मेरा उद्देश्य उसे कैद करके रखना कभी नहीं था। मैंने जो कुछ भी किया था सिर्फ़ इसलिए किया था कि मैं उसे फिर से पहले जैसी बना सकूँ। उसे उसकी खोई हुई ज़िन्दगी वापस दे सकूँ।

मैंने उसके पिता को फोन किया। उनको बता दिया कि कलिका को सारी पुरानी बातें याद आ गई हैं मगर वो दुर्घटना के बाद की सारी बातें भूल चुकी है। मैंने उन्हें चेतावनी भी दी कि कलिका को दुर्घटना के बाद की बातें याद दिलाने की कोशिश न की जाय वरना हो सकता है कि उसकी याददाश्त फिर से चली जाय। उनको ज़ल्द से ज़ल्द आने के लिए कहकर मैंने कलिका की कम्पनी के परियोजना निदेशक से बात की। उन्होंने कहा कि वो कलिका का दुबारा साक्षात्कार लेने के लिए तैयार हैं और इस बार वो उसे अपने दिल्ली स्थित कार्यालय में ही रखेंगे। कलिका का साक्षात्कार तो महज़ औपचारिकता भर था। कलिका के परियोजना निदेशक उसकी कर्मठता और बुद्धिमत्ता से परिचित थे ऊपर से उन्हें यह बात भी पता थी कि वो मेरी बात न मानने की स्थिति में नहीं हैं।

कलिका के पिताजी ने मेरी बात नहीं मानी। उन्होंने कलिका को सब बता दिया। उन्हें हमारे बीच की नफ़रत के बारे में कुछ भी नहीं पता था। कलिका पर इसका उल्टा असर हुआ। वो केवल वही बातें जान पाई जो उसके पिताजी जानते थे। उसे लगा कि मैंने उसकी याददाश्त जाने का फ़ायदा उठाकर उसके साथ शादी की। मैं जो नहीं चाहता था वही सब हो रहा था। उसने अपने पिताजी को कह दिया कि ऐसे विवाह का कोई मतलब नहीं जो उसे याद ही नहीं है। उसके पिताजी ने मुझसे कहा कि मैं उसे समझाऊँ। मैं क्या समझाता? मेरे समझाने से वो और चिढ़ती, मुझे और बुरा समझती।

आजकल वो दिल्ली में है। सुबह दफ़्तर जाती है तो शाम को देर से घर आती है। उसकी माँ उसकी देखभाल के लिए उसके साथ ही रहती है। कलिका को साल की सबसे अच्छी कर्मचारी होने का पुरस्कार भी प्राप्त हो चुका है। मैं भी सुबह से शाम तक यही करता हूँ। हम दोनों इंसान से मशीन बन गये हैं। दिन-ब-दिन अपनी कम्पनी में और ज़्यादा महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। शायद एक दिन हम अपनी अपनी कंपनी के प्रबंध निदेशक भी बन जाएँ।

स्वप्न में हुए एक सुंदर प्रणय को उचक कर छू लेना चाहता हूँ

लेकिन चंपा मेरी उचक से परे खिलती है

मैं उसकी छांव में बैठा उसके झरने की प्रतीक्षा करता हूँ

–    गीत चतुर्वेदी

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कहानी : महासम्मोहन   Leave a comment

(१)

विधान लोनी का जन्म 26 जनवरी 1950 को बनारस के जिला अस्पताल में हुआ था। उसके पिता निधान लोनी विश्वनाथ मंदिर के पास चाय बेचा करते थे। लोग कहते हैं कि विधान लोनी में उस लोदी वंश का डीएनए है जिसने उत्तर भारत और पंजाब के आसपास के इलाकों में सन 1451 से 1526 तक राज किया था। जब बाबर ने इब्राहिम लोदी को हराकर भारत में मुगलवंश की स्थापना की तब इब्राहिम लोदी का एक वंशज बनारस भाग आया और मुगलों को धोखा देने के लिए लोदी से लोनी बनकर हिन्दुओं के बीच हिन्दुओं की तरह रहने लगा।

विधान लोनी का बचपन विश्वनाथ मंदिर के आसपास ही बीता। अपने घरवालों और पड़ोसियों की देखा देखी वो भी भोलेनाथ का परमभक्त बन गया। विधान बचपन से ही बड़ा कल्पनाशील था। पढ़ने लिखने में तो उसका मन ज्यादा नहीं रमता था लेकिन वाद विवाद में उसे बड़ा मज़ा आता था। सिंहासन बत्तीसी, बैताल पच्चीसी, किस्सा-ए-तोता मैना, किस्सा-ए-हातिमताई आदि किताबें जो विश्वानाथ मंदिर के आसपास फुटपाथ पर बैठने वाले लोग बेचा करते थे उन्हें पढ़ने के बाद उन्हीं कहानियों में थोड़ा फेरबदल करके वो अपने दोस्तों को सुनाया करता। धीरे धीरे वो अपने मन से भूत प्रेतों की कहानियाँ गढ़कर अपने दोस्तों को सुनाने लगा। उसके सुनाने का अंदाज़ इतना अनूठा था कि उसके दोस्तों की डर के मारे सिट्टी पिट्टी गुम हो जाती थी और वो समझते थे कि ये घटना विधान के साथ सचमुच घटी है।

एक दिन विधान अपने घर से थोड़ी दूर पर स्थित बनारसी साड़ियों की एक बड़ी दूकान पर चाय देकर आ रहा था कि एक साइकल वाले ने पीछे से उसे टक्कर मार दी। उसके हाथ से गिलास रखने की जाली छूटकर गिर गई और सारे गिलास टूट गये। घर पहुँचने पर उसके पिता ने यह कहकर उसकी पिटाई कर दी कि वो अपनी कल्पना में खोया रहा होगा इसीलिए उसको सामने से आती साइकल नहीं दिखी होगी। पिटाई तो विधान की पहले भी हुई थी मगर इस बार उसके पिता ने उस पर जो बेबुनियाद इल्ज़ाम लगाया था वो विधान लोनी को सहन नहीं हुआ और वो अपने पिता की दूकान छोड़कर गंगा की तरफ भाग निकला यह कहते हुए कि मैं गंगा में डूबकर मरने जा रहा हूँ। उसका पिता निधान लोनी जानता था कि विधान को तैरना अच्छी तरह आता है इसलिए उसके डूबने का कोई खतरा नहीं है। उसने सोचा कि अभी थोड़ी देर बाद जब गुस्सा उतरेगा तो विधान हर बार की तरह इस बार भी फिर से काम पर आ जाएगा। मगर होनी को तो कुछ और ही मंजूर था।

काफी देर तक इधर उधर घूमता विधान मणिकर्णिका घाट पर पहुँचा। वहाँ पहुँचकर उसे भूख लगी। तब उसने सोचा कि बस बहुत हो गया अब घर वापस चलना चाहिए। ठीक उसी समय किसी ने पुकारा, “बम बम भोले! अरे बच्चा जरा इस कमंडल में पानी तो भरकर ला। साधू की सेवा करेगा तो भोलेनाथ तुझ पर प्रसन्न होंगे।”

विधान मुड़ा तो देखा चार बाबाओं की एक टोली अपने लिए खाना पका रही है। उसने साधू से कमंडल लिया और घाट के किनारे लगी नाव पर चढ़कर नाव की दूसरी तरफ से कमंडल को गंगा में डुबोकर पानी भर लाया। साधू ने उसके चेहरे की तरफ देखकर पूछा, “बच्चा भूख लगी है क्या?”

विधान के हाँ में सर हिलाने पर बाबा ने जस्ते की एक पुरानी घिसी पिटी थाली निकाली और विधान को खाने के लिए खिचड़ी परोस दी। भूखा विधान थोड़ी ही देर में सारी खिचड़ी चट कर गया। बाबा ने फिर पूछा, “बच्चा, हम तो तीर्थयात्रा पर निकले हैं इसके बाद संगम, फिर अयोध्या फिर नैमिषारण्य और उसके बाद हरिद्वार जाएँगें। तुझे अगर हमारे साथ चलना हो तो चल।”

विधान लोनी का गोरा चेहरा खुशी से दमक उठा। यही तो वह चाहता था। कहानियों में नये नये स्थानों के बारे में पढ़कर वो बड़ा रोमांचित होता था। अक्सर उसका मन करता कि उड़ कर जाए और नये नये जंगलों, नदियों और पर्वतों पर घूमे। क्या पता कहीं कोई छुपा हुआ खजाना उसे मिल जाये और उसकी जिंदगी बदल जाये या फिर घूमते घूमते कहीं भगवान से ही भेंट हो जाये तो उसका धरती पर जन्म लेना सफल हो जाये। यही सब सोचकर और अपने पिता की डाँटमार से कुछ दिनों तक बचा रहने के लिए विधान ने हाँ कर दी। उस समय विधान की उम्र केवल तेरह साल की थी और वो सरकारी विद्यालय में कक्षा आठ का छात्र था।

(२)

जनवरी 1963 की उस सर्द रात को इलाहाबाद स्टेशन के प्रतीक्षालय में विधान ने एक अजीबोगरीब स्वप्न देखा। उसने देखा कि वो एक पक्षी की तरह अपने हाथ पाँव हिलाते हुये आकाश में उड़ता जा रहा है। सूरज धीरे धीरे लाल होता जा रहा है और उसकी लाली धीरे धीरे धरती के पेड़ों को भी लाल रंग से रँगती जा रही है। इस लाल प्रकाश में नहाया वो उड़ता जा रहा है। अचानक उसको लगा कि वो अपने हाथ पाँव नहीं हिला पा रहा है और इस वज़ह से उसके उड़ने की शक्ति समाप्त हो गई है और वो तेजी से धरती की तरफ गिर रहा है। जमीन पर लाल रंग के पानी वाली एक नदी बह रही है वो उसी में गिरने वाला है। फिर उसने देखा कि वो उस लाल पानी वाली नदी में तैरने लगा है। उसे तैरने में खूब मजा आ रहा है और वो अपनी पूरी ताकत से तैरता जा रहा है। अचानक उसे लगा कि वो तैरते तैरते बहुत थक गया है। उसने अपने हाथ पाँव चलाने बंद कर दिये हैं मगर फिर भी वो तैर रहा है। यूँ तैरते तैरते जल्द ही उसे नींद आ गई और वो सपने में सो गया।

हुआ ये कि इलाहाबाद स्टेशन पर जब साधुओं ने ठंड से बचने के लिए चिलम जलाई तो विधान ने एक नया अनुभव हासिल करने के लिए उनके साथ चिलम के दो चार कश लगा लिये। बीड़ी और सिगरेट का आनंद तो वो पहले ही अपने दोस्तों के साथ एक दो बार छुपकर ले चुका था लेकिन गाँजा इसके पहले उसने कभी नहीं पिया था। जल्द ही उसे चक्कर आने लगे और कुछ ही देर बाद वो आधी बेहोशी की स्थिति में पहुँच गया। धीरे धीरे उसे नींद भी आ गई मगर सपने लगातार आते रहे। जिस साधू ने उसे भोजन दिया था थोड़ी देर बाद वो भी विधान के साथ उसी कंबल में लेट गया और उसके बाद विधान ने वो सपना देखा जिसका जिक्र ऊपर किया जा चुका है। इस सपने के साथ एक अजीब बात ये थी कि जागने पर भी ये सपना विधान को पूरी तरह याद था।

अगले दिन अयोध्या की एक धर्मशाला में गाँजा पीकर सोने के बाद विधान ने फिर वैसा ही सपना देखा। उसे आश्चर्य हुआ कि एक ही सपना वो दो बार कैसे देख सकता है क्योंकि आज तक उसके साथ ऐसा कभी नहीं हुआ था कि उसने एक ही सपना जस का तस दो बार देखा हो। कुछ दिनों तक यही चलता रहा। विधान गाँजा पीकर सोता और वही सपना फिर से देखता। अयोध्या से साधुओं की वो टोली नैमिषारण्य पहुँची। वहाँ कुछ दिनों तक तो विधान दिन भर जंगलों में घूमता फिरता रहा फिर धीरे धीरे उसे बोरियत होने लगी। उसने साधुओं से कहा कि वो अपने घर लौटना चाहता है। साधुओं ने विधान को पानी लाने भेजकर आपस में सलाह मशविरा किया और विधान के लौटने पर उसे बताया कि अब हम लोग ऋषिकेश जा रहे हैं। अगर तुम्हें पहाड़ देखने का शौक है तो साथ चलो वरना अगली रेलगाड़ी से अपने घर को लौट जाओ।

विधान को घर की याद भी आ रही थी और वो पहाड़ भी देखना चाहता था। अंत में सोचविचारकर उसने यही निर्णय लिया कि ऋषिकेश में पहाड़ देखकर वह सीधा बनारस लौट जाएगा। इस तरह वो ऋषिकेश पहुँचा। शुरू शुरू में कुछ दिन तो उसे पहाड़ बहुत अच्छे और अनूठे लगे मगर जल्द ही वो पहाड़ों से भी ऊब गया। फिर एक दिन वो बिना साधुओं को कुछ बताए हरिद्वार भाग आया और वहाँ से बनारस के लिए ट्रेन पकड़ ली। ट्रेन के जनरल डिब्बे में बैठकर वो बेटिकट बनारस पहुँचा।

 (३)

अब तो विधान को जब भी मार पड़ती वो कुछ दिनों के लिए घर से गायब हो जाता। कभी किसी दोस्त के यहाँ रुक जाता, कभी किसी रिश्तेदार के यहाँ भाग जाता। विधान की आवारागर्दी देखकर धीरे धीरे निधान लोनी को यकीन होने लगा कि विधान अपने जीवन में कुछ कर नहीं पाएगा। वो भी उन्हीं की तरह चाय बेचेगा। अंत में उन्होंने निर्णय लिया कि विधान की शादी कर देनी चाहिए वरना ये बार बार घर से भागता रहेगा। यह सोचकर उन्होंने अपने मित्रों और रिश्तेदारों में ये बात फैलानी शुरू कर दी कि वो विधान की शादी जल्द से जल्द कर देना चाहते हैं। बात फैली तो विधान के लिए रिश्ते आने भी शुरू हो गये। अंत में निधान ने सारनाथ की एक लड़की से विधान का विवाह तय कर दिया।

जब विधान को ये बात पता चली तो वो जाकर अपने पिता से बोला, “पिताजी अभी मेरी उम्र ही क्या है। अभी तो मुझे सारा देश घूमना है और हो सके तो विदेश भी जाना है। मौका मिलेगा तो मैं आगे पढ़ना भी चाहता हूँ। आप इतनी जल्दी मेरा विवाह क्यों कर देना चाहते हैं।”

निधान बोले, “सारा देश घूमने के लिए पैसा क्या तेरा बाप देगा। मैं यहाँ सुबह से शाम तक खटता हूँ तब किसी तरह से परिवार को दो जून की रोटी नसीब होती है। तुझे मेरे काम में हाथ बटाना चाहिए ताकि तेरे बूढ़े होते जा रहे पिता पर बोझ थोड़ा कम हो। देश घूमेंगे। मेरी सात पुश्तों में भी कोई देश घूमने नहीं गया। और घूम कर करना भी क्या है। हम तो दुनिया की सबसे पवित्र और सबसे अच्छी जगह पर रह रहे हैं। बनारस से अच्छी जगह दुनिया में और कौन सी है। भोलेनाथ और गंगा दोनों बगल में हैं। जब तक जिन्दा रहो रोज गंगास्नान करके भोले का दर्शन करो और मरो तो सीधा स्वर्ग। आदमी को और क्या चाहिए जीवन में।”

विधान बोला, “पिताजी, अभी मेरी शादी मत कीजिए। मैं आपके हाथ जोड़ता हूँ। पाँव पड़ता हूँ।”

निधान ने सोचा कि अचानक शादी तय हो जाने पर सारे लड़के थोड़ा बहुत नर्वस हो जाते हैं। विधान के साथ भी यही हो रहा है। दो चार दिन में सब ठीक हो जाएगा।

विधान अपने बाप के चेहरे को देखकर समझ गया कि उसकी बात का कोई असर उसके पिता पर होने वाला नहीं है। वो घर से भाग जाना चाहता था लेकिन कई बार घर से भागकर वो जान चुका था कि यहाँ घर पर कम से कम भूख लगने पर समय से खाना तो मिल जाता है। बाहर तो खाने तक का कोई ठिकाना नहीं होता।

विधान बड़ा उदास रहने लगा। अब न तो खाने में उसका मन लगता था, न आवारागर्दी में, न गंगा में, न भोलेनाथ में। उन दिनों प्रदेश में चुनाव होने वाले थे। ऐसे में उसके दोस्त ने उसे धर्मसेवा संघ का सदस्य बनने के लिए कहा। धर्मसेवा संघ को बने ज़्यादा दिन नहीं हुए थे और उसके उच्च पदाधिकारी ऐसे नवयुवकों की खोज में थे जो निःस्वार्थ भाव से धर्म की सेवा में अपना तन और मन अर्पित कर सकें। संघ का मुख्य काम धर्म का प्रचार प्रसार करना और आपदा के समय लोगों की मदद करना था मगर यह भी सच था कि संघ एक राष्ट्रवादी राजनीतिक दल से जुड़ा हुआ था और चुनाव के समय उस दल का प्रचार प्रसार और उस दल के लिए लोगों से वोट माँगने का काम करता था।

संघ का सदस्य बनने के बाद विधान का ज़्यादातर समय संघ के कार्यों में बीतने लगा। इससे उसके मन की उदासी धीरे धीरे कम होने लगी। संघ के उच्चाधिकारियों से उसकी जान पहचान दिनोंदिन बढ़ने लगी। ऐसे ही समय में एक दिन विधान की शादी हो गई। निधान ने विधान के लिए बड़ी सुन्दर पत्नी तलाश की थी ताकि विधान ज़्यादातर समय घर पर ही रहे और धीरे धीरे घर तथा दूकान के कामों में उसका हाथ बँटाने लगे।

विधान ने अपनी पत्नी को सुहागरात को ही साफ साफ बता दिया कि स्त्रियाँ उसे आकर्षित नहीं करतीं। उसे बलिष्ठ और हट्टे कट्टे पुरुष आकर्षित करते हैं। उसने यह शादी केवल अपने पिता के दबाव में आकर की है। वो उस तरह का भी पुरुष नहीं है जिसे पुरुषों और स्त्रियों में समान रूप से रुचि होती है।

विधान की पत्नी का नाम सुशीला था। वो सारनाथ के पास एक गाँव से आयी थी और उसकी शिक्षा केवल पाँचवीं कक्षा तक ही हुई थी। उसके माँ बाप बचपन में ही गुज़र चुके थे और उसके चाचा ने उसे पाल पोस कर बड़ा किया था। वो तो अपने माँ बाप की इकलौती लड़की थी मगर चाचा के चार बेटियाँ और थीं। उसके चाचा ने सारनाथ में एक पान की दूकान खोल रखी थी जिससे बड़ी मुश्किल से सबका गुज़ारा चल पाता था। अभी उन्हें चारों लड़कियों की शादी भी करनी थी। विधान से सारी बात जानकर उसे झटका तो लगा लेकिन उसके पास विधान के साथ रहने के अलावा और कोई चारा नहीं था।

(४)

दिन बीतने लगे। विधान ज़्यादातर समय घर के बाहर ही रहने लगा। वो तन मन धन से संघ के कार्यों के लिए समर्पित हो गया। निधान को बड़ा आश्चर्य हुआ कि इतनी सुन्दर पत्नी मिलने के बाद भी विधान घर पर नहीं रहता। निधान ने विधान की माँ को ये बात बताई तो वो भी बोली कि आप ठीक ही कहते हैं अब तक तो बहू को गर्भवती हो जाना चाहिए था। एक बच्चा अगर घर में होता तो विधान का भी मन घर में लगा रहता।

एक दिन जब विधान घर आया तो निधान ने उसको और सुशीला को अपने पास बुलाकर पूछा, “बहुत समय हो गया अब ये बताओ तुम लोग मुझे दादा कब बना रहे हो”।

विधान की माँ ने अपने बेटे का पक्ष लेते हुए बोली, “अब तक तो तुम्हें बच्चा हो जाना चाहिए था सुशीला कहीं तुम बाँझ तो नहीं हो।“

सुशीला क्या कहती? वो फूट-फूट कर रोने लगी। विधान की माँ ने समझा कि सुशीला सचमुच बाँझ है इसलिए रो रही है। उन्होंने सुशीला को खरी खोटी सुनानी शुरू कर दी। सुशीला कुछ देर तक तो सब सहती रही फिर आखिर उसके मुँह से निकल ही गया कि आपके बेटे को स्त्रियों में नहीं पुरुषों में दिलचस्पी है। इसके बाद तो सब को मानो साँप सूँघ गया।

पत्नी से घर वालों के सामने अपमानित होने के बाद विधान फौरन घर से बाहर निकल गया और गंगा की सीढ़ियों पर बैठकर आत्महत्या करने के बारे में सोचने लगा। सोचते सोचते उसे लगा कि मरने से पहले एक भार भोलेनाथ का दर्शन कर लेना चाहिए। यह विचार मन में आते ही वो विश्वनाथ मंदिर की तरफ निकल पड़ा। दर्शन करने के बाद मंदिर के पिछवाड़े पहुँचा जहाँ भोलेनाथ पर चढ़ाये हुए फूल, धतूरे इत्यादि फेंके जाते थे। उसने उस कचरे में से कुछ धतूरे और कनेर के फल इकट्ठा कर लिये। फिर गंगा तट पर बैठकर उसने धतूरे और कनेर के बीज निकाले और वहीं पड़ा एक पत्थर उठाकर उसे घाट की सीढ़ियों पर पीस डाला। उस चूर्ण के अत्यन्त कड़वे स्वाद के बावजूद उसने गंगाजल की मदद से उसे निगल लिया। फिर वो गंगा के किनारे किनारे सीढ़ियों पर चलते चलते ऐसी जगह पहुँचा जहाँ इक्का दुक्का लोग ही बैठे थे। कुछ ही क्षणों बाद विधान को उल्टियाँ होने लगीं। पता नहीं यह गंगाजल का असर था या विधान ने कुछ ज्यादा ही मात्रा में जहरीले बीजों का सेवन कर लिया था। इन उल्टियों से उसके पेट में गया अधिकांश जहरीला पदार्थ बाहर आ गया। धीरे धीरे बचे हुए जहरीले पदार्थों ने उसके दिमाग पर असर करना शुरू कर दिया। उसने देखा कि मछलियों के बड़े बड़े पंख निकल आये हैं और वो पानी में न तैरकर हवा में उड़ रही हैं। सारी नौकाएँ रथों में बदल गई हैं और पानी पर चल रही हैं। गंगा के धारा के बीचोबीच से एक जटाधारी निकलकर उसकी ओर बढ़ रहा है। पास आने पर विधान ने देखा कि उस जटाधारी के गले से नाग लिपटा हुआ है। तब विधान को समझ आया कि ये जटाधारी और कोई नहीं स्वयं भोलेनाथ हैं।

विधान के पास आकर भोलेनाथ बोले,  “विधान वर माँगो।”

विधान बोला, “प्रभो मैं मर जाना चाहता हूँ। कृपया मुझे अपनी शरण में ले लीजिए।”

भोलेनाथ बोले, “वत्स, अभी तुम्हारी मृत्यु का समय नहीं आया है इसलिए कोई और वरदान माँगो।”

यह सुनकर विधान को झटका लगा कि अभी उसे और जीना पड़ेगा। अपनी पत्नी से और अपमानित होना पड़ेगा और अगर बात मुहल्ले वालों को पता चल गई तो हर पल, हर क्षण, हर किसी से अपमानित होना पड़ेगा। उसने अपनी यह समस्या भोलेनाथ के सामने रखी। भोलेनाथ कुछ क्षण सोचते रहे फिर बोले, “वत्स इसका तो एक ही इलाज है कि मैं तुम्हें सम्मोहनी शक्ति प्रदान कर दूँ ताकि तुम सबको सम्मोहित करके इस बात फैलने से रोक सको। ठीक है मैं तुम्हारी जिह्वा को सम्मोहनी शक्ति प्रदान करता हूँ। अब तुम अपनी वाणी से किसी को भी सम्मोहित कर सकोगे। लेकिन इसके लिये तुम्हें निरंतर अभ्यास की आवश्यकता पड़ेगी। अभ्यास करते रहने से धीरे धीरे यह शक्ति बढ़ती जाएगी और एक दिन यह शक्ति इतनी बढ़ सकती है कि तुम अपनी वाणी से सारी दुनिया को सम्मोहित कर लो। सबकुछ तुम्हारे श्रम और लगन से किये गये अभ्यास पर निर्भर करता है। किन्तु ध्यान रहे तुम किसी को कभी बताना मत कि ऐसी कोई शक्ति तुम्हारे पास है। ऐसा करते ही तुम शक्तिहीन हो जाओगे। एक बात और, अब से आईना कम से कम देखना। इस शक्ति के साथ सबसे बड़ी समस्या यहीये होती है कि इसको धारण करने वाले के मन में आईना देखने की बड़ी प्रबल इच्छा होती है। अगर वो अपनी इस इच्छा पर काबू नहीं कर पाता तो आईना देखते देखते वो अपने प्रतिबिम्ब से बातें करने लगता है और उस स्थिति में वो स्वतः सम्मोहित हो जाता है। अपने ही सम्मोहन में जकड़ा व्यक्ति कुछ ही देर में इतना आत्ममुग्ध हो जाता है कि उसे अपने अलावा बाकी सारी दुनिया तुच्छ लगने लगती है। अंततोगत्वा वो इस दुनिया से मुक्ति पाने का फैसला कर लेता है। इसलिए अब से तुम आईना कम से कम देखना।”

विधान बोला. “जैसी आपकी इच्छा प्रभो।”

इसके बाद विधान की चेतना लुप्त होती चली गई।

(५)

जब विधान को होश आया तो वो अपने बिस्तर में लेटा हुआ था। उसकी पत्नी उसके सिरहाने बैठकर पंखा झल रही थी। धीरे धीरे विधान को सबकुछ याद आना शुरू हो गया। अर्द्धविक्षिप्तावस्था में देखा गया स्वप्न विधान को ज्यों का त्यों याद था। विधान समझ नहीं पा रहा था कि जो कुछ उसने देखा था वो सपना था या सच इसलिए उसने सबसे पहले अपनी पत्नी पर ही सम्मोहनी शक्ति का इस्तेमाल करने का निर्णय लिया और बोला, “सुशीला आज भोलेनाथ ने मुझे निश्चित मृत्यु से बचा लिया। अब मैं अपना सारा जीवन उन्हीं को समर्पित कर देना चाहता हूँ। कल से मैं घर छोड़ दूँगा और देश भ्रमण पर निकल जाऊँगा। अब गृहस्थ आश्रम से मेरा कोई लेना देना नहीं होगा। अब मैं केवल धर्म के प्रचार और प्रसार में अपना सारा जीवन बिता दूँगा।”

सुशीला बोली, “ये तो बड़ी ख़ुशी की बात है। आप ऐसा ही कीजिए। धर्म और ईश्वर के लिए कार्य करते हुए आपको बहुत पूण्य मिलेगा और उसका आधा हिस्सा अर्द्धांगिनी होने के नाते मुझे भी मिलेगा। इस तरह से हम दोनों को  निश्चय ही मोक्ष की प्राप्ति होगी। इससे ज्यादा एक मनुष्य को और क्या चाहिए। मैं सदा आपको अपने मन मन्दिर का देवता मानकर पूजूँगी।”

विधान चौंक उठा। भले ही उसने अर्द्धविक्षिप्तावस्था में स्वप्न देखा हो मगर सम्मोहन शक्ति उसकी वाणी में सचमुच आ चुकी थी। उसने मन ही मन भोलेनाथ को धन्यवाद दिया और अगले ही दिन अपनी पत्नी को छोड़कर धर्मसेवा संघ के प्रचारक के रूप में देश भ्रमण पर निकल गया।

विधान देश भर में जहाँ जहाँ गया वहाँ वहाँ उसने अपनी वाणी से सम्मोहित करके बहुत सारे लोगों को धर्मसेवा संघ का सदस्य बन दिया। दस वर्षों तक विधान इसी तरह भटकता रहा और देश के कोने कोने से लोगों को घर्मसेवा संघ का सदस्य बनाता रहा। जब वह वापस लौटा तो उसकी मेहनत और लगन को देखकर उसे धर्मसेवा संघ का प्रदेश अध्यक्ष चुन लिया गया। निरंतर अभ्यास से उसकी वाणी में मौज़ूद सम्मोहन शक्ति बहुत बढ़ गई थी और अब वो अपनी वाणी से सैकड़ों लोगों को एक साथ सम्मोहित कर लेता था।

धर्मसेवा संघ में विधान लोनी का प्रभाव और काम देखकर राष्ट्रवादी पार्टी ने प्रदेश के अगले चुनावों का भार उसे सौंप दिया। ये उन दिनों की बात है जब आजादी के समय से चली आ रही पुरानी सरकार से प्रदेश के लोगों का मोहभंग हो चुका था और वो एक नई और ईमानदार सरकार चाहते थे। राष्ट्रवादी पार्टी को उन दिनों विधान सभा की अस्सी सीटों में से एक या दो सीटें मिला करती थीं। ऐसे में किसी को भी विधान से कोई चमत्कार की उम्मीद नहीं थी हाँ राष्ट्रवादी पार्टी के उच्चाधिकारी यह जरूर चाहते थे कि प्रदेश में पार्टी की स्थिति कुछ तो बेहतर हो और कम से कम इन विधान सभा चुनावों में वो दहाई के आँकड़े तक तो पहुँचें।

लेकिन विधान लोनी के मन में तो कुछ और चल रहा था। अब उसे यह अहसास होने लगा था कि उसकी सम्मोहन शक्ति क्या क्या गुल खिला सकती है। बनारस शहर से बाहर निकलकर सुल्तानपुर रोड़ पर आते ही एक बहुत पुरानी मस्जिद पड़ती थी। लोग कहते थे कि पहले इस मस्जिद की जगह एक शिव मंदिर था जिसे तुड़वाकर औरंगजेब ने यह मस्जिद बनवा दी थी। इस मस्जिद को औरंगी मस्जिद भी कहा जाता था। एक दिन विधान लोनी ने धर्मसेवा संघ के एक हजार कार्यकर्ताओं को उस मस्जिद से थोड़ी दूर एक मैदान में इकट्ठा किया और उनसे बोला, “आप तो जानते ही हैं कि भगवान भोलेनाथ की मुझपर असीम कृपा है। आज रात भोलेनाथ मेरे सपने में आये थे। उन्होंने कहा कि औरंगी मस्जिद जिस शिव मंदिर पर बनी है वो मुझे काशी विश्वनाथ के समान ही प्रिय है। उन्होंने हमें ये आदेश दिया है कि इस मस्जिद को तोड़कर हम यहाँ पर फिर से शिव मन्दिर का निर्माण करें।”

विधान के शब्दों की सम्मोहन शक्ति ने फ़ौरन अपना असर दिखना शुरू किया और एक हजार लोगों की भीड़ ‘हर हर महादेव’ का नारा लगाते हुए मस्जिद की ओर बढ़ गई। भीड़ को नियंत्रण करने के लिए लगाये गये पुलिसवाले भी विधान का भाषण सुनकर पूरी तरह सम्मोहित हो चुके थे। इस भीड़ ने देखते ही देखते मस्जिद का नामोनिशान मिटा दिया। जैसे जैसे ये खबर फैली देश भर में दंगे फैले। दंगों पर तो धीरे धीरे काबू पा लिया गया लेकिन इन दंगों से नफ़रत के बीज छिटककर देश के कोने कोने में फैल गये। चुनाव होते होते इन बीजों से नफ़रत के पेड़ उग आये। हवाएँ चलीं और इन पेड़ों से नफ़रत की खुशबू उड़-उड़कर देश भर में फैलने लगी। लोगों को हिन्दू मुसलमानों की लड़ाईयों के तमाम किस्से याद आने लगे और जिस राष्ट्रवादी पार्टी का प्रदेश में कुछ महीने पहले तक नामोनिशान नहीं था वो दो तिहाई बहुमत से सत्ता में आ गई। राष्ट्रवादी पार्टी ने प्रदेश स्तर के एक नेता को मुख्यमंत्री बना दिया।

(६)

विधान का कद धर्मसेवा संघ में बढ़ता ही चला गया। धीरे धीरे पाँच वर्ष बीत गये और अगला चुनाव नजदीक आ गया। नफ़रत के पेड़ अब मुरझा चुके थे। औरंगी मस्जिद तो तोड़ी जा चुकी थी लेकिन वहाँ शिव मंदिर अब तक नहीं बनाया जा सका था। अब धीरे धीरे लोगों की समझ में आने लगा था कि धर्म के नाम पर राष्ट्रवादी पार्टी ने उन्हें मूर्ख बनाया था ताकि वो सत्ता हासिल करने में कामयाब हो सके।

विधान को अहसास होने लगा था कि यदि ज़ल्द ही कुछ किया न गया तो इस बार राष्ट्रवादी पार्टी चुनाव हार जाएगी। उन्हीं दिनों राष्ट्रवादी पार्टी के अध्यक्ष का बनारस आना हुआ। उनके लिए सारा प्रबंध करने की जिम्मेदारी विधान को सौंप दी गई। विधान अपनी सेवा और अपनी वाणी में मौजूद सम्मोहन शक्ति से उन्हें यह विश्वास दिलाने में कामयाब हो गया कि यदि विधान को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया जाय तो पार्टी इस बार भी प्रदेश का विधान सभा चुनाव जीत जाएगी। अध्यक्ष महोदय ने दिल्ली पहुँचते ही विधान को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया। अब बारी थी विधान को अपनी वाणी में मौजूद सम्मोहन शक्ति का जलवा दिखाने की। वो ये बात भी समझ चुका था कि इस बार धर्म का मुद्दा नहीं चलेगा इसलिए इस बार उसने विकास को मुद्दा बनाया। गरीबों और किसानों से भरे हुए इस प्रदेश में लोगों को सुनहरे सपने के अलावा और क्या चाहिए था। हर तरफ विकास, विकास, विकास गूँजने लगा। विधान जहाँ भी चुनावी सभाएँ करता वहाँ लाखों की संख्या में लोग उसे सुनने आते और उसकी वाणी में मौजूद सम्मोहन शक्ति से पूरी तरह सम्मोहित होकर लौटते। जब तक चुनावों की घोषणा हुई पूरा प्रदेश विकास के जादूई गोले में झाँककर सम्मोहित हो चुका था। चुनाव हुए तो प्रदेश में अस्सी प्रतिशत का रिकार्ड मतदान हुआ।  प्रदेश की सारी की सारी सीटें राष्ट्रवादी पार्टी को मिलीं।

विधान को प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया गया। मुख्यमंत्री बनने के बाद विधान को वो सबकुछ हासिल हो गया जिसका एक आम आदमी केवल स्वप्न ही देख सकता था। लेकिन एक समस्या अब भी थी। वो किसी को ये नहीं बता सकता था कि भोलेनाथ के वरदान के परिणामस्वरूप उसकी वाणी में सम्मोहन शक्ति का निवास है और इस शक्ति की सहायता से वो पूरे विश्व पर राज कर सकता है। किसी को न बता पाने के कारण उसका मन बार बार आईने में देखकर ख़ुद से बातें करने के लिए मचलने लगता। लेकिन हर बार उसे भोलेनाथ की बताई बात याद आ जाती और वो मन मसोसकर रह जाता था।

मुख्यमंत्री बनने के बाद विधान का ध्यान ख़ुद को सजाने सँवारने पर गया। उसके लिए हर हफ़्ते एक नया सूट सिला जाने लगा। कागज़ों पर यही दिखाया जाता कि यह सूट किसी ने मुख्यमंत्री महोदय को तोहफ़े में दिया है। विधान का मन प्रदेश के बड़े बड़े लोगों में उठने बैठने के लिए भी मचलने लगा। सो अक्सर वो बड़े बड़े लोगों की बड़ी बड़ी बैठकों और पार्टियों में जाने लगा। उसने एक चौड़ी छाती वाले अभिनेता को अपने प्रदेश का ब्रांड एम्बेसडर बना लिया। देखते ही देखते जिन जमीनों पर कल तक खेती होती थी उन पर बड़े बड़े कारखाने और बड़ी बड़ी इमारतें खड़ी होने लगीं। किसानों के गाँव हों या या शहरों में बसी झुग्गी झोंपड़ियाँ सब रातोंरात खाली हो जाती थीं और अगले दिन सुबह से ही वहाँ बड़े बड़े बुलडोजर चलने लगते थे। कोई आवाज़ उठती थी तो उसे मुख्यमंत्री निवास आने का निमंत्रण दिया जाता था जहाँ जाने के बाद वो आवाज़ इस कदर सम्मोहित होकर लौटती थी कि फिर वो आजीवन विधान का गुणगान करती रहती थी। प्रदेश के विकास का सूचकांक धड़ाधड़ ऊपर जाने लगा और मानवता का सूचकांक उतनी ही तेज़ गति से नीचे गिरने लगा। देश भर में ये बात फैलने लगी कि विधान के प्रदेश का विकास देश में सबसे तेज़ गति से हो रहा है। इस तरह पाँच साल तक जनता विधान के सम्मोहन में बँधकर सोती रही और उसी नींद में चलते हुए पाँच साल बाद फिर से विधान को मुख्यमंत्री चुन आई।

(७)

विधान को दुबारा मुख्यमंत्री बने तीन साल गुज़र गये और देश के लोकसभा चुनाव सर पर आ गये। अब विधान का मन मुख्यमंत्री पद से ऊब चुका था। मुख्यमंत्री का सम्मान केवल उसके प्रदेश में ही होता है। अपने प्रदेश में तो वो राजा होता है लेकिन प्रदेश के बाहर जाते ही वो अपने प्रदेश की जनता का नौकर भर रह जाता है। विधान अब देश का प्रधानमंत्री बनना चाहता था। पार्टी में उससे आगे कई कद्दावर नेता देश के प्रधानमंत्री पद के दावेदार थे। लेकिन राष्ट्रवादी पार्टी अबतक कभी अपने दम पर देश में सरकार नहीं बना पाई थी। ऐसे में विधान ने एक एक करके पार्टी के सभी कद्दावर नेताओं से मिलना शुरू किया। जो नेता विधान से एक बार मिल लेता वो विधान की वाणी में मौजूद सम्मोहन शक्ति से बच न पाता। इस तरह धीरे धीरे विधान ने पार्टी के अधिकांश नेताओं को अपने पक्ष में कर लिया। परिणाम यह हुआ कि जब लोकसभा चुनावों की घोषणा होने पर पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई तो उसमें प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में विधान को चुन लिया गया। इसके परिणाम स्वरूप पार्टी के कई अन्य वरिष्ठ नेता जो प्रधानमंत्री बनने का सपना सँजोए हुए थे विधान से नाराज़ हो गए। लेकिन विधान के पास तो हर मर्ज़ की अचूक दवा के रूप में उसकी वाणी थी ही। वो एक एक करके नाराज़ नेताओं से मिलने लगा और एक एक करके पार्टी के वरिष्ठ नेता मीडिया को बताने लगे कि विधान प्रधानमंत्री पद के लिए सर्वथा उपयुक्त है और वो आने वाले चुनाव में विधान को पूरा सहयोग देंगे।

इस तरह पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को मनाने के बाद विधान पर लोकसभा चुनावों में पार्टी का प्रचार करने की जिम्मेदारी आ गई। इस बार विधान को बहुत ही कम समय में देश के अधिकांश मतदाताओं को सम्मोहित करना था। कार्य बहुत कठिन था इसलिए विधान रात में केवल चार-पाँच घंटे ही सोता था। सुबह से शाम तक वो हैलीकॉप्टर की मदद से एक चुनाव क्षेत्र से दूसरे चुनाव क्षेत्र में रैली करता रहता था। इस बात की चर्चा पूरे देश में हो रही थी कि विधान के भाषण बेहद अनूठे होते हैं। विधान को सुनने के लिए चुनाव क्षेत्र के कोने कोने से लोग आते थे। जब विधान बोलना शुरू करता था तो उसकी जिह्वा से अपने आप उस चुनाव क्षेत्र के इतिहास का वो काल सुनाई देने लगता था जिस पर वहाँ के लोगों को गर्व होता था। हर स्थान के इतिहास का कोई न कोई काल ऐसा होता है जिसपर वहाँ रहने वालों को गर्व होता है। विधान की वाणी से अपने आप उसी चुनाव क्षेत्र की भाषा निकलने लग जाती थी और रैली में आये हजारों हजार लोग पूरी तरह सम्मोहित होकर अपने घर लौटते थे।

इस तरह रात-दिन विधान ने मेहनत की। जब चुनाव परिणामों की घोषणा हुई तो राष्ट्रवादी पार्टी लोकसभा की दो तिहाई से ज़्यादा सीटों पर विजयी हुई। विधान ने सोचा कि थोड़ा वक्त और मिला होता तो लोकसभा की बाकी सीटें भी उसकी पार्टी के ही खाते में आतीं। कुछ भी हो आख़िरकार विधान की एक और ख़्वाहिश पूरी हो गई। वो देश का प्रधानमंत्री बन गया।

(८)

जैसे जैसे विधान की वाणी में सम्मोहन शक्ति बढ़ती जा रही थी विधान की महत्वाकांक्षा भी बढ़ती जा रही थी। अब वो चाहता था कि उसका देश अपने समाज में मौजूद तमाम बुराइयों के बावजूद कुछ ही वर्षों में दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश बन जाय। उसकी संस्कृति दुनिया की बाकी सारी संस्कृतियों को उखाड़ कर फेंक दे। उसका धर्म दुनिया का एकमात्र धर्म बन जाय और उसकी भाषा दुनिया की एकमात्र भाषा। दुनिया जो कुछ भी करे उससे सलाह लेकर करे। वो अमेरिका के राष्ट्रपति से भी ज्यादा शक्तिशाली आदमी बनना चाहता था। इसके लिए उसने दुनिया के कोने कोने में जाकर लोगों को अपनी वाणी से सम्मोहित करने का निश्चय किया।

सबसे पहले विधान जापान पहुँचा। वहाँ उसने बुद्ध पर बोलना शुरू किया। सम्मोहन शक्ति के कारण उसके मुँह से जापानी भाषा अपने आप निकलने लगी। उसने वही सब कहा जो वहाँ के लोग सुनना चाहते थे। कुछ ही देर में वहाँ खड़ी जनता पूरी तरह सम्मोहित हो चुकी थी। अब तो सम्मोहन शक्ति का प्रभाव इतना बढ़ चुका था कि विधान को टीवी पर देखने वाले या उसकी आवाज़ रेडियो पर सुनने वाले भी सम्मोहित होने लगे थे। जापान से अमेरिका, चीन, कनाडा, रूस, इस तरह विधान का सफर चलता रहा और जब वो भारत लौटा तो दुनिया के दस सबसे बड़े देशों की जनता पूरी तरह उसके शब्दों के सम्मोहन में बँध चुकी थी। अब विधान को विश्वास होने लगा था कि वो जो चाहे कर सकता है।

उसी रात विधान ने एक स्वप्न देखा। उसने देखा कि आसमान के नज़दीक कहीं बादलों में ख़ुदा, मसीहा, भोलेनाथ और अन्य धर्मों के अध्यक्षों की बैठक हो रही है। भोलेनाथ अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठे हैं और बाकी सब उनके सामने रखी अन्य कुर्सियों पर। थोड़ी देर तक सब आपस में खुसर पुसर करते रहे फिर अन्त में मसीहा भोलेनाथ से बोले, “आप समय के द्वारा हम सबसे पहले लाये गये हैं इसलिए आप हमारे बड़े भाई की तरह हैं। हम सब आपका सम्मान करते हैं लेकिन इस बार आपने ये कैसा वरदान दे दिया ब्रदर। अब तो सम्मोहन में बँधे सारे लोग आपका धर्म स्वीकार कर लेंगे और हम बिना प्रशंसा के भूखों मर जाएँगें। हमारे बीच हुए समझौते के अनुसार हममें से कोई एक यदि किसी इंसान को वरदान देता है तो दूसरा उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं करता। अब अगर आपने जल्द ही कुछ न किया तो हमें ये समझौता रद्द करना पड़ेगा।”

भोलेनाथ मुस्कुराकर बोले, “जैसा कि आप सब जानते हैं कि हमारे द्वारा दिये गये वरदानों में ही उनकी काट छुपी होती है। जैसे भस्मासुर वरदान के द्वारा प्राप्त शक्ति से स्वयं ही भस्म हो गया था वैसे ही सम्मोहन शक्ति भी स्वयं ही स्वयं को नष्ट करेगी। जल्द ही अपने सम्मोहन का शिकार विधान स्वयं हो जाएगा। अपने ही सम्मोहन में फँसकर वो ख़ुद स्वयं को नष्ट कर लेगा। आप सब निश्चिंत रहें बस कुछ ही दिनों की बात है फिर सब पहले जैसा हो जाएगा।”

डर के मारे विधान की नींद टूट गई। उसने बगल में रखे टेबल लैम्प का बटन दबाया। वातानुकूलित कमरे में भी उसका शरीर पसीने से नहाया हुआ था। तभी उसकी नज़र दीवार पर लगे आईने की तरफ गई। उसकी निगाह ख़ुद से मिली और उसे वरदान देते समय भोलेनाथ की बताई बात याद आने लगी। वो चिल्ला उठा, “नहीं मैं आत्महत्या कभी नहीं करूँगा। मुझे आत्महत्या नहीं करनी है। मैं आज के बाद आईना ही नहीं देखूँगा।”

विधान ने फौरन बगल में रखा पानी का गिलास उठाया और आईने पर दे मारा। आईना टूटकर नीचे गिर पड़ा। विधान ने उसी दिन अपने बँगले के सारे आईने निकलवा दिये। उसके मित्रों और जाननेवालों में ये ख़बर धीरे धीरे फैलने लगी कि विधान को आईने से डर लगने लगा है।

विधान दफ़्तर पहुँचा। रोज़ जिन आईनों को देखता हुआ वो गुज़र जाता था आज उन्हें देखते हुए वो डर के मारे भीतर तक काँप जाता था। दफ़्तर में बैठकर उसने थोड़ी देर तक सोच विचार किया फिर एक कार्यालय आदेश जारी किया कि प्रधानमंत्री कार्यालय में लगे सारे आईने चाहे वो शौचालय में ही क्यों न लगे हों निकालकर तोड़ दिये जायँ। शाम को विधान पार्टी के मुख्यालय में सभी विधायकों की एक कार्यशाला को सम्बोधित करने जाने वाला था। उसे याद आया कि वहाँ भी तो तमाम आईने लगे हुए हैं। उसने पार्टी के अध्यक्ष को बुलावाया जो उसके सम्मोहम में पूरी तरह बँधा हुआ था और दुनिया उसे विधान का दाहिना हाथ कहती थी। उसने फ़ौरन पार्टी मुख्यालय के सारे आईने निकलवाकर फिंकवा दिये। लेकिन दुनिया सिर्फ़ विधान के घर या दफ़्तर तक ही सीमित नहीं थी। दुनिया बहुत बड़ी थी और आईने दुनिया में हर जगह मौजूद थे। उसे जिस भी नई जगह जाना होता वहीं से आईने तुड़वाकर फिंकवा देने का अनुरोध करता। लेकिन दुनिया बगैर आईनों के कैसे चल सकती है। आईने न होते तो दुनिया इतनी ख़ूबसूरत न होती।

जैसे जैसे विधान का डर बढ़ता जा रहा था लोगों पर उसका सम्मोहन कमजोर पड़ता जा रहा था। विधान का सारा ध्यान तो एक स्वप्न को सच मानकर आईने तुड़वाकर फिंकवाने में लगा हुआ था। उसे अपने सम्मोहन के टूटने का पता तब चला जब एक दिन उसका दाहिना हाथ कहे जाने वाला पार्टी का अध्यक्ष एक बड़े डॉक्टर के साथ आया। डॉक्टर ने अपना स्टेथेस्कोप निकाला तो उसकी चमचमाती हुई चकरी को देखते ही विधान कुर्सी से उछल पड़ा और डॉक्टर से स्टेथोस्कोप कमरे के बाहर छोड़कर आने का अनुरोध करने लगा। डॉक्टर ने बगैर स्टेथेस्कोप के ही विधान की जाँच की और बाहर निकलकर पार्टी अध्यक्ष से बोला, “शारीरिक रूप से तो ये बिल्कुल भले चंगे हैं लेकिन इन्हें एक बड़ा ही विचित्र मानसिक रोग हो गया है इसे आईनोफ़ोबिया कहते हैं। थोड़ा बहुत तो ये रोग सारे शक्तिशाली लोगों को होता है लेकिन इनके केस में यह रोग बहुत ही भीषण रूप धारण कर चुका है। इन्हें जल्द से जल्द पागलखाने भेजना होगा ताकि समय पर इनका इलाज हो सके वरना इस रोग में रोगी पहले तो कत्लेआम करवाता है और बाद में आत्महत्या कर लेता है।”

आजकल विधान पागलखाने में है। आईने जैसी कोई भी चीज देखते ही उसे पागलपन का दौरा पड़ने लगता है और वो बड़ी मुश्किल से डॉक्टरों के काबू में आता है। उसका सम्मोहन अब पूरी तरह से टूट चुका है और जनता का दिमाग अब धीरे धीरे दूसरी तरह के सम्मोहनों से भी लड़ना सीख रहा है।

कहानी : बदसूरत   Leave a comment

(१)

मैं जब भी आईना देखती हूँ, मुझे हमेशा दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की नज़र आती है। पता नहीं, वह खूबसूरत लड़की दुनिया को क्यों नहीं दिखाई पड़ती। दुनिया कहती है कि मैं काली हूँ, मोटी हूँ, बदसूरत हूँ। मेरी नाक बहुत बड़ी है, मेरी ठोढ़ी उभरी हुई है, मेरे बाल दोमुँहे हैं, मेरी आँखें छोटी हैं और भी न जाने क्या-क्या कहते हैं लोग मेरे बारे में। मैंने आज तक किसी को यह कहते नहीं सुना कि मेरा कोई भी अंग सही अनुपात में है।
मेरी बड़ी बहन, मेरी माँ और मेरे पिताजी भी यही कहते हैं। अपनी तस्वीरों में भी मुझे दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की नज़र आती है लेकिन दूसरों को वही सबसे बदसूरत लगती है। मैं कभी समझ नहीं पाई कि मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है। मैंने कई बार माँ को आईने में अपना प्रतिबिंब दिखाकर विश्वास दिलाने की कोशिश की, मगर आईने में भी वह खूबसूरत लड़की सिर्फ़ और सिर्फ़ मुझे ही नज़र आती है।
जब से मैंने होश सँभाला उसके बाद से कई वर्षों तक मैं सबसे लड़ती रही। यह साबित करने की कोशिश करती रही कि मैं बदसूरत नहीं हूँ। अंत में मैंने हार मान ली और स्वीकार कर लिया कि मैं दुनिया की सबसे बदसूरत लड़की हूँ। आईने में जो लड़की मुझे नज़र आती है वह कोई देवी है जिसने मेरे शरीर को माध्यम बनाया हुआ है। कहते हैं जिस खाली स्थान को भरने के लिए दिमाग के पास कोई तर्क नहीं होता उसे दिमाग ऊलजुलूल कल्पनाओं द्वारा भर देता है।
पहली बार मेरा चेहरा देखकर मेरे माता-पिता ने यही सोचा होगा कि यह लड़की जिंदगी भर लोगों के घरों में झाड़ू-पोंछा करके या फिर मेहनत-मजदूरी करके अपना जीवन गुजारेगी। मैं अक्सर अनुमान लगाने की कोशिश करती हूँ कि खूबसूरत लड़की के माता-पिता उसके पैदा होने पर क्या सोचते होंगे? यही न कि इसकी शादी या तो खूब कमाने वाले लड़के से होगी या फिर यह फ़िल्मों में नायिका का काम करेगी, नहीं तो कम से कम मॉडल बन ही जाएगी। बाकी बचती हैं सामान्य लड़कियाँ जिनके भविष्य में एक सामान्य जीवन और सामान्य मौत होती है। कैसी विडंबना है कि पुरुष का भविष्य ईश्वर भी नहीं जान सकते लेकिन ज्यादातर लड़कियों का भविष्य उनके पैदा होते ही निश्चित हो जाता है।
मोटी, काली, बदसूरत, भैंस, चुड़ैल, राक्षसी कितने सारे नाम थे मेरे। कभी-कभी मुझे लगता है कि पुरा-कथाओं में जिन्हें चुडैल और राक्षसी बताया जाता है वो सब मेरी ही तरह बदसूरत लड़कियाँ रही होंगी। उन्हें इसलिए जिंदा जला दिया गया होगा ताकि यह बदसूरत डीएनए ही जीवन के वृक्ष से गायब हो जाए। आश्चर्य तो इस बात का है कि यह डीएनए इतना जोर लगाए जाने के बाद भी क्रमिक विकास में जीवन के वृक्ष से गायब नहीं हुआ। इस डीएनए में आखिर ऐसा क्या खास था जो, नष्ट करने के तमाम प्रयासों के बावजूद, इसे अब तक बचाए रहा; मुझे इस कदर बदसूरत बनाने के लिए।
अगर दूसरों ने मुझे बताया न होता तो मुझे कभी पता ही नहीं चलता कि मैं बदसूरत हूँ और इस कदर बदसूरत हूँ। दर’असल आईने से मैं जब-जब पूछती हूँ कि मैं देखने में कैसी लगती हूँ तो वह कहता है कि मैं बहुत खूबसूरत हूँ। कई बार लगता है कि मुझ पर किसी देवी का साया-वाया कुछ नहीं है और यह सब आईने की कारस्तानी है। आईने ने बदसूरत लड़कियों को आत्महत्या करने से बचाने का यह तरीका खोजा है कि वह बदसूरत लड़कियों को उनका चेहरा नहीं बल्कि उनकी आत्मा दिखाता है लेकिन आत्मा इस दुनिया में कौन देखना चाहता है?
जितनी बदसूरत लोग मुझे बताते हैं इतनी बदसूरत न तो मेरी माँ है, न वह आदमी जिसे वह मेरा पिता बताती हैं। यह किसी और का डीएनए है जो मेरी माँ के डीएनए के साथ मिलकर मुझे ऐसा कुरूप बना गया है। लेकिन जब वह इतना ही कुरूप आदमी था तो मेरी माँ ने उसके साथ मिलकर एक नया डीएनए बनाया ही क्यों? आखिर मेरी माँ ने उस आदमी में ऐसा क्या देख लिया?
मैं बड़ी ही न होती तो कितना अच्छा होता। मेरी माँ दिन भर मेरा ख्याल रखती। मेरी बड़ी बहन मुझे अपनी गोदी में लिए रहती। खूबसूरत लोगों के लिए यह दुनिया बहुत खूबसूरत है लेकिन इसमें मेरे जैसी बदसूरत लड़कियों के लिए कोई स्थान नहीं है। मुझ जैसी लड़कियों को पैदा ही नहीं होना चाहिए। अगर पैदा हो भी गईं तो बचपन में ही मर जाना चाहिए और यदि इसके बावजूद भी बड़ी हो जाएँ तो उन्हें महत्वाकांक्षी नहीं होना चाहिए। महत्वाकांक्षा और बदसूरती साथ-साथ जीवित नहीं रह सकतीं। ऐसी लड़कियों के लिए अनपढ़ रहना और दूसरों के घरों में झाड़ू-पोंछा-बर्तन करके जीवन गुजारना ही अच्छा है। लेकिन मुझे यह बताने वाला कोई नहीं था इसलिए मैं सपने देखती गई और उन्हें पूरा करने के लिए मुझसे जो बन पड़ा करती गई।
सुंदरता के रसिया इस संसार में बदसूरती बुरी बनकर ज्यादा दिन जिंदा नहीं रह सकती। बदसूरती को अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए झक मारकर अच्छा बनना पड़ता है। सुंदरता का काम बुरी बनकर भी चल जाता है। सच कहूँ तो मुझे लगता है कि सुंदरता ज्यादातर बुरी ही होती है। मैंने हमेशा अच्छी लड़की बने रहने की कोशिश की मगर हर बार किसी न किसी घटना ने मुझे और बदसूरत बना दिया।
मुझे लगता है कि ज्यादातर खूबसूरत लड़कियों में बुद्धि नहीं होती और जिन थोड़ी-सी खूबसूरत लड़कियों में बुद्धि होती भी है उन्हें कभी उसका इस्तेमाल करने का मौका नहीं मिलता। दुनिया की सारी सुख-सुविधाएँ प्राप्त करने के लिए सुंदरता ही काफी है और जब सब कुछ आसानी से मिल रहा हो तो बुद्धि का इस्तेमाल कौन करता है। कहते हैं कि बुद्धि का इस्तेमाल करने में व्यायाम करने से अधिक ऊर्जा खर्च होती है।
मैं अक्सर सोचती हूँ कि क्या कभी कोई कविता बदसूरती की तारीफ़ में भी लिखी गई है। बदसूरती पर जब-जब लिखा गया है उसका मजाक उड़ाने के लिए ही लिखा गया है। क्या कभी कोई कवि मेरे जैसी लड़कियों पर कविता लिखने की हिम्मत कर सकेगा। नहीं न! क्योंकि कवि को कविता की प्रेरणा सुंदरता से ही मिलती है बदसूरती से नहीं।
क्रमिक विकास में इंसान ने सुंदरता से प्रेम करना और बदसूरती से घृणा करना कब सीखा होगा? जानवर सुंदरता और बदसूरती में अंतर करना नहीं जानते। बदसूरती से घृणा करना बंदर ने मनुष्य बनने के बाद धीरे-धीरे ही सीखा होगा। प्रकृति तो सबसे बराबर प्रेम करती है। सूरज मुझे देखकर अपना मुँह दूसरी तरफ नहीं घुमा लेता। हवा मुझसे दूर नहीं भागती। बारिश मुझे भी उतना ही भिगोती है जितना किसी और को।

(२)
जब मैं तीन साल की थी तो मुझे और बदसूरत बनाने वाली पहली घटना घटी। घर के ठीक बाहर पिताजी बड़े से कड़ाहे में गन्ने का रस गुड़ बनाने के लिए पका रहे थे। बगल में पड़ोस के बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे। गेंदबाज ने अपनी पूरी ताकत से एक बाउंसर फेंकी और बल्लेबाज ने पूरी ताकत से बल्ला घुमा दिया। गेंद जाकर गिरी पकते हुए गुड़ में और गुड़ उछलकर गिरा मेरे ऊपर। मैं बेहोश होकर गिर पड़ी। जब होश आया तो मेरे बदन पर ढेर सारी पट्टियाँ बँधी हुई थीं। कुछ सप्ताह बाद जब पट्टियाँ खोली गईं तो मेरी माँ ने मुझे बताया कि मेरे चेहरे से लेकर घुटनों तक की, शरीर के दाहिनी तरफ वाले हिस्से की, त्वचा काफी जल गई है। मैंने आइने में देखा कि मेरी त्वचा जलने के बाद कैसी लगती है तो उसमें मुझे अपनी त्वचा पहले से भी ज्यादा खूबसूरत लगी। झूठा आईना।
जब मैं पाँच साल की थी तो दूसरी घटना घटी। मेरे माता-पिता मुझे और दीदी को लेकर मेरे छोटे मामा की शादी में जा रहे थे। मुझे ट्रेन की खिड़की के बाहर पीछे की ओर भागते हुए वृक्षों को देखना अच्छा लगता था। मैं खिड़की से बाहर झाँक रही थी तभी अचानक इंजन ने जोर की सीटी दी और ढेर सारा धुआँ छोड़ा। उन दिनों ट्रेन कोयले के इंजन से चलती थी। हम इंजन से ठीक पीछे वाले डिब्बे में बैठे थे। एक अनबुझी चिंगारी मेरी दाहिनी आँख में आकर गिरी। मैं अपनी आँख भींचकर जोर से चिल्लाई। मेरी माँ ने पूछा क्या हुआ। मैंने बताया कि मेरी दाहिनी आँख में कुछ गिर गया है। माँ मेरी पुतलियाँ अपनी उँगलियों से खोलकर उसमें फूँक मारने लगी लेकिन मेरा दर्द कम नहीं हुआ। दर्द कम न होते देख माँ ने पीने का पानी उठाया और मेरी आँख पर पानी के छींटे मारे तब मुझे कुछ आराम मिला।
ट्रेन से उतरने के बाद माँ ने मेरी आँख गाँव के एक डॉक्टर को दिखाई। डॉक्टर ने कुछ दवाएँ खाने को कुछ आँख में डालने के लिए दीं। कुछ दिनों बाद मुझे दर्द और जलन से आराम तो मिल गया लेकिन आँख के सफेद हिस्से में एक काला निशान रह गया। मेरे जिस्म के इस सफेद हिस्से को भी एक काले दाग ने बदसूरत बना दिया।
मेरे गाँव में एक कहावत है कि बचपन में जो तीन बार निश्चित मौत से बच जाता है वो एक दिन कोई बड़ा काम कर गुजरता है। मैं भी एक बार नहीं तीन बार निश्चित मौत से बची हूँ। पहली बार तो मैं मौत से साफ-साफ बच गई। एक दिन जब मैं स्कूल जाने के लिए घर से निकली तो देखा कि एक ट्रैक्टर सीधा मेरी ओर ही चला आ रहा है। मैं डर के मारे जहाँ की तहाँ खड़ी रह गई। जब मेरे और ट्रैक्टर के बीच की दूरी चार या पाँच फ़ुट रह गई तो अचानक ट्रैक्टर मुड़ा और बगल में रखे कूड़े के ढेर पर चढ़कर रुक गया। तब जाकर ट्रैक्टर के पीछे-पीछे आ रहे लोगों ने उसे बंद किया।
दरअसल हुआ यह कि रामआसरे चाचा ने अपना खेत जुतवाने के लिए ट्रैक्टर मँगवाया। ट्रैक्टर वाला चाबी ट्रैक्टर में ही छोड़कर उन्हें बुलाने घर के अंदर गया कि तब तक चाचा का सात साल का लड़का न जाने कहाँ से आकर ड्राइविंग सीट पर बैठ गया। न जाने कैसे उसने ट्रैक्टर स्टार्ट कर लिया। न जाने कैसे उसने गियर लगा लिया। चाचा और ट्रैक्टर ड्राइवर दोनों आवाज सुनकर फौरन पीछे-पीछे भागे। चाचा ट्रैक्टर तक पहुँच भी गए मगर उन्होंने ब्रेक की जगह एक्सीलरेटर दबा दिया। इस तरह ट्रैक्टर भागता हुआ लगभग पाँच सौ मीटर दूर मेरे घर के सामने तक आया। मैं न जाने कैसे बच गई इस निश्चित मौत से।
दूसरी बार मैं स्कूल से वापस आ रही थी। अचानक चारकोल से भरे हुए दो ड्रम आकर गिरे। एक मेरी दायीं ओर दूसरा बायीं ओर। मैं अवाक खड़ी रह गई। तभी कड़ई काका दौड़कर कर आए और मुझे उठाकर अपने घर ले गये। मुझे कुछ समझ में नहीं आया कि आखिर हुआ क्या। लोगों ने जो बताया उसके अनुसार मेरे पीछे-पीछे एक घोड़ागाड़ी वाला आ रहा था। उसने चारकोल से भरे हुए चार ड्रम लाद रखे थे। दो इधर, दो उधर ताकि घोड़ागाड़ी का संतुलन बना रहे। अचानक उसका एक पहिया सड़क से नीचे उतरा। जहाँ उतरा वहाँ सड़क के बगल में काफी बड़ा गड्ढा था। पहिया गड्ढे में गया और घोड़ागाड़ी को जोरदार झटका लगा। जिस रस्सी से तारकोल के ड्रम बँधे हुये थे वो टूट गई और ऊपर वाला ड्रम मेरे सर के ऊपर से गुजरते हुये बायीं तरफ आकर गिरा और नीचे वाला ड्रम दायीं तरफ। मैं एक फुट इधर-उधर और होती तो चारकोल से भरे ड्रमों के नीचे पिस जाती। एक बार फिर मौत आते-आते रह गई। बस दाहिनी तरफ गिरे ड्रम ने लुढ़ककर मेरे पैर पर कुछ खरोंचें बना दीं।
तीसरी बार मैं शाम को बाजार से सामान लेकर वापस लौट रही थी। सूरज धीरे-धीरे छिप रहा था और अँधेरा धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा था। अमावास की रात थी इसलिए अँधेरा होने से पहले घर पहुँचने के चक्कर मे मैंने ठाकुरों के बगीचे से होकर जाने वाला छोटा रास्ता पकड़ लिया। ये रास्ता लोग कम ही इस्तेमाल करते थे क्योंकि ठाकुर नहीं चाहते थे कि उनके बगीचे से होकर जाने वाला यह पतला-सा रास्ता एक आम रास्ता बन जाय। गाँव में सभी मानते थे कि इस बगीचे में चुडैल रहती है जो रात बारह बजे के बाद बगीचे में घूमा करती है। लेकिन अभी तो सात भी नहीं बजे थे और इस वक्त तक इक्का-दुक्का लोग उस रास्ते से आते-जाते रहते थे। फिर भी डर के मारे मैं दौड़ने लगी। अचानक मेरा पैर पत्तों के ढेर पर पड़ा और मुझे लगा जैसे चुडैल ने मुझे पकड़ लिया है और मैं उसके द्वारा लगाई गई नर्क की आग में जल रही हूँ। इसके बाद मैं होश खो बैठी।
बाद में मुझे पता चला कि उस बगीचे में सूखे पत्तों को जलाने के लिए एक गड्ढा खोदा गया था। वो गड्ढा इतना गहरा था कि मेरे जैसी बच्ची उसमें गिर जाए तो खुद से बाहर न निकल सके। उस गड्ढे में रोज बगीचे में गिरे सूखे पत्ते इकट्ठा करके आग लगा दी जाती थी ताकि बगीचा भी साफ रहे और आग को फैलने से रोका जा सके। कुछ दिनों बाद आस-पास रहने वाले लोग कूड़ा करकट भी उसी गड्ढे में डालने लगे। उस गड्ढे में एक बार लगी आग कई-कई दिन तक सुलगती रहती थी। रोज शाम को पत्ते इकट्ठा करके उस गड्ढे को भर दिया जाता था। उस दिन मैं उस गड्ढे में गिर गई और अगर जयलाल चाचा उधर से न गुजर रहे होते और उन्होंने मुझे गड्ढे में गिरते हुए न देखा होता तो मैं जल कर मर गई होती। एक बार फिर मैं निश्चित मौत से बच गई मगर मेरे हाथ और पैर काफी जल गये।
कहते हैं हर वह चोट जो आपकी जान नहीं लेती आपको और मजबूत बना देती है। पर मुझे लगता है हर वह चोट जो आपकी जान नहीं लेती आपको और बदसूरत बना देती है।

(३)
ब्रह्मा ने राक्षस बनाए, देव बनाए, न जाने क्या-क्या बनाया मगर कभी इतना बदसूरत इंसान बनाया हो ऐसी कोई कहानी मैंने नहीं सुनी। तो आखिर उसके बनाए इंसान के वंशजों में यह बदसूरती आई कहाँ से। दर’असल सारी बदसूरत लड़कियाँ एक अभिशप्त अप्सरा की वंशज हैं। बहुत समय पहले की बात है, एक जंगल में एक ऋषि घोर तपस्या कर रहे थे। वो इंद्र को प्रसन्न करने के लिए तप कर रहे थे। इंद्र मन ही मन बड़े खुश थे कि त्रिदेवों को प्रसन्न करने के बजाय कोई मुझे प्रसन्न करने के लिए तप कर रहा है। वह तुरंत प्रकट होना चाहते थे लेकिन दूसरे देवताओं पर रोब जमाने के लिए भाव खा रहे थे। अपने जीवन में कितने सारे काम न चाहते हुए भी हमें केवल दूसरों पर रोब जमाने के लिए करने पड़ते हैं।
एक दिन इंद्र के सब्र का बाँध टूट गया। वह प्रकट हुए और बोले, ‘ऋषिवर वर माँगिए।’ ऋषि बोले, ‘मैंने तो सुना था कि आप तपस्या भंग करने के लिए पहले अग्नि, पवन इत्यादि देवताओं को भेजते हैं। फिर अप्सराओं के साथ कामदेव को भेजते हैं। पर आप तो स्वयं आ गए।’
अब इंद्र कैसे कहते कि कभी-कभी तो कोई मेरे नाम की तपस्या करता है। अगर मैं ऐसे लोगों की भी परीक्षा लेने लग जाऊँ तो मेरा कोई भक्त धरती पर बचेगा ही नहीं। लेकिन वो बोले, ‘मुनिवर आपकी भक्ति में मुझे कोई संदेह नहीं है। मैं जानता हूँ कि आप मोक्ष प्राप्ति के लिए तप कर रहे हैं। आप वर माँगिए।’
ऋषि बोले, ‘इंद्रदेव मैं मोक्ष प्राप्ति के लिए नहीं, अमुक अप्सरा को पाने के लिए तप कर रहा था। अगर आप प्रसन्न हैं तो अमुक अप्सरा का विवाह मेरे साथ करा दें।’
इंद्र के पास इतनी अप्सराएँ थीं कि उनके नाम भी उन्हें नहीं याद रहते थे। मगर एक भी अप्सरा कोई और माँग ले तो उनका जी जल जाता था। अंदर ही अंदर आगबबूला होते हुए वो बोले, ‘अमुक अप्सरा आप को नहीं मिल सकती ऋषिवर, कोई और वर माँगना हो तो माँगिए।’
ऋषि बोले, ‘नहीं इंद्रदेव मुझे तो अमुक अप्सरा ही चाहिए।’
अब तो इंद्र का क्रोध सातवें आसमान पर जा पहुँचा। उन्होंने सोचा इस तुच्छ ऋषि की ये मजाल। रहता झोपड़ी में है और शादी करना चाहता है अप्सरा से। क्या इसे नहीं पता कि अप्सराओं के सर्वाधिकार देवताओं के पास सुरक्षित हैं तथा उनका किसी भी रूप में पूर्ण एवं आंशिक प्रयोग किसी और के द्वारा किया जाना वर्जित है। इस तरह से अगर हम सबको अप्सराएँ बाँटते रहे तो हमारे लिए क्या बचेगा। हमें अप्सराओं की जगह अपनी पत्नियों का नृत्य देखना पड़ेगा। कुछ ऐसा उपाय करना होगा कि यह ऋषि किसी और देवता को प्रसन्न करके यही वर न माँग सके। भूतकाल में त्रिदेवों ने ऐसे-ऐसे वर दिए हैं कि अब मुझे उन पर भरोसा नहीं रहा।
थोड़ी देर सोचने के पश्चात इंद्र बोले, ‘हे तुच्छ ऋषि! तूने स्वर्ग की अप्सराओं पर कुदृष्टि डाली तुझे इसका दंड मिलेगा। जा आज के बाद तू कितनी भी तपस्या कर ले कोई भी देवता तुझ पर कभी प्रसन्न नहीं होगा।’
अब ऋषि की समझ में आया कि जिस देवता की वह तपस्या कर रहे थे वह इंसानों से भी ज्यादा स्वार्थी है। ऋषि भी गुस्से से तिलमिला उठे। शाप देने की शक्ति उनके पास भी थी। उन्होंने भी इंद्र को शाप दिया, ‘हे इंद्र तूने तुच्छ अप्सराओं के लिए मेरा अपमान किया है। ऐसी अप्सराएँ जिनमें खूबसूरती के अलावा और कुछ भी नहीं है। जो अपनी कमर हिलाकर देवों का मनोरंजन करने के अलावा और कुछ नहीं कर सकतीं। आज के बाद ये अप्सराएँ स्वर्ग से निकलकर मृत्यु आने तक धरती पर निवास करेंगी। स्वर्ग में आज के बाद कोई अप्सरा नहीं रह सकेगी। यदि किसी अप्सरा को जबरदस्ती स्वर्ग ले जाया गया तो वह जलकर भस्म हो जाएगी।’
इतना कहकर ऋषि चुप हो गए। थोड़ी देर तक चुप रहे। फिर उन्हें लगा कि अभी कसर बाकी है। वो फिर बोले, ‘और हाँ, अप्सराओं के जिस नृत्य पर तुम देवताओं का एकाधिकार था वह नृत्य अब सारा संसार देखेगा। अब से ये अप्सराएँ और इनकी वंशज धरती के सामान्य जन का मनोरंजन किया करेंगी। ये सब तब तक चलता रहेगा जब तक ये अप्सराएँ अपनी खूबसूरती के साथ-साथ अपने दिमाग का इस्तेमाल करना शुरू नहीं करतीं। जिस अप्सरा के कारण तुमने मेरा अपमान किया है वह आज से दुनिया की सबसे बदसूरत स्त्री हो जाएगी और उसके वंशज भी बदसूरत होंगे। उसका वंश मिटाने के लिए किया गया तुम्हारा हर प्रयास विफल साबित होगा और सृष्टि के अंत तक उसका वंश बचा रहेगा।’
बेचारी अप्सराओं को ब्रह्मा ने केवल खूबसूरत शरीर ही दिया था। दिमाग के नाम पर वो शून्य थीं। न तो इंद्र से, न ही मुनि से वे यह प्रश्न पूछ सकीं कि आप दोनों के इस झगड़े की सजा हमें क्यों मिल रही है? उन्होंने इस शाप को अपना दुर्भाग्य समझकर स्वीकार कर लिया। उस दिन के बाद से इन अप्सराओं ने धरती पर अपने खूबसूरत जिस्म के दम पर धन, वैभव और शक्ति इकट्ठा करना शुरू कर दिया। शाप के कारण बदसूरत बनी अमुक अप्सरा ऋषि के पास गई और उनसे अपनी खूबसूरती वापस देने की प्रार्थना करने लगी। ऋषि बोले, ‘मैं अपना शाप तो वापस नहीं ले सकता मगर इसका प्रभाव कम कर सकता हूँ, अगर तुम मुझसे विवाह करने को तैयार हो जाओ, तो।’
अप्सरा के हाँ कहने पर मुनि ने कहा, ‘तुम सूरज ढलने के बाद अपनी खूबसूरती वापस पा लोगी किंतु सूरज उगते ही फिर से बदसूरत हो जाओगी।’
अप्सरा बोली, ‘और मेरे वंशज जिन्हें आपने बदसूरत होने का शाप दिया है। उनका क्या?’
मुनि बोले, ‘मेरे और तुम्हारे वंशज बदसूरत भले ही हों लेकिन उनकी बुद्धि उत्तरोत्तर तीव्र होती जाएगी। सृष्टि के विकास क्रम में एक वक्त ऐसा भी आएगा जब मस्तिष्कविहीन सुंदरता लोगों के दिल को बहलाने वाला खिलौना मात्र बनकर रह जाएगी। अंततः इस दुनिया पर तीव्र बुद्धि वाले लोग ही शासन करेंगे।’
आप मुझे देवताओं का मजाक उड़ाने और धार्मिक कथाओं को विकृत करने के लिए कोस सकते हैं। पर यकीन कीजिए आज तक न जाने कितनों ने, न जाने कितनी बातों पर, न जाने कितनी बार मुझे कोसा है लेकिन उनके कोसने से मेरा कभी कुछ नहीं बिगड़ा। न ही ये देवता मेरा कुछ बिगाड़ सकते हैं जिनका मैं मजाक उड़ा रही हूँ। मेरे पापों का दंड ईश्वर ने मुझे बदसूरत बनाकर बचपन में ही दे दिया था। तब तो मैं जानती भी नहीं थी कि पाप किसे कहते हैं।

(४)
प्राइमरी स्कूल में मैं सबसे पीछे बैठती थी। मेरे साथ किसी के बैठने का तो सवाल ही नहीं उठता था। यहाँ तक कि कक्षा का सबसे भोंदू बच्चा जो शायद हाथी और इंसान के डीएनए के मिलन का परिणाम था वो भी मेरे साथ नहीं बैठता था। मैं अपना होमवर्क रोज पूरा करके जाती थी। अध्यापक द्वारा दिए गए पाठ नियम से याद करती थी। फिर भी न तो मुझे विद्यालय में कोई शाबासी मिलती थी न ही घर में। शायद सबने यह सोच लिया था कि अंततः मुझे झाड़ू-पोंछा करके ही अपनी जिंदगी गुजारनी पड़ेगी।
मैं मेधावी छात्रा नहीं थी लेकिन मुझे पढ़ना अच्छा लगता था। शायद समय काटने का मेरे पास यही एकमात्र तरीका भी था। कहानियाँ पढ़ने के लिए मैं कुछ भी कर सकती थी। पड़ोस में रहने वाले मनोज भैया से माँग-माँग कर मैंने तोता-मैना, अकबर-बीरबल, विक्रम-बेताल, सिंहासन बत्तीसी और पंचतंत्र की कहानियाँ न जाने कितनी बार पढ़ीं। न जाने कितनी बार मैं उन कहानियों की नायिका बनी। न जाने कितनी बार मेरी मृत्यु हुई। न जाने कितनी बार मेरा जन्म हुआ। फिर एक दिन मैं सोकर उठी तो वो सारी कहानियाँ भूल गई।
फिर मुझे कॉमिक्स पढ़ने का चस्का लगा। ये चस्का पहले मनोज भैया को लगा था फिर मुझे भी लग गया। वो कॉमिक्स ले आते और पढ़ने के बाद मुझे दे देते। चाचा चौधरी, ताऊजी, बिल्लू, पिंकी, राजन इकबाल, लम्बू-मोटू, क्रुकबांड, नागराज, सुपर कमांडो ध्रुव, परमाणु, डैडी जी और न जाने कितने सारे सुपर हीरो मेरे दोस्त बन गए। मैंने उनके साथ बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ लड़ीं। राका जैसे अमर खलनायक को हराया। बौना वामन जैसे खलनायक को भागने पर मजबूर किया। ब्रह्मांड के कोने-कोने से खलनायक आए और मुझसे हारकर वापस चले गए। नायक तो बहुत सारे थे पर मुझे प्रेम हुआ सुपर कमांडो ध्रुव से। क्यों? कारण था उसका विलक्षण दिमाग। वो अपने दिमाग के दम पर देवताओं को भी मात दे देता था। मैं सुपर कमांडो ध्रुव की नीली-पीली पोशाक में खो जाती थी। कई बार मैं मनोज भैया को बताए बिना उनके कमरे से कॉमिक्स उठा लाती थी। एक दिन इसके लिए मुझे मनोज भैया ने खूब डाँटा। पर मुझे इस बात की परवाह कहाँ थी। मैंने फिर ऐसा किया। मुझे फिर डाँट पड़ी। मैंने फिर ऐसा किया। मुझे फिर डाँट पड़ी। थककर उन्होंने मुझे डाँटना बंद कर दिया और अपनी कॉमिक्स छुपा कर रखने लगे। मैं उनके कमरे से कॉमिक्स खोजने के नए-नए तरीके ईजाद करने लगी।
इन सबके बीच न जाने कब मैं प्राइमरी स्कूल से निकलकर इंटर कालेज में पढ़ने लगी। जो मुझसे मिलता यही पूछता कि इस बार उत्तीर्ण हो जाओगी क्या? और मैं मन ही मन बहुत हँसती। मैं बायें हाथ से भी लिख दूँ तो भी उत्तीर्ण हो जाऊँ, ये लोग मुझे समझते क्या हैं? उत्तीर्ण चेहरे से नहीं दिमाग से हुआ जाता है। ऐसे सवालों पर बाहर से चुप्पी साधकर किंतु अंदर से हँसते हुए मैं उत्तीर्ण होते-होते एक दिन आठवीं कक्षा में पहुँच गई।
यूँ ही एक दिन मैं कॉमिक्स लेने मनोज भैया के घर गई। उनकी किताबों के बीच ढूँढते-ढूँढते मुझे एक फटा हुआ उपन्यास मिला। उपन्यास का कवर गायब था। शुरू और आखिरी के कुछ पन्ने भी नहीं थे। मैंने उसके कुछ पन्ने पढ़े तो स्त्री और पुरुष के प्रेम संबंधों से मेरा पहला परिचय हुआ। मैंने उस फटे उपन्यास को कपड़ों के भीतर छुपा लिया और चुपके से घर आ गई। मैंने उस पर अखबार चढ़ा दिया और अपने स्कूल बैग में रख दिया ताकि कोई देखे तो यही समझे कि कोर्स की किताब है। उपन्यास की शुरुआत और अंत वाले पन्ने फटे हुए थे लेकिन जितना हिस्सा था उसे मैंने कई बार पढ़ा। वो उपन्यास मेरे लिए एक ऐसी प्रेम कहानी था जिसकी न कोई शुरुआत थी न कोई अंत। नायक-नायिका उपन्यास के पहले पन्ने पर ही एक दूसरे से प्रेम करने लगे थे और आखिरी पन्ने तक उनका प्रेम कायम था। कुछ दिनों बाद मैं सोचने लगी कि काश मेरी प्रेम कहानी भी ऐसी ही हो जिसमें शुरू और आखिरी का हिस्सा ही न हो। मैं जिस क्षण उसे देखूँ उसी क्षण से वह मुझसे प्रेम करने लगे और जिस क्षण वह मुझसे बोर होने लगे उसी क्षण जीवन की किताब के बाकी पन्ने फटकर खो जाएँ। मैंने वह उपन्यास इतनी बार पढ़ा कि एक दिन मैं उससे बोर होने लगी। उसी दिन मैं उसे ले जाकर स्कूल के पीछे फेंक आई। अब मुझे उपन्यास भी अच्छे लगने लगे थे। यह बात मुझे बहुत बाद में पता चली कि इस तरह के उपन्यास को पल्प-फ़िक्शन कहते हैं। असली उपन्यास वो होते हैं जिन्हें साहित्यिक उपन्यास कहा जाता है और जिन्हें पढ़ने की हिम्मत जुटाने के लिए ज्ञान के एक न्यूनतम स्तर की आवश्यकता पड़ती है।

(५)
मनोज भैया के दोस्त थे अमन। दोनों एक ही कक्षा में पढ़ते थे। अमन बहुत बुद्धिमान थे और बुद्धिमान लड़के मेरी कमजोरी थे। यह बात मुझे बहुत बाद में पता चली कि बुद्धिमान लड़कों के प्रति आकर्षण अनुवांशिक होता है। मुझे यह आकर्षण मेरी माँ से मिला था। वह भी एक बुद्धिमान लड़के की बुद्धि पर मर मिटी थी। इस कदर मर मिटी थी कि जब तक सचमुच नहीं मर गईं उस लड़के की खातिर मर-मर कर जीती रही।
बुद्धिमान लड़कों की एक खासियत होती है। वो प्रेम दिल से नहीं दिमाग से करते हैं। बुद्धिमान लड़कों की दूसरी खासियत होती है कि वे जमीन से आसमान तक का फासला बहुत जल्द तय कर लेते हैं क्योंकि उन्हें लोगों को और खासकर लड़कियों को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करना आता है। बुद्धिमान लड़कों की तीसरी खासियत भी होती है। उनके पास पैसा बहुत जल्द और बहुत सारा आता है और वे प्यार के बदले में पैसा देकर समझते हैं कि उन्होंने प्यार की कीमत चुका दी। मेरे पिता को कभी पता नहीं चला कि मेरी माँ उनकी धेले भर की दिहाड़ी में से घर चलाने के अलावा हम दो बहनों और छोटे भाई की पढ़ाई-लिखाई का खर्चा कैसे निकाल पाती है। उनके पास न इतना दिमाग था न इतनी फ़ुर्सत कि वो ऐसी बातें सोच पाते। मेरे मामा शहर में मजदूरी करते थे। माँ को जब भी पैसे की जरूरत पड़ती वो पैसेंजर ट्रेन पकड़कर बिना टिकट शहर चली जाती। मामा के यहाँ ठहरती और मेरे बुद्धिमान लेकिन बदसूरत बाप से मिलकर पैसा ले आतीं। यह बात मुझे बाद में पता चली कि मेरा बाप किसी बड़ी राजनीतिक पार्टी का बड़ा कार्यकर्ता बन गया था और उन दिनों अपनी खुद की अलग पार्टी बनाने की तैयारी कर रहा था।
अमन अक्सर मनोज भैया के घर आया करते थे। मुझे उनसे बातें करना अच्छा लगता था। मैं जानती थी कि उन्हें मुझसे बातें करना अच्छा नहीं लगता लेकिन मुझसे बातें करना तो किसी को भी अच्छा नहीं लगता था। मैं ऊल-जलूल सवाल पूछ लेती थी। मैं चुभने वाली बातें कह देती थी। फिर भी जैसे ही मैं अमन की आवाज सुनती सब कुछ छोड़-छाड़कर मनोज भैया के घर आ जाती। मुझे ऐसी सुंदरता मिल गई होती जिसे दुनिया देख सके तो मैं भी अमन की अच्छी पत्नी बनकर घर सँभाल रही होती। तो मुझमें इतनी कटुता न होती। तो मैं ऊल-जलूल सवाल भी न पूछती और चुभने वाली बातें भी न कहती।
मनोज भैया और अमन की क्लास में ही मेरी दीदी भी पढ़ती थी। शुरू-शुरू में तो सब ठीक चल रहा था। मैं अक्सर अमन के साथ वाद-विवाद करती रहती थी। घर में अकेले बैठकर मैं अक्सर अमन के बारे में ही सोचा करती थी। अमन ने सुपर कमांडो ध्रुव को मेरे दिमाग से निकाल दिया था और उसकी जगह खुद आ गए थे। फिर एक दिन धरती पर सिर्फ़ मैं और अमन ही रह गए। एक घर था जिसमें जरूरत पड़ने पर हर चीज इच्छा करते ही प्रकट हो जाती थी। उसमें मैं और अमन रहते थे। मैं चाय बनाकर लाती थी और अमन उसे पीकर कहते थे कि यह दुनिया की सबसे अच्छी चाय है। हम दोनों घंटों एक दूसरे की आँखों में आँखें डाले बातें किया करते थे। हमें डिस्टर्ब करने वाला दुनिया में कोई नहीं था। फिर अचानक सौरमंडल से सूरज ही गायब हो गया और हर तरफ़ अँधेरा ही अँधेरा छा गया। मैं टटोल-टटोल कर अमन को ढूँढने लगी पर कहीं कुछ भी नहीं था। तभी दीदी ने मुझे झिंझोड़कर जगा दिया और पूछने लगी कि मैं क्या बड़बड़ा रही थी। मैं उसे क्या बताती।
एक दिन अमन ने मुझे अपने क्लास नोट्स दिए और बोले कि तुम्हारी दीदी ने मँगाए थे दे देना। फिर उसके बाद अक्सर दीदी अमन से क्लास नोट्स मँगाने लगी। एक दिन मुझे शक हुआ। दूसरे दिन मैंने दीदी को देने से पहले क्लास नोट्स खुद पढ़े। वो क्लास नोट्स ही थे लेकिन उनके बीच में एक कागज था। मैंने उसे पढ़ा। वह वैसा कागज था जैसा मैं चाहती थी कि अमन मुझे दे। मुझे बहुत गुस्सा आया। मैंने वह कागज ले जाकर माँ को दे दिया। माँ ने पिताजी को दे दिया। पिताजी दीदी के लिए लड़का ढूँढने निकल पड़े। जल्दी ही उन्हें एक लड़का मिल गया। दीदी की शादी तय हो गई। दीदी की शादी में सबसे ज्यादा खुश मैं थी। दीदी नहीं रहेगी तो शायद अमन वैसा कागज मुझे देने के बारे में सोचेगा। दीदी अपने ससुराल चली गई। अमन ने मनोज भैया के घर आना बंद कर दिया। मैं रोने लगी। मेरे आँसुओं से समुद्र का पानी खारा हो गया। गाँधीजी ने मेरे आँसुओं से नमक बनाकर कानून तोड़ा। टाटा मेरे आँसुओं को पैकेट में भर-भर कर बेचने लगा। एक दिन मेरे आँसू सूख गए। मैं समझ गई कि अमन मेरे लिए नहीं मेरी दीदी से मिलने के लिए मनोज भैया के घर आता था। मैं उसके लिए सीढ़ी थी और दीदी आसमान।
मैं अमन को आधा जमीन में गाड़कर और आधे भाग पर गुड़ लगा कर उसपर कुत्ते छोड़ देना चाहती थी। मैं उसके दिमाग के छोटे-छोटे टुकड़े करके नाले में बहा देना चाहती थी। मैं उसे उल्टा लटकाकर कोड़े मारना चाहती थी। मैं उसे गधे से बाँधकर घसीटते हुए पूरे गाँव में घुमाना चाहती थी। मैं उसे जिंदा जलाकर उसकी राख पेशाबघर में बिखेरना चाहती थी। मैं उसे मरते दम तक टूटे हुए काँच पर दौड़ाना चाहती थी। मैं न जाने क्या-क्या करना चाहती थी पर मैं कुछ नहीं कर सकी।
फिर एक दिन मैं सोकर उठी और अमन को भूल गई। मनोज भैया उपन्यास लाते थे और पढ़कर मुझे दे दिया करते थे। शायद वे भी समझने लगे थे कि मैं अब उपन्यास पढ़ने लायक बड़ी हो गई हूँ।

(६)
उत्तर प्रदेश, बिहार और आस-पास के इलाकों में गरीब आदमी अपनी बेटी की शादी इसलिए जल्दी करता है ताकि उसे दहेज कम से कम देना पड़े। जब लड़की दसवीं या बारहवीं में पढ़ रही हो अथवा सत्रह-अठारह साल की हो तभी शादी कर देने से दहेज कम देना पड़ता है क्योंकि तब दहेज लड़के के बाप की हैसियत देखकर दिया जाता है। एक बार यदि लड़का नौकरी करने लग गया तो गरीब से गरीब बाप भी मुँह फाड़कर दहेज माँगता है। कम उम्र में विवाह दरअसल एक जुआ है। यदि लड़का लायक निकल जाता है तो लड़की की जिंदगी सँवर जाती है और यदि नालायक निकल गया तो लड़की का बाप मानता है कि मेरी लड़की का भाग्य ही खराब था। जिनके पास दहेज देने लायक पैसा होता है वे तब तक इंतजार करते हैं जब तक नाते-रिश्तेदार यह न कहने लगें कि बेटी को जिंदगी भर घर में ही बिठाए रखने का इरादा है क्या? कुछ लोग यह भी कहते हैं कि जवान लड़की को घर में बिठा रक्खा है कल को कहीं कुछ ऐसा-वैसा हो गया तो। अगर बेटी पढ़ने-लिखने में अच्छी हो तो नाते-रिश्तेदारों के मुँह कम से कम उसकी पढ़ाई पूरी होने तक बंद रहते हैं। उसकी नौकरी लगने तक भी तानों की तीव्रता सहन करने लायक होती है। कई बार मैं सोचती हूँ कि ये ताने मारने वाले लोग अपने काम से काम क्यों नहीं रखते। दरअसल ये लोग चाहते हैं कि जैसे इनकी लड़कियाँ गाय की तरह खूँटे से बाँध दी गई हैं और अब चारा खाकर, बछड़े जनकर तथा दूध देकर अपना जीवन गुजारेंगी वैसे ही दूसरों की लड़कियाँ भी खूँटे से बाँध दी जाएँ। इससे पहले कि लड़कियाँ नारी मुक्ति और पितृसत्तात्मक व्यवस्था जैसे फ़ैंसी शब्द जानें इन्हें किसी खूँटे से बाँधकर फटाफट इनका गर्भाधान कर दिया जाए।
दीदी की शादी के बाद मेरे पिता ने मेरे लिए भी एक लड़का तलाश किया। वो बारहवीं में पढ़ता था और मैं दसवीं में थी। मैं यह नहीं कहूँगी कि मैं शादी नहीं करना चाहती थी या मुझे लड़कों से किसी किस्म की घृणा थी। ऐसा भी नहीं था कि मेरे पिता जबरन मेरी शादी कराना चाहते थे। नारी मुक्ति और नारी के अधिकार किस चिड़िया का नाम है मुझे पता भी नहीं था। पितृसत्तात्मक व्यवस्था जैसे शब्दों का तो मैंने नाम भी नहीं सुना था। एक दिन लड़के वाले मुझे देखने आए। दीदी भी ससुराल से आई हुई थी। दीदी ने मुझे कम सजाया और खुद ज्यादा सज गईं। मैं समझ नहीं पाई कि उन्हें खुद को और ज्यादा खूबसूरत दिखाने की क्या जरूरत है उनकी तो शादी पहले ही हो चुकी है। एक कमरे में मैं और दीदी जाकर बैठे। वह लड़का अपने और मेरे माँ-बाप के साथ अंदर आया। पहले उसकी नज़र दीदी पर पड़ी। उसके चेहरे पर मुस्कान आई। फिर उसकी नज़र मुझ पर पड़ी। उसने अपना मुँह दीदी की तरफ घुमा लिया। मेरी समझ में नहीं आया कि यह लड़का मुझे देखने आया है या दीदी को। फिर मेरे पिता ने मेरी तरफ इशारा करके कहा यह है मेरी छोटी लड़की। एक सच यह भी था कि दीदी देखने में मुझसे छोटी लगती थी। उस लड़के का मुँह दुबारा मेरी तरफ घूमा। अचानक वह कमरे से निकला और अपने बाप को धकियाते हुआ बाहर निकल गया। मुझे उस लड़के पर बहुत गुस्सा आया। मुझे दीदी पर भी बहुत गुस्सा आया। उस दिन मुझे एक कड़वे सच का पता चला। जब लड़के वाले लड़की देखने आएँ तो लड़की के साथ कभी उससे सुंदर लड़की नहीं रहनी चाहिए। जैसे किसी छोटी रेखा के बगल में एक बड़ी रेखा खींच देने पर छोटी रेखा और छोटी लगने लग जाती है उसी तरह बदसूरती, सुंदरता के बगल खड़ी होकर और बदसूरत लगने लगती है। बाद में पता चला कि वह लड़का घर छोड़कर शहर भाग गया है, इस डर से कि कहीं उसके माँ-बाप जबरन उसकी शादी मुझसे न करा दें।
मेरे पिताजी ने एक और लड़का तलाश किया। इस बार दीदी को मायके से नहीं बुलाया गया। लड़के वाले मुझे देखने आए। वह लड़का और उसके माता-पिता घर के आँगन में पड़ी चारपाई पर बैठे हुए थे। मैं जितना सज-सँवर सकती थी उतनी सज-सँवरकर उनके सामने गई। मेरी निगाह जैसे ही लड़के पर गई मेरे मुँह से बेसाख्ता हँसी निकल पड़ी। न जाने कितनी देर तक मैं हँसती रही। मेरे हँसते-हँसते सूरज मेरे सिर के ऊपर से भागकर दूर कहीं पहाड़ों के पीछे जाकर छिप गया। सूरज फिर से निकला तो मेरे देखते ही देखते वह पहाड़ ऊँट में बदल गया। जब सूरज चढ़ता हुआ फिर से मेरे सिर के ऊपर आया तो वह ऊँट आदमी में बदलने लगा। अचानक जो जादूगर दृश्य बदल रहा था उसे दिल का दौरा पड़ा और वह चल बसा। अब मेरे सामने जो था वह आधा लड़का था आधा उँट। उसका चेहरा आधा आदमी का था आधा उँट का। उसकी पीठ आधी आदमी की थी आधी उँट की। वह बैठा हुआ था जैसे ऊँट बैठता है मगर मेरी तरफ देख रहा था जैसे आदमी देखता है। मैं हँसते-हँसते घर के भीतर भाग गई। जब मेरे पिता ने लड़के वालों का अपमान करने के लिए मेरे बालों को पकड़कर मुझे आँगन में घसीटा मैं तब भी हँसे जा रही थी। जब मेरी माँ ने मुझे गालियाँ दीं मैं तब भी हँस रही थी। मैं न जाने कब तक हँसती रही। मै हँसते-हँसते बेहोश हो गई। जब होश आया तो दो साल गुजर चुके थे और मैं बारहवीं कक्षा में पढ़ रही थी। तब तक आस-पास के गाँवों में यह बात फैल चुकी थी कि मेरी दिमागी हालत ठीक नहीं है और मुझ पर भूत-प्रेत का साया है।
इस घटना से मुझे दो फायदे हुए। एक तो मेरे पिताजी ने मान लिया कि मेरा घर कभी नहीं बस सकता और दूसरे मेरी माँ समझ गई कि इस लड़की को कुछ भी समझाना-बुझाना बेकार है। अब तो सब ऊपर वाले के और इस लड़की के बदसूरत भाग्य के भरोसे है।

(७)
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के केंद्रीय पुस्तकालय में घुसते ही मैं किताबों के महासागर में पहुँच गई। रंग-बिरंगी किताबें, छोटी-बड़ी किताबें, नई-पुरानी किताबें, धर्म और दर्शन की किताबें, कहानी और कविता की किताबें, उपन्यास और महाकाव्य, विज्ञान और इंजीनियरिंग की किताबें, चारों तरफ किताबें ही किताबें। मैं सारी किताबें पढ़ना चाहती थी मगर इसके लिए मुझे हजारों जन्म लेने पड़ते। वह मेरी जिंदगी का सबसे खूबसूरत समय था। मैं एक किताब से ब्रश करती थी। दूसरी किताब से नहाती थी। तीसरी किताब सामने रखकर कपड़े बदलती थी। चौथी किताब का नाश्ता करती थी। पाँचवी किताब पर चढ़कर क्लास में जाती थी। छठीं किताब पर बैठती थी। सातवीं किताब क्लास में पढ़ती थी। आठवीं किताब का लंच करती थी। नौवीं किताब लाइब्रेरी में पढ़ती थी। दसवीं किताब पर चढ़कर छात्रावास लौटती थी। ग्यारहवीं किताब का डिनर करती थी और बारहवीं किताब तकिए के नीचे रखकर सो जाती थी।
मेरी ही क्लास में एक और बदसूरत लड़की थी जो मेरे जितनी बदसूरत तो नहीं थी लेकिन इतनी बदसूरत जरूर थी कि उसे बदसूरत कहा जा सके। वह इतनी भी बदसूरत नहीं थी कि कोई बदसूरत लड़का उसके साथ पिया-मिलन चौराहे पर खड़ा न हो सके। धीरे-धीरे उसके साथ मेरी बातचीत होने लगी। एक दिन मैं उसे अपनी दोस्त समझने लगी। दूसरे दिन वह भी मुझे अपनी दोस्त समझने लगी। हम दोनों में अक्सर लम्बी-लम्बी बहसें छिड़ने लगीं। कभी वह जीतती तो कभी मैं। बहस करने के लिए मुझे और पढ़ना पड़ता। धीरे-धीरे साहित्यिक उपन्यासों से मेरा परिचय हुआ। मैंने प्रेमचंद को पढ़ा और गाँव को इस तरह जाना जिस तरह मैंने गाँव में रहकर भी नहीं जाना था। मैंने फणीश्वरनाथ रेणु को पढ़ा और गाँव की भाषा को गँवारों की भाषा समझने की मेरी धारणा बदल गई। मैंने हरिशंकर परसाई को पढ़ा और मेरे कटाक्ष ज्यादा नुकीले हो गए। मैंने जयशंकर प्रसाद को पढ़ा और मेरी भाषा संस्कृतनिष्ठ हो गई। पढ़ते-पढ़ते मैं बीए के द्वितीय वर्ष में पहुँच गई।
अमन भी न जाने कैसे एमटेक करने वहीं पहुँच गया। एक दिन शाम को वह मुझसे मिलने आया। हम आटो-रिक्शा में बैठकर अस्सी घाट गए। आटो-रिक्शा पूरा भरा हुआ था इसलिए अमन को मुझसे सटकर बैठना पड़ा। हम अस्सी घाट पर दो घंटे बैठे रहे। अमन ने कहा कभी यहाँ सूरज को निकलते हुए देखना। घाट इतना सुंदर लगता है कि दंग रह जाओगी। मैंने फ़ौरन कहा ठीक है रविवार की सुबह आते हैं। उसका मुँह बन गया। मैं समझ गई कि इसके आने का कारण वह नहीं है जो मैं समझ रही हूँ। सूरज धीरे-धीरे छिप रहा था।
अचानक उसने कहा, ‘तुम्हारी सहपाठी नूतन अपने पास वाले गाँव की है। उसको एक खत देना है। आते-जाते ट्रेन में दो-तीन बार मेरी उससे बातचीत हुई है। अगर तुम यह खत उसे दे दो तो मैं तुम्हारा यह अहसान जीवन भर नहीं भूलूँगा।’
तब मुझे बुद्धिमान लड़कों की चौथी खास बात पता चली। बुद्धिमान लड़के सबसे खतरनाक वार करने से पहले सामने वाले को वहाँ तक लेकर जाते हैं जहाँ सामने वाला सबसे कमजोर होता है। सबकुछ जानते हुए भी मैंने उससे खत ले लिया। इस बार मैं सबकुछ जानते हुए अपनी इच्छा से उसकी सीढ़ी बन गई। उसने मेरे ऊपर पैर रखा और नूतन तक पहुँच गया। मेरी दीदी खूबसूरत थी। नूतन खूबसूरत थी। शायद खूबसूरती बुद्धिमान लड़कों की कमजोरी होती है। जब तक खतों का आदान-प्रदान होता रहा अमन मुझसे मिलता रहा। उसके बाद वह मुझे भूल गया।
धीरे-धीरे मैं फिर से अमन की दुनिया से निकलकर किताबों की दुनिया में चली गई और मेरा कमरा लाइब्रेरी बन गया। कोई मुझसे पूछे कि पढ़ाई में ज्यादा ध्यान कौन देता है तो मैं कहूँगी वह जिसका कोई प्रेमी या प्रेमिका नहीं होता।
पढ़ते-पढते एक दिन मुझे शब्दों की ताकत समझ में आई। मुझे समझ में आया कि शब्दों से कुछ भी किया जा सकता है। शब्दों से आग लगाई जा सकती है। शब्दों से आग बुझाई जा सकती है। शब्द इंसान को राक्षस बना सकते हैं। शब्द राक्षस को इंसान बना सकते हैं। शब्द विश्वयुद्ध का कारण बन सकते हैं। शब्द विश्वयुद्ध खत्म करवा सकते हैं। शब्द ईश्वर को मृत्युलोक में जन्म लेने पर विवश कर सकते हैं। शब्द इंसान को सशरीर स्वर्ग पहुँचा सकते हैं। शब्द क्या नहीं कर सकते?

(८)
मेरी माँ एक दिन एक बदसूरत आदमी के साथ छात्रावास के बाहर मुझसे मिलने आई। मैंने पूछा कि यह आदमी कौन है? वो बोली ये तुम्हारे मामा के दोस्त हैं। लेकिन मैं उसका चेहरा और अपनी माँ की आँखों के भाव देखकर समझ गई कि मेरा बदसूरत डीएनए इसी आदमी के बदसूरत डीएनए से बना है। उस आदमी की आँखों में मेरे लिए अपार स्नेह था। लेकिन मुझे उस आदमी से घृणा थी। तब से घृणा थी जब से मुझे यह अंदाजा हुआ था कि मेरे डीएनए को बनाने में मेरे पिता का डीएनए इस्तेमाल नहीं हुआ। मुझे उसके चेहरे से घृणा थी। मुझे उसकी भाषा से घृणा थी। मुझे उसकी आत्मा से घृणा थी। मुझे अपनी माँ से घृणा थी। मुझे खुद से घृणा थी। यह घृणा पहले मेरी आँखों में उतरी, फिर मेरे चेहरे पर आई। फिर मेरे मुँह से आग की लपटें निकलीं। उसमें मेरी माँ के साथ वह आदमी भी जलने लगा। जलते-जलते वे दोनों मुझसे दूर भागने लगे। फिर वे मेरी नज़रों से ओझल हो गए।
मैं पहले भी कह चुकी हूँ कि बुद्धि मेरी कमजोरी है और वह आदमी जो मेरी बदसूरती का जिम्मेदार था वह काफी बुद्धिमान था। वह जानता था कि मेरे भीतर की घृणा पहले तो आग की लपट बनकर बाहर आएगी, फिर अंगारे बनकर, फिर चिंगारी बनकर, फिर भाप बनकर, फिर गर्म पानी बनकर। यही हुआ भी। वह हर महीने मेरी माँ के साथ आता। मेरा तापमान कम होता हुआ देखता। उसे सहने की कोशिश करता। जब लगता कि फफोले पड़ जाएँगें तो चला जाता। एक दिन मेरे भीतर की घृणा गर्म पानी बनकर निकली। उसका कंधा भीग गया।
उसने मेरे बालों में उँगलियाँ फिराईं। फिर वह, मैं और माँ साथ-साथ एक बड़े होटल में गए। वहाँ होटल के प्रवेश द्वार से लेकर कमरे तक कई लोगों ने उसे सलाम ठोंका तब मैं समझ पाई कि वह बहुत बड़ा आदमी है। वहाँ मैंने जीवन में पहली बार डोसा खाया। पहले थोड़ा अजीब लगा फिर अच्छा लगा। फिर मैं माँ को रेलवे स्टेशन छोड़कर छात्रावास वापस आ गई। यह घटना कई बार घटी। फिर एक दिन वह अकेला आया। हम होटल गए। खाना खाया। खाना खाने के दौरान देश-दुनिया की चर्चा की। फिर वह अक्सर अकेले आने लगा।
एक दिन उसने मुझसे पूछा, ‘बीए करने के बाद क्या करने का इरादा है।’
मैंने कहा, ‘एमए में दाखिला लूँगी और प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी करूँगी।’
वो बोला, ‘तुम इतनी बुद्धिमान नहीं हो कि प्रशासनिक सेवाओं में चुन ली जाओ।’
मैंने कहा, ‘अगर प्रशासनिक सेवाओं में नहीं चुनी गई तो पीएचडी करके लेक्चरर बन जाऊँगी।’
उसने पूछा, ‘लेक्चरर बनकर क्या करोगी?’
मैंने कहा, ‘क्या करोगी क्या मतलब? देश का भविष्य बनाने में अपना योगदान करूँगी।’
वह हँसा। जोर से हँसा। देर तक हँसता रहा। शायद हँसी भी अनुवांशिक होती है।
जी भर कर हँस लेने के बाद उसने कहा, ‘लगता है तुमने किताबें बहुत पढ़ ली हैं।’
मैं चकित रह गई। इसे कैसे पता चला? मेरा सिर अपने आप सहमति में हिला।
वह बोला, ‘किताबों में खूबसूरत कल्पनाएँ और आदर्शवादी स्वप्न मिलते हैं। सच किताबों में नहीं होता। जानती हो लक्ष्मी को कमल पर बैठी क्यों दिखलाया जाता है।’
मैंने कहा, ‘विष्णु पुराण के अनुसार वो कमल की तरह कोमलांगी और सुंदर हैं इसलिए।’
वह फिर हँसने लगा। जब शांत हुआ तब बोला, ‘नहीं। सच बात तो यह है कि कमल हमेशा कीचड़ में ही खिलता है और बिना कीचड़ में उतरे कमल को बाहर नहीं निकाला जा सकता। उसी तरह लक्ष्मी को हासिल करने के लिए आत्मा को कीचड़ में सानना पड़ता है। लक्ष्मी कमल पर विराजती हैं क्योंकि दोनों का कीचड़ से बड़ा गहरा संबंध है। बुद्धिमान व्यक्ति यह जल्द ही समझ जाते हैं कि लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए कीचड़ में उतरना आवश्यक है। इस सच का पता हमारे पूर्वजों को हजारों साल पहले चल गया था लेकिन किताबों में ऐसा सच नहीं लिखा जा सकता इसलिए इस सच का स्थान एक खूबसूरत कल्पना ने ले लिया।’
मैं उसकी तर्क-शक्ति पर चकित रह गई। अब मुझमें यह जानने की उत्सुकता होने लगी कि यह बुद्धिमान आदमी आखिर मुझ जैसी बदसूरत लड़की से चाहता क्या है। यह मेरी माँ से विवाह करने या मुझे अपनी बेटी घोषित करने से तो रहा। कुछ देर तक दिमाग लड़ाने के बाद आखिरकार तंग आकर मैंने पूछ ही लिया, ‘आप मुझसे क्या चाहते हैं?’
तब बुद्धिमान व्यक्तियों की पाँचवी खासियत का मुझे पता चला। ऐसे व्यक्ति यह अच्छी तरह जानते हैं कि कब उन्हें बात को सीधे-सीधे कहना है और कब तक उसको घुमा-घुमा कर जलेबी बनाते रहना है। वह बोला, ‘मैंने शादी नहीं की पर मुझे इस बात का कोई अफ़सोस नहीं है। राजनीति की इस भागदौड़ में यदि मैं शादी कर भी लेता तो भी अपने परिवार को समय नहीं दे पाता। जो लोग विवाह और राजनीति एक साथ निभाने की कोशिश करते हैं वे दरअसल राजनीति और परिवार दोनों से दगा करते हैं। मैंने जो पार्टी गठित की है उसमें ऐसा कोई नहीं है जो मेरे बाद पार्टी को सँभाल सके। मेरी कोई जायज औलाद नहीं है जिसके हाथ में पार्टी की बागडोर सौंपकर कम से कम मैं इतना तो निश्चिंत हो जाऊँ कि पार्टी का अच्छा-बुरा जो होगा वह मेरी औलाद के किए ही होगा। कोई पराया आकर तो मेरी इस वर्षों की मेहनत पर पानी नहीं फेरेगा। अब ले-दे कर एक तुम ही बचती हो। मैं चाहता हूँ कि तुम पार्टी की कार्यकर्ता बन जाओ। धीरे-धीरे मैं तुम्हें पार्टी अध्यक्ष बना दूँगा। एक न एक दिन तो हमारी पार्टी चुनाव जीत ही जाएगी तब तुम आसानी से मुख्यमंत्री बन सकती हो।’
ओह तो यह कारण था। यानि एक बार फिर मैं सीढ़ी बन जाऊँ। एक और बुद्धिमान व्यक्ति के सपनों को आसमान तक पहुँचाने के लिए। मैंने फौरन कहा, ‘नहीं मैं राजनीति में नहीं आउँगी। मुझे धन की नहीं ज्ञान की भूख है। मैं कीचड़ में नहीं उतरूँगी।’
वह बोला, ‘ये ज्ञान-व्यान, आदर्श-वादर्श सब सिर्फ़ तुम्हारा भ्रम है। जानती हो ईमानदार अधिकारी किसी एक जिले में साल भर भी नहीं टिकता। उसकी सारी जिंदगी ट्रांसफ़र में अपना सामान लदवाकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने में ही बीत जाती है। ऐसे में अब शायद ही कोई है जो ईमानदारी से अपना काम करता है। तो अंत में होता यह है कि जिन्हें सब देश की सर्वश्रेष्ठ परीक्षा से आए हुए सर्वश्रेष्ठ इंसान समझते हैं वे पदोन्नति और तबादले के लिए जीवन भर मंत्रियों और विधायकों के तलवे चाटते रहते हैं। उनमें से जिनकी जबान ज्यादा लंबी होती है और जो ज्यादा अच्छी तरह से तलवे साफ कर पाते हैं उनको पदोन्नति देते-देते सचिव वगैरह बना दिया जाता है। यह आदत कुछ लोगों को इस कदर लग जाती है कि सेवानिवृत्ति के बाद भी ये चाटने के लिए तलवे ढूँढते रहते हैं और ऐरी-गैरी नत्थू-खैरी समितियों के सदस्य बनकर सरकार को उसकी मनमाफ़िक रपट देने का काम करते हैं। यह हाल तो इस देश की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं का है। आम आदमी की तो बात ही मत पूछो। हर बुद्धिमान व्यक्ति आम आदमी का उपयोग अपने लिए और सुविधा इकट्ठी करने में करता है। धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र और भी न जाने कौन-कौन से नाम लेकर बुद्धिमान आदमी अपने फायदे के लिए आम आदमी का प्रयोग करता है। कोई पूछे कि धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र इत्यादि के नाम पर झगड़ा करके आखिर आम आदमी को क्या फायदा होता है। इसका फ़ायदा तो बुद्धिमान आदमी ही उठाता है। मैं इन्हें जाति के नाम पर भड़काता हूँ। इनसे कहता हूँ कि इतिहास में हमेशा से तुम्हारा शोषण होता आया है। अब समय है जागो और अपना हक माँगो। हमें वोट देकर शासन में ले आओ हम तुम्हारी आवाज संसद में उठाएँगें। इस बात को मैं बार-बार दुहराता रहूँगा तो एक दिन इन्हें यकीन हो जाएगा कि मैं ही इनका सबसे बड़ा शुभचिंतक हूँ। एक बार सत्ता मेरे हाथ लग जाय उसके बाद तो मेरे नाते-रिश्तेदारों की सात पुश्तों को भी कोई काम करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। तुम सोचने के लिए थोड़ा समय ले लो। अगर दुनिया के सबसे गंदे इंसानों के तलवे चाटना हो तो तुम्हारी मर्जी वरना अगर तुम चाहती हो कि जो तुम्हारे हिसाब से देश की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा है वे तुम्हारे तलवे चाटें तो पार्टी ज्वाइन कर लो। जानती हो तमाम बड़ी-बड़ी पाटिNयों के बड़े-बड़े विधायक, नेता, मंत्री जो बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, इन सबके चरित्र इतने गंदे हैं कि अगर इनकी सच्चाई जान लो तो तुम इन पर थूकना भी पसंद न करो। प्रशासनिक अधिकारी बनकर इनके नीचे काम करना तो बहुत दूर की बात है।’
अब मुझे बुद्धिमान व्यक्तियों की छठी खासियत का पता चला। अपने भीतर की सारी गंदगी इन्हें अमृत से भी ज्यादा स्वादिष्ट और असरदार लगती है। ये अपनी आत्मा को शब्दों से संतुष्ट करना जानते हैं। अपने गलत से गलत काम को भी तर्कों द्वारा सही ठहराने का मंत्र जानते हैं। मैं उठी और वहाँ से चली आई।

(९)
न जाने कितने सालों तक मैंने किताबों के अलावा किसी और की सूरत भी नहीं देखी। एक दिन मैं सिविल सेवा की प्रारंभिक परीक्षा में पास हो गई लेकिन कुछ महीने बाद मुख्य परीक्षा में फ़ेल हो गई। अगली बार मैंने दोनों परीक्षाएँ पास कीं और साक्षात्कार तक पहुँची। वहाँ मैंने सभी सवालों के सही-सही जवाब दिए फिर भी मेरा चयन नहीं हुआ। अगली बार मैं साक्षात्कार से पहले साक्षात्कार सिखाने वाले एक कोचिंग सेंटर में गई। वहाँ मुझे सिखाया गया कि साक्षात्कार में नंगा सच नहीं बोला जाता। पहले उसे खूबसूरत कपड़े पहनाए जाते हैं फिर उसे साक्षात्कार लेने वालों के समक्ष पेश किया जाता है। उसके बाद एक-एक करके उसके इतने कपड़े उतारे जाते हैं कि साक्षात्कार लेने वालों का भरपूर मनोरंजन हो सके और सच अश्लील भी न लगे। आखिरी कपड़ा उसके शरीर पर छोड़ दिया जाता है ताकि साक्षात्कार लेने वालों का अहंकार यह सोचकर तुष्ट हो सके कि सच को नंगा आज तक सिर्फ़ उन्होंने ही देखा है। मैंने यही किया और मेरा नाम महिलाओं की वरीयता सूची में चौथे स्थान पर रहा। मैं बहुत खुश हुई।
शुरू-शुरू में मुझे साँस लेने की भी फ़ुर्सत नहीं थी। इतना काम था कि दिन कब गुजर गया पता ही नहीं चलता था। एक दिन में कितनी सारी फ़ाइलें साइन करनी पड़ती थीं और कितनी सारी बैठकें करनी पड़ती थीं। एक दिन मुझे महसूस हुआ कि मेरे नए और लड़की होने का फायदा उठाकर ऐसे फालतू मामले भी मेरे पास लाए जा रहे हैं जिन्हें निचले स्तर पर ही सुलझाया जा सकता है। दूसरे दिन मैंने ज्यादातर काम नीचे के अधिकारियों में बाँट दिए तब जाकर मुझे कुछ राहत मिली।
एक दिन मैं अपने कार्यालय में बैठी उच्चतम न्यायालय का एक आदेश पढ़ रही थी। तभी फोन की घंटी बजी। मेरे सचिव ने फोन पर बताया कि मेरी एक मित्र मुझसे मिलना चाहती हैं। मैंने पूछा, ‘कौन मित्र।’ सचिव ने नाम बताया तब मेरे दिमाग की घंटी बजी। बीए करने के दौरान जो मेरी एकमात्र मित्र थी वह अंदर आई। उसे देखते ही मेरे मुँह से पहला प्रश्न यही निकला, ‘अरे तुम यहाँ कैसे?’
उसने कहा, ‘मेरे पति स्टेट बैंक में प्रबंधक हैं। एक महीने पहले उनका तबादला इस शहर की मुख्य शाखा में हो गया। हम एक हफ़्ते पहले ही अपने साजो-सामान के साथ यहाँ आए हैं। मैं बाल-सुधार नामक एक एनजीओ में कार्य करती हूँ। हमारा काम घर से भागे हुए, अन्य कारणों से भटके हुए, मानसिक रूप से कमजोर अथवा मानसिक रूप से चोटिल बच्चों की काउंसलिंग करके उन्हें वापस घर पहुँचाना या उनमें समाज में जीने योग्य आत्मविश्वास पैदा करना है। इस संबंध में हमें जिलाधिकारी के निरंतर संपर्क में रहना होता है। यहाँ आई तो दरवाजे पर तुम्हारा नाम देखा। मैं बता नहीं सकती कि तुम्हें यहाँ देखकर मुझे कितनी खुशी हो रही है।’ मैं बोली, ‘मुझे तुमसे भी ज्यादा खुशी हो रही है। चलो, इस शहर में कोई तो पुरानी जान-पहचान वाला मिला।’ वह बोली, ‘आज का डिनर हमारे साथ करो।’
मैं बोली, ‘ठीक है।’
रात को मैंने उसके घर पर डिनर किया। हमने पुराने दिन याद किए। उसने कहा, ‘तुम इतना पढ़ती थी कि मुझे मालूम था तुम एक न एक दिन कुछ बनकर दिखाओगी।’
मैं समझ नहीं पाई कि मैं आखिर ऐसा क्या बन गई हूँ जिस पर मुझे नहीं बल्कि इसे गर्व हो रहा है। दिन भर फ़ाइलें साइन करने और बैठकें करने के अलावा मैं और क्या करती हूँ। तब मेरे बाप की एक बात मेरे दिमाग में बिजली की तरह कौंधी ‘अपनी मर्जी से तो तुम रूटीन वर्क के अलावा और कुछ नहीं कर पाओगी।’ अब तक मैंने सारा काम अपनी मर्जी से ही किया था और वह सारा का सारा रूटीन वर्क ही था।

(१०)
एक दिन एक बड़ी पार्टी की एक छोटी सी कार्यकर्ता मरणासन्न अवस्था में शहर के बाहर नहर के किनारे पड़ी मिली। उसे जिला अस्पताल में भरती करवा दिया गया। उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था। होश में आने पर उससे पूछताछ की गई मगर कोई नतीजा नहीं निकला। कभी वह कहती थी कि सड़क पर चलते-चलते अचानक बेहोश होकर गिर गई थी और उसके बाद क्या हुआ उसे कुछ याद नहीं। कभी कहती थी कि वह घर में सो रही थी तभी अचानक उसे लगा कि उसकी नाक पर कुछ रख दिया गया है और उसके बाद उसे कुछ याद नहीं। कभी कहती थी कि कालेज के बाथरूम में उसे चक्कर आ गया था उसके बाद उसे कुछ याद नहीं। जितनी बार उसका बयान लिया जाता एक नई कहानी सामने आती। अंत में सबने यही निष्कर्ष निकाला कि यह पागल हो गई है और इसी पागलपन में इधर-उधर भटक रही थी कि कुछ लोगों ने इसके पागलपन का फायदा उठा लिया। किसी के भी विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज नहीं हो हुई और बात आई-गई हो गई।
कुछ दिनों बाद मेरी दोस्त मेरे दफ़्तर आई। उसके चेहरे से लग रहा था कि वह बहुत तनाव में है। मेरी तरफ झुककर फुसफुसाते हुए उसने जो कुछ भी बताया उसका सार यह है।
एक बड़ी पार्टी की एक छोटी सी कार्यकर्ता पार्टी अध्यक्ष के बेटे की ढेर सारी प्रेमिकाओं में से एक थी। इस बात से न तो उस छोटी सी कार्यकर्ता को कोई ऐतराज था न किसी और को। मगर अध्यक्ष के बेटे का प्रेम करने का तरीका दिनों-दिन गंदा होता जा रहा था। एक दिन अध्यक्ष के बेटे ने ऐसी माँग की जिसे पूरा करने से छोटी सी कार्यकर्ता ने इनकार कर दिया। इसके बाद अध्यक्ष के बेटे ने उसके साथ जबरदस्ती वही सब कुछ किया। अध्यक्ष के बेटे का बुखार उतरने के बाद छोटी सी कार्यकर्ता ने कहा, ‘मेरे साथ शादी करो वरना मैं पुलिस के पास जाती हूँ। अपने गुनाह का सबूत तुमने खुद अभी-अभी मेरे भीतर छोड़ा है।’
अध्यक्ष के बेटे को गुस्सा आ गया। उसने अपने पालतू चमचों से कहा, ‘इसके भीतर इतने सबूत डाल दो कि मेरा वकील इसे वेश्या साबित कर दे।’
तब छोटी सी कार्यकर्ता को पता चला कि वह कितनी छोटी है और पार्टी अध्यक्ष का बेटा कितना बड़ा। उसे तो इसी बात का आश्चर्य हो रहा था कि वह जिंदा कैसे बच गई। मेरी सहेली ने बड़ी मुश्किल से घंटों की बातचीत के बाद किसी को भी न बताने की शर्त पर उससे यह जानकारी प्राप्त की। यह सब सुनकर गुस्से में मेरा खून खौल उठा। पुरुष जाति के प्रति मेरी नफ़रत एकाएक बहुत बढ़ गई। मैं अपनी सहेली के साथ अस्पताल में जाकर उससे मिली। मैंने उससे कहा कि मैं तुम्हें पुलिस प्रोटेक्शन दिलवा दूँगी चिंता मत करो अपना सही बयान दर्ज करवा दो। मेरे सामने ही एसपी साहब ने खुद उसका सही बयान दर्ज किया और पार्टी अध्यक्ष के बेटे के विरुद्ध एफ़आईआर भी दर्ज की। उसी दिन पार्टी अध्यक्ष का बेटा गिरफ़्तार कर लिया गया।
अगले दिन बहुत सारी घटनाएँ एक साथ हुईं। मेरा ट्रांसफ़र आर्डर आ गया। जिस लड़की की हालत में सुधार हो रहा था उसकी हालत एकाएक बिगड़ने लगी। दिन भर वह पता नहीं क्या अंट-शंट बकती रही और शाम को चल बसी। पंचनामे की रपट के अनुसार आंतरिक रक्तश्राव ज्यादा होने की वजह से उसकी मृत्यु हुई। डॉक्टर की रिपोर्ट में लिखा गया था कि अपने अंतिम दिनों में वह विक्षिप्त हो चुकी थी जो इतना गहरा मानसिक सदमा लगने से अक्सर हो जाता है अतः उसके द्वारा दिया गया कोई भी बयान एक पागल के प्रलाप से अधिक कुछ भी नहीं है। मेरी सहेली की छोटी सी कार एक बड़े से ट्रक से टकरा गई। उसकी जान बच गई मगर एक पैर काटना पड़ा। ट्रक ड्राइवर गिरफ़्तार हुआ फिर जमानत पर छूट गया।
दूसरे दिन अध्यक्ष के बेटे ने न्यायालय में हलफ़नामा दिया कि वह बहुत ही चरित्रवान बेटा है और इस देश के भविष्य को सोने का मुलम्मा चढ़ाकर सुनहरा वही बनाएगा। छोटी सी कार्यकर्ता के द्वारा दिए गए बयान का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि यह बयान उसने पागलपन में दिया था।
न्यायलय ने उसकी रिहाई का हुक्म जारी किया और पुलिस को चेतावनी दी कि आगे से ऐसे इज्जतदार बेटे और देश के भविष्य पर इस प्रकार के झूठे इल्जाम न लगाए जाएँ।
सिर्फ़ एक काम मैंने रूटीन वर्क से हटकर किया और यह हालत हो गई। मेरा बाप ठीक ही कहता था। मगर मेरे जिस्म में खून का खौलना और तेज हो गया था। गर्मी खून से माँस में, माँस से त्वचा पर आ रही थी और मेरे पूरे शरीर में आग लगी हुई थी। अगले दिन मैंने इस्तीफ़ा दे दिया। बाप के पास गई और उसकी पार्टी ज्वाइन कर ली।
उसने कहा, ‘मुझे पहले से ही पता था कि यही होने वाला है।’
मैंने कहा, ‘मैं एक बड़ी पार्टी के अध्यक्ष के बेटे के खिलाफ़ प्रेस में एक बयान देना चाहती हूँ।’
उसने चौंककर कहा, ‘क्या?’
मैंने उसे पूरी कहानी सुनाई। सुनकर वह बोला, ‘यह सब तो मुझे भी पता है। उस लड़के के और भी कई राज मुझे पता हैं। यही नहीं इस देश की अधिकांश पाटिNयों के अधिकांश नेताओं के ऐसे-ऐसे कुकर्मों का मैं राजदार हूँ जो मीडिया के सामने आ जाएँ तो इन नेताओं को या तो आजीवन जेल में गुजारना पड़े या आत्महत्या करनी पड़े।’ मैंने कहा, ‘तो आप यह सब मीडिया को बताते क्यों नहीं।’
उसने कहा, ‘जिस तरह मैं उनके राज जानता हूँ उसी तरह वे मेरा और मेरी पार्टी के नेताओं का राज जानते हैं। इस हमाम में हम सब नंगे हैं इसलिए कोई एक, दूसरे को नंगा नहीं कह सकता। तुम क्या समझती हो कि मेरे विरोधी यह नहीं जानते कि तुम मेरी बेटी हो। यह बात सबको पता है। तुम इतने दिन उस शहर में रही पर क्या कोई नेता तुम्हारे पास अपना काम करवाने आया? सोचो क्यों नहीं आया? यह भी सोचो कि तुम औसत दिमाग की होते हुए भी प्रशासनिक सेवाओं की वरीयता सूची में चौथे स्थान पर कैसे आ गई। बेहतर होगा कि तुम इस मामले को भूल जाओ और पार्टी के क्रियाकलापों पर ध्यान दो। आने वाले दस पंद्रह वर्षों में मैं तुम्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी पर देखना चाहता हूँ।’
दूर से देखने पर आसमान कितना खूबसूरत लगता है। पर कभी आसमान पर जाकर देखिए चारों तरफ अँधेरा ही अँधेरा नज़र आएगा। आसमान से भी बड़ा भ्रम इंद्रधनुष पैदा करता है। इंद्रधनुष आसमान के ठहरे हुए आँसुओं से छिटकता हुआ प्रकाश है। इस तमाम की तमाम खूबसूरती को पास से जाकर देखिए आपको खूबसूरती और बदसूरती में कोई अंतर नज़र नहीं आएगा। सब प्रकाश में छुपे हुए रंगों द्वारा रचा गया मायाजाल है।

(११)
एक बार कीचड़ के दलदल में गिरने के बाद आप निकलने के लिए जितना ज्यादा जोर लगाते हैं उतना ही तेजी से उसमें धँसते चले जाते हैं। कीचड़ में डूबकर कीड़े की मौत मरने से तो अच्छा है कि कमल पर बैठी लक्ष्मी के पाँव पकड़ लिये जाएँ और जीवित रहा जाय। यही सोचकर मैंने भी अंत में कमल पर बैठी लक्ष्मी के पाँव पकड़ लिए।
मुझे परिस्थितियों के साथ समझौता करने में थोड़ा समय लगा लेकिन आखिरकार मैंने समझौता कर ही लिया। मेरे पास और कोई विकल्प भी तो नहीं था। इस हालत में कुछ करना आत्महत्या करने जैसा होता और जीवन तो तुच्छ से तुच्छ जीव को भी प्यारा लगता है।
समझौता करने के बाद मेरे दोस्तों और समर्थकों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ने लगी। दुनिया को मैं कम बदसूरत लगने लगी। पार्टी के कार्यकर्ता मुझे दीदीजी कहकर बुलाने लगे। अब मैं सावधानी से कपड़े चुनकर पहनती थी और अक्सर महिला कार्यकर्ताओं से मुझे यह सुनने को मिलता था कि फलाँ कपड़ा मुझ पर बहुत सूट कर रहा है, फलाँ कपड़े का रंग मुझ पर बहुत खिल रहा है इत्यादि। पुरुषों की नज़रों में भी मैंने अपने लिए बदलाव महसूस किया। बचपन से जो घृणा और उपेक्षा की दृष्टि मैं झेलती आई थी वह अब लगभग खत्म हो गई थी। खासकर उन लोगों की आँखों में जो मुझे जानने-पहचानने लगे थे। कुछ समय बाद मुझे शक होने लगा कि मैं धीरे-धीरे खूबसूरत होती जा रही हूँ। मगर आईना इसका उल्टा ही दिखा रहा था। आईने में मेरा प्रतिबिम्ब दिन-ब-दिन बदसूरत होता जा रहा था।
मेरे बाप ने मुझे पार्टी के विभिन्न पदों से गुजारते हुए अंत में पार्टी का उपाध्यक्ष बना दिया। एक दिन मेरे बाप को दिल का दौरा पड़ा और वो नर्क के रास्ते पर रवाना हो गया। उसके स्थान पर मुझे पार्टी का अध्यक्ष चुन लिया गया क्योंकि मेरे बाप के सारे विश्वासपात्र चमचों को पता था कि वह मेरा बाप था। मुझे न चाहते हुए भी उसके लिए रोना पड़ा। उसकी तस्वीरें पार्टी के कार्यालयों में लगवानी पड़ीं।
समय बीतता गया और धीरे-धीरे मैं सारी दुनिया की दीदीजी हो गई। एक तो मेरी सूरत उस पर मेरी हैसियत, इन दोनों ने मिलकर सारी दुनिया की नज़रों और भावनाओं को मेरे लिए पवित्र बना दिया। अक्सर अकेले में मुझे अमन की याद आती थी और मैं रोने लगती थी। फिर आँसू धीरे-धीरे कम होना शुरू हो जाते थे और गुस्सा बढ़ने लगता था। मैं सोचने लगती थी कि एक दिन ऐसा जरूर आएगा जब मेरे पास ताकत होगी और जिस दिन मेरे पास ताकत होगी मैं अमन का उसी तरह इस्तेमाल करूँगी जिस तरह उसने मेरा किया था। आखिरकार एक दिन मैं मुख्यमंत्री बन ही गई। उस दिन जरूर मेरा बाप नर्क में खुशी से फूला नहीं समा रहा होगा। मुख्यमंत्री बनने के बाद मैंने अमन की खोज करवानी शुरू की। पता चला वह अमेरिका में है और वर्तमान में किसी ऐसी कंपनी में काम रहा है जो निजी इस्तेमाल के लिए अंतरिक्ष यान बनाने में लगी हुई है। अमन मेरी पहुँच से बहुत दूर जा चुका था। मैं अपनी तमाम ताकत का इस्तेमाल करने के बावजूद भी उससे बदला नहीं ले सकती थी। मैंने अपना गुस्सा निकालने के लिए राज्य भर में प्रशासनिक अधिकारियों के तबादले करने शुरू कर दिए। अगले एक महीने तक हर रोज किसी न किसी का तबादला करती रही। कितने ऐसे अधिकारी भी थे जिनकी केंद्र तक पहुँच थी। जो बड़ी पाटिNयों के बड़े नेताओं के तलवे चाटते थे। पर मुझे किसी बात की परवाह नहीं थी। एक-दो बार लोगों ने मेरी जान लेने की कोशिश भी की पर उन्हें शायद यह नहीं पता था कि मुझे मरना होता तो मैं बचपन में ही मर गई होती।
अगले चुनावों में मेरी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। नहीं मिला तो न सही, मेरे सारे रिश्तेदारों ने एक बार में ही इतना कमा लिया कि उनकी सात पुश्तों को कुछ करने की जरूरत नहीं थी। मैंने भी बड़े-बड़े उद्योगपतियों से पार्टी फ़ंड में इतना धन जमा करवा लिया कि चार-पाँच चुनावों तक हाथ-पैर हिलाने की कोई जरूरत नहीं थी और इतना तो निश्चित था कि आने वाले पाँच चुनावों में मैं कभी न कभी तो फिर मुख्यमंत्री बन ही जाऊँगी। आजकल मैंने आईना देखना छोड़ दिया है। आईना बदसूरत लड़कियों से हमेशा झूठ बोलता है। जब तक वे बदसूरत रहती हैं तब तक उनका प्रतिबिम्ब खूबसूरत बनाता है। जब कोई बदसूरत लड़की मेरी तरह अपने दम पर खूबसूरत बन जाती है तो उसका प्रतिबिम्ब बदसूरत बनाने लगता है।

समाप्त

 

कहानी : आभासी हृदय   Leave a comment

(१)

नोवा की उड़नकार हवा में 1000 किमी प्रतिघंटा की रफ़्तार से दौड़ रही थी। अचानक कार के मुख्य कंप्यूटर से आवाज आई, “घातक त्रुटि, कार का स्वचलित उड़नतंत्र पूरी तरह नियंत्रण से बाहर है। कृपया स्वयं नियंत्रण करने का प्रयास करें।” आवाज सुनकर नोवा के चेहरे पर हवाईयाँ उड़ने लगीं। उसने कार को नियंत्रित करने का प्रयास किया मगर कोई फायदा नहीं हुआ। कार अनियंत्रित होकर तेजी से नीचे गिरने लगी। नोवा ने चालक सीट को कार से बाहर उछालने वाला बटन दबाया लेकिन कोई हरकत नहीं हुई। वह फिर से कार को नियंत्रण में लेने का प्रयास करने लगा किंतु उसके सारे प्रयत्न बेकार साबित हुए। कुछ पलों बाद कार जोर से धरती से टकराई और नोवा की चेतना पूरी तरह लुप्त हो गई।

नोवा की आँख खुली तो सबसे पहले उसकी निगाह सामने की दीवार पर टँगे डिजिटल कैलेंडर पर गई। तारीख थी 30 नवंबर सन 2182, यानी उसे पूरे दस दिन बाद होश आया था। उसने अपनी नज़रें इधर उधर घुमाईं तो उसे एक नर्स नज़र आई। उसने नर्स को आवाज दी तो नर्स दौड़ी दौड़ी उसके पास आई। नोवा के करीब आकर नर्स ने बेसब्री से पूछा, “कैसा महसूस कर रहे हैं मिस्टर नोवा। कहीं कोई दर्द तो महसूस नहीं हो रहा है आपको।”

नर्स की बात सुनकर नोवा को महसूस हुआ कि उसका सारा शरीर दुख रहा है लेकिन सबसे ज्यादा दर्द उसके सर में और दिल के आसपास हो रहा था। नोवा ने नर्स को बताया। नर्स बोली, “आपकी पच्चीस हड्डियाँ टूट चुकी थीं, कई का तो चूरा बन गया था। आपकी कुछ हड्डियाँ तो आसानी से जुड़ गईं मगर कुछ हड्डियों को टाइटेनियम की छड़ें लगाकर प्रबलित करना पड़ा और कुछ को पूरी तरह निकालकर टाइटेनियम की छड़ें लगानी पड़ीं। आपकी खोपड़ी के टूटे हुए हिस्से को निकालकर टाइटेनियम की प्लेट लगाई गई है। दर्द अभी कुछ और समय तक रहेगा। शुक्र कीजिए कि आपका दिमाग ज्यादा क्षतिग्रस्त नहीं हुआ केवल कुछ एक तंत्रिकाएँ टूट गई थीं जिनकी जगह हमने कृत्रिम तंत्रिकाएँ लगा दी हैं। अभी हमें ये जाँच करनी है कि सारे आपरेशन पूरी तरह सफल हो गए हैं या नहीं। मैं डॉक्टर को बुलाकर लाती हूँ।”

कुछ पलों बाद नर्स एक डॉक्टर को लेकर आई। डॉक्टर ने आते ही कहा, “आप खुशकिस्मत हैं मिस्टर नोवा जो तीन किलोमीटर की उँचाई से भी गिरकर बच गए”।

“खुशकिस्मत नहीं हूँ डॉक्टर, जीनियस हूँ। मैंने आधुनिक उड़नकार का डिजाइन ही इस तरह बनाया है कि किसी वजह से यदि वह इतनी उँचाई से गिर भी जाय तो कार के चकनाचूर होने के बावजूद उसमें लगा स्वचलित हेलमेट चालक के दिमाग की रक्षा अवश्य कर ले। शरीर के बाकी अंगो के स्थान पर तो कृत्रिम अंग लगाए जा सकते हैं। लेकिन दिमाग में भरी सूचनाएँ दिमाग नष्ट होने के बाद वापस नहीं मिल सकतीं और हम अपने दिमाग में भरी सूचनाओं से ज्यादा और कुछ नहीं हैं।” ऐसा कहकर नोवा ने डॉक्टर से पूछा, “मेरे सर में और दिल के आसपास काफ़ी दर्द क्यों है डॉक्टर?”

“ओह हाँ, शायद नर्स ने आपको बताया नहीं कि आपका दिल काफ़ी क्षतिग्रस्त हो गया था इसलिए हमने उसे निकालकर यांत्रिक हृदय लगा दिया है। ये हृदय अपने काम करने के लिए आवश्यक ऊर्जा सीधे मानव शरीर से ही ग्रहण करता है। आपके शरीर में हो रहे रक्त संचार को दर्शाने वाला यंत्र बाता रहा है कि यांत्रिक हृदय बिल्कुल सही काम रहा है।”

“तो फिर मुझे इतना दर्द क्यों हो रहा है”।

“दरअसल हमारे दिमाग के अलग अलग हिस्से शरीर के अलग अलग अंगों से आने वाले विद्युत संकेतों को समझने का कार्य करते हैं। उदाहरण के लिए हाथों से आने वाले विद्युत संकेतों को समझने के लिए एक विशेष हिस्सा दिमाग में निर्धारित होता है। अगर किसी का हाथ दुर्घटना में कट जाय या कोई बिना हाथ के ही पैदा हो तो दिमाग का वो हिस्सा जो हाथों से आने वाले विद्युत संकेतों को पढ़ता है स्वयं ही कुछ संकेत पैदा करके स्वयं ही उसे पढ़ने लग जाता है। ऐसे में अलग अलग लोगों को अलग अलग अनुभव होते हैं। हम इसे “आभासी बाँह प्रभाव” कहते हैं। कुछ को लगता है कि जैसे उनकी बाँह मोड़ दी गई हो। कुछ को लगता है कि जैसे उन्होंने हाथों से भारी बोझ उठाया हुआ हो। कई तरह के अनुभव लोगों ने बताए हैं। पुस्तकें भरी पडी हैं ऐसे अनुभवों से। ठीक उसी प्रकार यदि किसी का दिल निकालकर मशीनी दिल लगाया जाएगा तो उसके दिमाग का वो हिस्सा जो दिल से विद्युत संकेतों का विनिमय करता है अपने आप कुछ उल्टे सीधे विद्युत संकेत पैदा करके उन्हें समझने लग जाएगा। आपके केस में आपका दिमाग दर्द के विद्युत संकेत उत्पन्न कर रहा है।”

“तो क्या अब मुझे जिंदगी भर इसी दर्द के साथ जीना पड़ेगा।”

“नहीं ऐसा नहीं है। इसे ठीक किया जा सकता है। हम ऐसे रोगियों को एक विशेष प्रकार का हेलमेट पहनने के लिए देते हैं जो एक तरफ तो उनके दिमाग में हो रही हलचलों को पढ़ता है और दूसरी तरफ आँखों के सामने लगे पर्दे पर उनको उनका पूरा शरीर दिखाता है। जब वो अपने शरीर में हरकत होने की कल्पना करते हैं तो हेलमेट में लगा क्वांटम कंप्यूटर उनके दिमाग में हो रही हलचलों का अध्ययन करके पर्दे पर दिख रही छवि को गतिमान करता है। इस तरह धीरे धीरे वो अपनी आभासी बाँह को नियंत्रित करना सीख जाते हैं। हृदय पर दिमाग का पूरा नियंत्रण नहीं होता लेकिन इस हेलमेट के सहारे आप भी अपने दर्द को कम करने की कोशिश कर सकते हैं।”

“मैं अपने घर कब जा सकता हूँ”।

“एक सप्ताह और आपको यहाँ रुकना पड़ेगा। उसके बाद आप जा सकते हैं। हम आपको वो दवाएँ पहले से ही दे रहे हैं जो घावों को तीव्र गति से भरती हैं”।

(२)

एक सप्ताह बाद।

ऐसा लगता था जैसे सारी इमारत शीशे की बनी हो। इमारत की सबसे उँची मंजिल नीचे से दिखाई भी नहीं पड़ती थी। बाहर से देखने पर पूरी इमारत में स्क्रीनें ही स्कीनें नज़र आ रही थीं। अलग अलग स्क्रीनों पर अलग अलग यंत्रों के विज्ञापन दिखाए जा रहे थे। कुछ स्क्रीनों को मिलाकर एक बड़ी सी स्क्रीन बन रही थी जिस पर ‘नोवा प्रौद्योगिकी एवं अनुसंधान केंद्र’ लिखा हुआ था। यह सन 2182 की सबसे बड़ी आधुनिक यंत्र निर्माता कंपनी थी। इसी इमारत के एक कमरे में नोवा का भव्य दफ़्तर था। दफ़्तर की दाईं दीवार के बीचोबीच एक स्वचलित दरवाजा था जो नोवा के खूबसूरत शयनकक्ष में खुलता था। बाईं तरफ की दीवार में लगा दरवाजा एक विशालकाय कमरे में खुलता था जिसमें उच्चाधिकारिओं की बैठक होती थी।

नोवा अपने क्वांटम कंप्यूटर पर वो सारी गणनाएँ फिर से देख रहा था जो उसकी उड़नकार में लगे कंप्यूटर ने दुर्घटना के ठीक पहले की थीं। उसकी कार के टूटे फूटे पुर्जे इकट्ठा करके उसकी कार्यशाला में पहुँचा दिए गए थे। कार में लगा सूचना संग्रहण केंद्र नष्ट होने से बच गया था इसलिए दुर्घटना के पहले का सारा आँकड़ा उसके पास उपलब्ध था। तभी मेज पर रखे त्रिविमीय चलचित्र दूरभाष पर एक खूबसूरत लड़की का त्रिविमीय चित्र दिखाई पड़ने लगा। दूसरे ही पल कमरे में लड़की की खनकदार आवाज़ गूँज उठी। “सर, आकाशगंगा अनुसंधान संस्थान की मालकिन एवं प्रबंध निदेशक मर्करी के साथ आपकी बैठक तीन दिन पहले प्रस्तावित थी लेकिन आपकी दुर्घटना के कारण वो टाल दी गई थी। आज उन्होंने त्रिविमीय चलचित्र दूरभाष पर आपके जल्दी स्वस्थ होने के लिए शुभकामनाएँ भेजी हैं और कहा है कि अगर आप आज ही ये बैठक कर लें तो अच्छा रहेगा वरना उनके पास दूसरे कई योग्य पुरुषों के प्रस्ताव आ रहे हैं।”

नोवा के दिमाग को झटका सा लगा। उसे याद आया कि ये बैठक तीन दिन पहले होनी थी और दुर्घटना के कारण उसके ध्यान से ही उतर गई थी। नोवा ने अपने क्वांटम कंप्यूटर की तरफ देखा। अभी तक दुर्घटना का कोई कारण उसकी समझ में नहीं आया था। उसे पता था कि अगर जल्द ही उसने इसका कारण नहीं खोजा तो बाजार में उड़नकार और उसकी कंपनी दोनों की शाख पर बट्टा लग जाएगा। उसने अपनी सचिव से कहा, “उनसे कहो कि वो अभी यहाँ आ जाएँ। मैं तुरंत उनके साथ बैठक करने को तैयार हूँ।”

थोड़ी देर बाद मर्करी ने अपनी उड़नकार नोवा के दफ़्तर वाली मंजिल की पार्किंग में खड़ी की और बैठक कक्ष की ओर बढ़ी। नोवा की सचिव ने उसे सूचना दी और नोवा उठकर दीवार में लगे दरवाजे से बैठक कक्ष में दाखिल हुआ। बात मर्करी ने शुरू की, “देखिए मुझे आपके बच्चों की जैविक माँ बनने में कोई आपत्ति नहीं है। पर मेरी कुछ शर्तें हैं।”

“क्या शर्तें हैं?” नोवा ने कहा।

“हम एक बेटी और एक बेटे के जैविक माँ बाप बनेंगे। हम दोनों अपनी अपनी कंपनी का पच्चीस प्रतिशत हिस्सा हर बच्चे के नाम करेंगे। गर्भधारण के लिए स्लम की किसी स्त्री की कोख किराये पर ले लेंगे। वही स्त्री बड़े होने तक उन बच्चों को पालेगी फिर उसे उसका उचित मूल्य चुकाकर विदा कर देंगे। आजकल सारे प्रभावशाली लोग ऐसा ही करते हैं। किसके पास बच्चे पैदा करने और पालने का समय है? वैसे भी मेरे और आपके सबसे अच्छे गुणसूत्रों से मिलकर बने बच्चे स्वयं ही इतनी प्रखर बुद्धि वाले होंगे कि हमें ज्यादा चिंता करने की कोई आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।”

“मुझे आपकी शर्तें मंजूर हैं। मैं अपने डॉक्टर से मिलकर सबकुछ तय करके आपको बताता हूँ।” ऐसा कहकर नोवा ने मुस्कुराते हुए मर्करी से हाथ मिलाया। नोवा ने सोचा ऐसी शर्तें तो आजकल हर नौकरीपेशा लड़की रखती है और फिर ये तो इतनी बड़ी कंपनी की मालकिन है। अपने बच्चों की माँ के रूप में इतनी खूबसूरत और बुद्धिमान लड़की पाकर उसे थोड़ा गर्व भी हुआ।

“और हाँ, इस बैठक की वीडियो रिकार्डिंग की एक प्रति मुझको और एक प्रति सार्वजनिक रिकार्ड कार्यालय में मेल कर दीजिएगा। उसके बाद हम दोनों कानूनी तौर पर आनंद लेने के लिए एक दूसरे के त्रिविमीय चित्र का प्रयोग अपने कामक्रीडा यंत्र में कर सकेंगे।” कहकर मर्करी बैठक कक्ष से मुस्कुराती हुई बाहर निकल गई।

बैठक के बाद नोवा अपने कमरे में वापस आया। उसके सर में और दिल के आसपास अचानक दर्द उठना शुरू हो गया था। उसने डॉक्टर से त्रिविमीय चलचित्र दूरभाष पर संपर्क किया तो डॉक्टर की आकृति उसके दूरभाष यंत्र पर प्रकट हुई। नोवा ने कहा, “मैं पिछले एक सप्ताह से आपके दिए हेलमेट द्वारा दर्द को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहा हूँ पर कोई फायदा नहीं हो रहा है।”

“अच्छा! मगर हमारे पुराने रोगियों को तो इस हेलमेट से बहुत फायदा हुआ था। आप अस्पताल आ जाइए। आपका एक बार फिर से चेकअप करता हूँ।” डॉक्टर ने कहा।

“हाँ एक बात और, आकाशगंगा अनुसंधान संस्थान की प्रबंध निदेशक मर्करी अपने अंडाणु देने को तैयार हो गई हैं। आप समय निश्चित कर लीजिए हम दोनों आकर आपके यंत्रों को अपने अंडाणु और शुक्राणु दे देंगे। आप उनमें से जो सबसे अच्छे हों छाँट कर एक भ्रूण तैयार कीजिएगा। फिर उस भ्रूण को स्लम से किसी अच्छी लड़की को किराए पर लेकर उसके गर्भ में डाल देंगे।” नोवा ने कहा।

“तो आप लोग विवाह कब रहे हैं” डॉक्टर ने कहा।

“विवाह के लिए तो काफी समय निकालना पड़ेगा और आप तो जानते ही हैं कि मैं और मर्करी दोनों ही कितने व्यस्त रहते हैं। बहरहाल विवाह जब भी करेंगे आपको जरूर बुलाएँगें चिंता मत कीजिए।” नोवा ने मुस्कुराते हुए कहा और संबंध विच्छेद कर दिया।

(३)

अगले दिन नोवा का चेकअप करने के बाद डॉक्टर ने कहा, “यूँ तो मुझे कोई समस्या नज़र नहीं आती लेकिन आप के दिमाग की कुछ तंत्रिकाओं को भी हमने कृत्रिम तंत्रिकाओं से बदला था। हो सकता है ये कृत्रिम तंत्रिकाएँ आपके मस्तिष्क पर कोई अनचाहा प्रभाव डाल रही हों। इस संबंध में कृत्रिम तंत्रिकाओं के आविष्कारक और विशेषज्ञ डॉक्टर सप्तऋषि से बात करनी पड़ेगी। वो ही इस पर ज्यादा रोशनी डाल सकेंगे। चलिए उन्हीं के संस्थान में चलते हैं, मुझे भी उनसे कुछ आवश्यक काम था।”

“डॉक्टर सप्तऋषि तो मेरे स्वर्गवासी पिताजी के बचपन के दोस्त हैं।” नोवा ने कहा।

“अच्छा, तब तो हमारे लिए और भी आसानी हो जाएगी।” डॉक्टर ने कहा।

थोड़ी देर बाद दोनों डॉक्टर सप्तऋषि के कार्यालय में बैठे थे। डॉक्टर सप्तऋषि ने पूरी बात सुनने के बाद कहा, “तो आखिकार जिस हृदय को हमने नियंत्रित किया था वो हृदय ही नहीं रहा।”

“क्या मतलब” डॉक्टर और नोवा एक साथ बोल उठे।

“एक लंबी कहानी है नोवा। मैं और तुम्हारे पिता इसी शहर में पैदा हुए और पले बढ़े। हमारे बचपन में तुम्हारे दादा पूँजीवादी पार्टी के प्रमुख कार्यकर्ता हुआ करते थे। पूँजीवादी पार्टी सारे पूँजीपतियों ने अपने हितों की रक्षा करने के लिए बनाई थी। पूँजीवादी कुछ तथाकथित समाजसेवियों के सहारे एक अलग सरकार लाना चाहते थे जो पूरी तरह से पूँजीवादियों के नियंत्रण में रहे। मुझे और तुम्हारे पापा को संसाधनों की कभी कोई कमी नहीं रही। इसलिए हमने बड़ी आसानी से दुनिया के सबसे अच्छे कॉलेज में प्रवेश पा लिया। तुम्हारी माँ गाँव से थीं किंतु उनकी बुद्धि विलक्षण थी। उन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद अपनी मेहनत और बुद्धि के दम पर उस परीक्षा को उत्तीर्ण किया और छात्रवृत्ति प्राप्त की। वो बुद्धिमान भी थीं और खूबसूरत भी। हम दोनों ही तुम्हारी माँ को चाहने लगे। कॉलेज में हम तीनों दोस्तों का समूह प्रसिद्ध था। मैं तुम्हारी माँ से प्यार करता हूँ ये बात मैंने न कभी तुम्हारी माँ को बताई न तुम्हारे पिता को। तुम्हारे माता पिता की शादी हो जाने के बाद मैंने तुम्हारे पिता को सच बताया और कह दिया कि अब मैं तुम्हारे घर कभी नहीं आ पाऊँगा। ये जानकर तुम्हारे पिताजी बहुत दुखी हुए कि दोस्त होते हुए भी मैंने उनको कभी इस बात का पता नहीं चलने दिया। पर अंत में सबकी भलाई के लिए उन्होंने मेरी बात मान ली। उसके बाद जब भी तुम्हारी माँ से मेरी बात होती और वो मुझे घर पर बुलाती मैं हमेशा यही कोशिश करता कि मुझे न जाना पड़े। मैं कोई न कोई बहाना बनाकर टाल दिया करता लेकिन उनकी शादी की सालगिरह और तुम्हारा जन्मदिन ऐसे मौके होते जब मेरी एक न चलती। जब भी मैं तुम्हारी माँ से मिलता मेरे दिल में एक टीस सी उठती। मैं उन्हें भुलाने की जितनी कोशिश करता उतना ही ज्यादा उनकी यादें मुझे परेशान करती थीं। अंत में तंग आकर मैंने ऐसी तंत्रिकाएँ बनाईं जो दिमाग में प्रत्यारोपित करने पर दिमाग के किसी खास हिस्से के विद्युत प्रवाह में बाधा पैदा करती थीं। इन तंत्रिकाओं को दिमाग के बाहर से ही चुंबकीय क्षेत्र द्वारा प्रोगाम किया जा सकता था। मैंने अपने कुछ मरीजों पर इसका प्रयोग भी किया जो अपनी बुरी यादों से मुक्ति पाना चाहते थे। ये तंत्रिकाएँ बुरी यादों में बाधा तो पहुँचाती थी मगर उन्हें जितना आवश्यक था उतना दबा नहीं पाती थीं। उन दिनों तुम्हारे पिता कृत्रिम हृदय की खोज में लगे हुए थे। उन्होंने हृदय और दिमाग को जोड़ने वाली तंत्रिकाओं का गहरा अध्ययन किया था। एक दिन बात बात में मैंने उन्हें अपने इस प्रयोग के बारे में बताया तो उन्होंने कहा कि शरीर के कुछ विशिष्ट हार्मोन ही हमें भावुक बनाते हैं। इनके श्रावित होने से हमारे दिमाग के कुछ विशेष हिस्सों द्वारा विद्युत संकेतों को उत्पन्न करने एवं पढ़ने की प्रक्रिया बहुत बढ़ जाती है। तब हमारा दिमाग दिल को ये आदेश देता है कि इन खास हिस्सों में तेजी से रक्त की आपूर्ति की जाय। यदि हम दिल और दिमाग की उन तंत्रिकाओं को जिनके माध्यम से दिमाग दिल को संदेश भेजता है तुम्हारी कृत्रिम तंत्रिकाओं से बदल दें तो हम उनको इस प्रकार प्रोग्राम कर सकते हैं कि जब भी ये हार्मोन, जो भावुकता पैदा करते हैं, शरीर में बनें तब ये तंत्रिकाएँ दिमाग और दिल के बीच विद्युत संकेतों का विनिमय ही न होने दें। जब दिमाग के इन हिस्सों को रक्त ही नहीं मिलेगा तो वो क्रियाशील ही नहीं हो पाएँगें। हारकर दिमाग को उन हिस्सों से काम लेना पड़ेगा जिनमें रक्त तो उपलब्ध होगा पर बुरी यादें नहीं होंगी। इस तरह धीरे धीरे सारी बुरी यादें धुँधली पड़ जाएँगी और एक दिन दिमाग उन पर दूसरे आँकड़े लिखकर उन्हें मिटा देगा। जो बातें इंसान दुहरा नहीं पाता या जिनको याद रखने में इंसान को दिक्कत होती है वो बातें समय के साथ अपने आप मिट जाती हैं।” इतना कहकर डॉक्टर सप्तऋषि रुके और उन्होंने मेज से उठाकर एक गिलास पानी पिया। वातानुकूलित कमरा होने के बावजूद उनके माथे पर पसीना आने लगा था।

“फिर मैंने तुम्हारे पिता जी द्वारा सुझाए गए रास्ते को अपनाते हुए अपने रोगियों पर इसका परीक्षण किया। नतीजे आश्चर्यजनक थे। मगर हर अच्छी दवा की तरह इसका भी एक साइड इफ़ेक्ट था। भावुक करने वाले हार्मोनों का शरीर पर असर न होने से कुछ समय बाद शरीर इन हार्मोनों का निर्माण भी कम कर देता था। यानी बुरी यादों के साथ साथ लोगों की भावुकता भी कम होने लगी। पर बहुतेरे लोगों को ये साइड इफ़ेक्ट नहीं वरदान लगता था। इंसान भावुक न हो और वो सिर्फ़ हानि लाभ के बारे में ही सोचे तो उसे सफल होने से कौन रोक सकता है। मगर मैंने साइड इफ़ेक्ट के कारण इस इलाज का प्रयोग बंद कर दिया। बहुत सारे दूसरे डॉक्टरों ने भी साइड इफ़ेक्ट देखते हुए इस इलाज का प्रयोग बंद किया लेकिन कुछ डॉक्टर फिर भी इस तरीके का प्रयोग कर रहे थे। उन्हीं दिनों पूँजीवादी पार्टी चुनाव जीतकर सत्ता में आई थी। तुम्हारे दादा स्वास्थ्य मंत्री बनाए गए। तुम्हारे पिताजी ने तुम्हारे दादाजी की मदद से इस इलाज पर पूरी तरह से रोग लगवा दी। इस साइड इफ़ेक्ट के कारण खुद पर इस इलाज का प्रयोग करने की मेरी हिम्मत नहीं हुई। इसका एक कारण शायद ये भी रहा हो कि मेरे दिमाग का कोई कोना तुम्हारी माँ को हमेशा याद रखना चाहता था।”

“पर आपके इस आविष्कार का मुझसे क्या संबंध है।”

“वही तो बताने जा रहा हूँ। ऊँची ऊँची इमारतों के बावजूद शहरों में जगह कम पड़ रही थी। इसलिए पूँजीवादी सरकार ने आते ही शहरों के विस्तार पर लगी सीमाएँ समाप्त कर दीं। जहाँ पहले गाँव थे वो जमीन धड़ाधड़ पूँजीपतियों ने खरीदनी शुरू की। जहाँ पहले खेत थे धीरे धीरे वहाँ कारखाने, इमारतें, प्रयोगशालाएँ, बड़ी बड़ी सौर ऊर्जा परियोजनाएँ, अस्पताल, कॉलेज वैगरह खुलने लगे। आधुनिक यंत्रों की मदद से कुछ ही सालों में गाँवों को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया। फसलें उगाने का काम बड़ी बड़ी कंपनियों द्वारा विशालकाय बहुमंजिली खेत बनाकर किया जाने लगा। जिनके पास जमीनें थीं उन्होंने मुआवजे में मिले धन से फ़्लैट खरीद लिए और छोटी मोटी नौकरी करके गुजर बसर करने लगे। जिनके पास जमीन बहुत कम थी या नहीं थी और जो केवल मजदूरी करके गुजर बसर करते थे उन सबको एक नया कानून बनाकर थोड़ा सा मुआवजा और स्लम में झोपड़ियाँ दे दी गईं। इस तरह धीरे धीरे दुनिया में शहर, स्लम और जंगल ही रह गए। जिस दिन हम भारी मात्रा में सस्ती ऑक्सीजन बनाने का कोई विकल्प खोज लेंगे शायद हमें जंगलों की भी आवश्यकता नहीं रह जाएगी। अब तक तो तुम्हारा दिमाग उन दिनों की यादों को पूरी तरह मिटा चुका होगा जिन दिनों तुम्हारे पापा की कंपनी उड़नकार का वाणिज्यिक उत्पादन शुरू करने ही वाली थी और उड़नकार के परीक्षण आखिरी दौर में थे। नाभिकीय ऊर्जा से चलने वाली इस कार का डिजाइन तुम्हारी माँ ने तैयार किया था। तब तुम अठारह साल के थे। एक दिन तुम्हारी जिद पर तुम्हारे पापा तुम्हें साथ लेकर उड़नकार का परीक्षण करने निकले। रास्ते में अचानक कार के कंट्रोल खराब हो गए। तुम्हारे पापा तुम्हें लेकर इजेक्टर सीट की मदद से बाहर निकल गए लेकिन कार जमीन से टकराकर पूरी तरह नष्ट हो गयी। ये वो दिन थे जब दुनिया भर में स्लम वालों ने अपने मानवाधिकारो के लिए शहर के लोगों से युद्ध छेड़ा हुआ था। तुम्हारे पापा तुम्हें लेकर सुरक्षित उतर तो गए लेकिन स्लम में। स्लम वालों ने तुम्हारे और तुम्हारे पापा के शरीर पर लगे सारे ट्रैकिंग यंत्र नष्ट कर दिए और तुम दोनों को कैद कर लिया। ट्रैकिंग यंत्र नष्ट होने पर हम सबने यही समझा कि स्लम वालों ने तुम दोनों को मार दिया है। तब तुम्हारे पापा की कंपनी हथियार भी बनाया करती थी। स्लम वालों ने उन हथियारों का डिजाइन हासिल करने के लिए तुम्हारे पापा को तरह तरह की यंत्रणाएँ दीं, लेकिन तुम्हारे पापा नहीं टूटे। पर अंत में जब उन्होंने तुम्हें नुकसान पहुँचाने की बात की तो तुम्हारे पापा को मानना पड़ा। फिर कुछ ही दिनों में इन हथियारों का डिजाइन एक स्लम से दूसरे स्लम तक होता हुआ सारी दुनिया में पहुँच गया। तुम्हारे पापा द्वारा सहयोग करने के बाद उन्होंने तुम्हें वहाँ घूमने फिरने की इज़ाजत दे दी थी। पता नहीं कैसे, क्योंकि ये तुम ही बता सकते थे और तुम्हें कुछ याद नहीं होगा, तुम्हारी दोस्ती स्लम की एक लड़की से हो गई जिसने तुम्हें शहर में रहने वालों के खिलाफ़ भड़काना शुरू कर दिया। धीरे धीरे तुम्हें लगने लगा कि वो जो कुछ भी कह रही है वो सब सच है। उधर स्लम के पास खतरनाक हथियार आ जाने पर आखिरकार शहर वालों को उनके साथ शांति वार्ता करनी ही पड़ी। उसमें यह निर्णय लिया गया कि सारे स्लम स्वतंत्र कर दिए जाएँगें और स्लम तथा शहर के बीच आने जाने के लिए विशेष प्रकार के पहचान पत्र जारी किए जाएँगें जिससे स्लम के लोग शहर में आकर लूटपाट न कर सकें और शहर वाले स्लम के लोगों का शोषण न कर सकें। जब भी शहर को स्लम की या स्लम को शहर की सेवाओं की जरूरत पड़ेगी तो उन सेवाओं का उचित मूल्य देकर स्लम और शहर की एक साझा कंपनी के जरिए प्राप्त किया जाएगा।” इतना कहकर डॉक्टर सप्तऋषि ने नोवा की तरफ देखा।

“फिर क्या हुआ”। नोवा ने फौरन कहा।

“तुम्हारे पापा ने स्लम वालों को हथियारों का डिजाइन तो दिया था लेकिन उस डिजाइन में एक ऐसा सर्किट जोड़ दिया था जो उपग्रह से नियंत्रित किया जा सकता था। ये ऐसा सर्किट था जो उन हथियारों को बड़े ही विध्वंसक तरीके से स्वतः नष्ट कर सकता था। स्लम से बाहर आते ही तुम्हारे पापा ने ऐसा इंतजाम किया कि जैसे ही उन हथियारों को एक्टिवेट किया जाय वो हथियार स्वतः नष्ट हो जाएँ। इससे स्लम के हजारों लोग मारे गए। मारे जाने वालों में उस लड़की के माँ बाप भी थे जिससे तुम्हारी दोस्ती हुई थी। जब तुम्हें ये बात पता चली तो तुम अपने पापा से लड़ने पहुँच गए। उधर स्लम के हथियार नष्ट होते ही पूँजीवादी पार्टी ने शहर की सेना को स्लम पर फिर से आक्रमण करने का आदेश दिया। तुम अपने पापा से झगड़ा करके उड़नकार लेकर स्लम की तरफ जा रहे थे कि तुम्हारी कार एक अतिशक्तिशाली लेजर बीम की चपेट में आकर दुर्घटनाग्रस्त हो गई और तुम्हारे सर में काफ़ी चोटें आईं। जब तुम्हारे पिता को पता चला तो उन्होंने मुझे बुलाया और उस पुराने प्रयोग को तुमपर आजमाने के लिए कहा ताकि तुम स्लम और उससे जुड़ी सारी बातें भूल सको। उन दिनों तुम्हें लगातार बेहोश रखा जा रहा था ताकि तुम होश में आकर कोई हंगामा न खड़ा करो। पहले तो मैं इस गैरकानूनी और अनैतिक काम के लिए तैयार नहीं था। पर तुम्हारे पापा ने तुम्हारे दादाजी की मदद से इस प्रयोग को एक घंटे के भीतर ही पुनः कानूनी मान्यता दिलाई और एक दूसरे डॉक्टर को इस काम के लिए राजी कर लिया। जब मैंने देखा कि मेरे इनकार का कोई फायदा ही नहीं है और नया डॉक्टर इस मामले में अनुभवहीन है और वो कोई बड़ी गड़बड़ कर सकता है तो मैंने हाँ कर दी। आखिरकार हमने तुम्हारे दिमाग में कृत्रिम तंत्रिकाएँ लगा दीं। जब तुम होश में आए तो तुम्हारे दिमाग में पुरानी घटनाओं की बहुत हल्की हल्की यादें ही बची थी। तुमने अपने पिता जी को इन अजीब यादों के बारे में बताया तो उन्होंने कहा कि तुम बहुत दिनों तक बेहोश थे और तुमने बेहोशी की हालत में कोई सपना देखा होगा। क्योंकि तुम्हारे दिमाग में कुछ भी स्पष्ट नहीं था केवल कुछ धुँधली सी यादें थीं इसलिए तुम्हें उनकी सच लगी। धीरे धीरे तुम्हारे दिमाग ने उन यादों को मिटा दिया। इसके बाद की बातें तो तुम्हें याद ही होंगी कि स्लम पर हमारा पूरी तरह कब्जा हो गया और वो अबतक बरकरार है। हम स्लम की सेवाएँ अपनी मनमाफ़िक दरों पर ले सकते हैं और उनको सेवाएँ देने के बदले मनचाहे पैसे वसूलते हैं। इस प्रयोग को कानूनी मान्यता मिलने के बाद धड़ल्ले से इसका प्रयोग होने लगा। सारे पूँजीपति अपने बच्चों के मस्तिष्क में ये कृत्रिम तंत्रिकाएँ लगवाने लगे ताकि उनकी भावुकता समय के साथ नष्ट हो जाय और वो अच्छे बिजनेसमैन बन सकें। आज पूँजीवादी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी है और उसके मुकाबले केवल स्लम की पार्टी ही खड़ी होने की हिम्मत करती है। लेकिन चुनावों में अपने पैसे और प्रौद्योगिक ज्ञान की मदद से हमेशा पूँजीवादी पार्टी ही विजयी होती है।”

“तो क्या आकाशगंगा अनुसंधान संस्थान की प्रबंध निदेशक मर्करी के दिमाग में भी ऐसी तंत्रिकाएँ लगी हुई हैं जो दुखद यादों और भावनाओं को नियंत्रित करती हैं।” नोवा ने पूछा।

“ये पूछो कि ऐसा कौन है जिसके मस्तिष्क में ये कृत्रिम तंत्रिकाएँ नहीं लगीं। जो भी शीघ्रातिशीघ्र शीर्ष पर पहुँचा है इन्हीं कृत्रिम तंत्रिकाओं की मदद से पहुँचा है।”

“लेकिन मुझे तो दर्द के अलावा और कोई परेशानी नहीं है और मेरे दिमाग में तो वो तंत्रिकाएँ अभी भी होंगी। क्या अब वो मेरे दिल को नियंत्रित नहीं कर रही हैं।” नोवा ने कहा।

“तुम्हारे दिमाग में वो कृत्रिम तंत्रिकाएँ तो हैं लेकिन अब तुम्हारे दिल को दिमाग से आदेश लेने की आवश्यक्ता नहीं है। तुम्हारे दिल में लगा क्वांटम कंप्यूटर तुम्हारे दिमाग के चुंबकीय क्षेत्र में हो रहे परिवर्तनों को दूर से ही पढ़ सकता है और आवश्यकतानुसार दिमाग के सक्रिय हिस्सों में रक्त भेज देता है। अब तुम्हारे दिल को इस तरह नियंत्रित नहीं किया जा सकता। लेकिन तुम्हारे दिमाग के कुछ हिस्सों को बहुत समय बाद सही मात्रा में रक्त मिला है इसलिए उन हिस्सों में जो बची खुची यादें हैं वो वापस आने की कोशिश कर रही हैं। मेरे विचार में तुम्हारा दिमाग उन बची खुची यादों को अपने पास उपस्थित आँकड़ों के आधार पर पहचानने और सुव्यवस्थित करने का प्रयास कर रहा है। जब तक वो ऐसा नहीं कर लेता तुम्हें लगातार सिरदर्द का अहसास होता रहेगा।”

“लेकिन मेरे दिल में दर्द क्यों हो रहा है। जबकि ये तो कृत्रिम हृदय है इसमें तो दर्द होना ही नहीं चाहिए।” नोवा ने कहा।

“इसका जवाब तो तुम्हें डॉक्टर साहब दे ही चुके हैं कि तुम्हारे अवचेतन मस्तिषक को ये पता नहीं है कि तुम्हारे सीने में कृत्रिम हृदय लगा हुआ है। तुम्हारे दिमाग को रक्त सही मात्रा में मिल रहा है इसलिए वो समझता है कि तुम्हारे सीने में दिल अभी भी धड़क रहा है। लेकिन उसको दिल से विद्युत संकेत नहीं प्राप्त हो रहे हैं इसलिए वो स्वतः कुछ विद्युत संकेत उत्पन्न कर रहा है। ये दर्द के विद्युत संकेत हैं। इसी को “आभासी हृदय प्रभाव” कहते हैं जो डॉक्टर तुम्हें पहले ही बता चुके हैं। ये दर्द धीरे धीरे समय के साथ ही खत्म होगा। आज मुझे लग रहा है जैसे मेरे सीने से कोई बोझ उतर गया। सच कहूँ तो तुम्हारी उस शल्य चिकित्सा के लिए मैं कभी अपने आप को माफ नहीं कर पाया।”

(४)

नोवा अपने विशाल शयनकक्ष में सोया हुआ था। उसके माथे पर आई पसीने की बूँदों से लग रहा था कि वो कोई बहुत बुरा सपना देख रहा है। अचानक उसकी नींद खुल गई और एक चीख के साथ वो उठ बैठा। शयनकक्ष की दीवारें सुबह होने पर भीतर से पारदर्शी हो गई थीं और बाहर सुबह का लाल सूरज दिख रहा था। नोवा ने बिस्तर पर लेटे लेटे ही दूरभाष पर डॉक्टर सप्तऋषि से बात करके आपात्कालीन बैठक तय की। थोड़ी देर बाद वो डॉक्टर सप्तऋषि के कार्यालय में बैठा उन्हें अपने सपने के बारे में बता रहा था।

“कल रात भर मुझे अजीब अजीब सपने आते रहे। सुबह जब मैं जागा तो मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था लेकिन अब मुझे समझ में आ गया है ये स्वप्न नहीं वो यादें थी जो आपके अनुसार मेरा दिमाग मिटा चुका था। स्लम की जिस लड़की की बात आप कर रहे थे उसका नाम मीथेन था और उसने तभी मुझे बता दिया था कि पूँजीवादी पार्टी सत्ता में आने के बाद केवल पूँजींपतियों का ही हित चाहती है और उसके लिए स्लम का पूरी तरह शोषण कर रही है। हर बार अपने संसाधनों एवं प्रौद्योगिकी की मदद से चुनाव में गड़बड़ियाँ करवाती है और जीत जाती है। यदि ऐसा ही चलता रहा तो स्लम की पार्टी कभी चुनाव जीत ही नहीं पाएगी और हम यूँ ही पिसते रहेंगे। मुझे ये भी याद आ गया है कि जब मैं उड़नकार से स्लम की तरफ जा रहा था और मेरी कार से शक्तिशाली लेजर किरणें टकराई थीं तो मैं अपनी ही सेना के ऊपर से उड़ रहा था। हो सकता है कि पिताजी ने ही इसका प्रबंध करवाया हो ताकि मैं स्लम तक न पहुँच सकूँ। वो लड़की भी मीथेन ही थी जो पिताजी के ही बम को शरीर पर बाँधकर मेरे माता पिता के कार्यालय में पहुँची थी और वहाँ पहुँचकर बम को एक्टिवेट कर लिया था और अपने साथ साथ मेरे माता पिता को भी उड़ा दिया था। वो पिताजी के आफ़िस का कमरा नम्बर पूछने के लिए मेरे ही कमरे में आई थी और पता पूछने के बाद उसने विदा नहीं अलविदा कहा था और मैं उसे पहचान भी नहीं पाया। शायद वो आखिरी बार मुझे देखने आई थी।” नोवा ने कहा।

डॉक्टर सप्तऋषि बोले, “इसका अर्थ तो ये हुआ कि हम अब तक गलत समझते थे कि दिमाग यादों को मिटा देता है। लगता है कि जब दिमाग पर यादों को मिटा देने का दबाव डाला जाता है तो वो इन्हें दिमाग में गहरे छुपाकर उस हिस्से को अक्रिय कर देता है। लेकिन दबाव हटते ही फिर सारी यादें बाहर निकाल लाता है। इसका अर्थ हुआ कि दिमाग पर इतनी ज्यादा खोजें होने के बावजूद भी हम अभी तक इसे पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं। लेकिन आज मैं बहुत हल्का महसूस कर रहा हूँ क्योंकि इसका अर्थ ये है कि वो सभी दिमाग जो कृत्रिम तंत्रिकाएँ लगने से भावनाहीन हो चुके हैं उन्हें ठीक किया जा सकता है।”

“कैसे ठीक किया जा सकता है?” नोवा ने कहा।

“जैसा तुम्हारे साथ हुआ है उसके अनुसार तो लगता है कि दिमाग स्वयं को खुद ही ठीक कर लेगा अगर हम उन कृत्रिम तंत्रिकाओं को रीप्रोग्राम कर दें।” सप्तऋषि ने कहा।

“वो तो ठीक है लेकिन इतने लोगों के दिमाग में लगी कृत्रिम तंत्रिकाएँ एक साथ रीप्रोग्राम होंगी कैसे? इस तरह के सारे लोग भावनाहीन होने का लाभ उठा रहे हैं। अगर हम उन्हें सारी बात बताएँ और वो हम पर विश्वास कर भी लें तो भी अपनी मर्जी से तो वो लोग अपना लाभ छोड़ने से रहे।” नोवा ने कहा।

“कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा। तुम्हारी कंपनी के बनाए उपकरण तो घर घर में हैं क्या उनमें से कोई ऐसा उपकरण नहीं है जो सर्विस करने के लिए तुम्हारी कंपनी के सेवा केंद्रों में आता हो और जिसको इन तंत्रिकाओं को रीप्रोग्राम करने के लिए प्रोग्राम किया जा सके। एक बात और उपकरण ऐसा होना चाहिए जो सर पर पहना जाता हो और जिसमें क्वांटम कंप्यूटर और दिमाग का चुंबकीय स्कैन करने वाला यंत्र भी लगा हो।” सप्तऋषि ने कहा।

“अरे! ऐसी एक चीज है तो। उड़नकार में लगा हेलमेट, जिसमें क्वांटम कंप्यूटर भी है और मस्तिष्क का चुंबकीय स्कैन करने वाला यंत्र भी। लेकिन दिक्कत ये है कि ये हेलमेट हमें मर्करी की कंपनी “आकाशगंगा अनुसंधान केंद्र” सप्लाई करती है। दर’असल ये हेलमेट मूलतः अंतरिक्ष यात्रियों के लिए डिजाइन किया गया था ताकि ये ब्रह्मांडीय विकिरण को जहाँ तक हो सके दिमाग में पहुँचने से रोके और यदि उसकी मात्रा ज्यादा हो तो खतरे का संकेत भी दे सके। बाद में हमने ये हेलमेट उड़नकार में लगवाया क्योंकि आधुनिक उड़नकारें काफी उँचाई तक जाती हैं और ऐसे में दिमाग पर विकिरण का कुप्रभाव पड़ सकता है।” नोवा ने कहा।

“ये तो एक और समस्या आ गई। अब मर्करी को इस काम के लिए कैसे राजी करेंगे।” सप्तऋषि ने कहा।

“वो आप मुझ पर छोड़ दीजिए।” नोवा ने मुस्कुराते हुए कहा।

इसके बाद अपने डॉक्टर को राजी करने में नोवा को ज्यादा समय नहीं लगा। वो और मर्करी जब डॉक्टर के क्लीनिक में आए तो डॉक्टर ने मर्करी का चेकअप करने के बाद किसी तंत्रिका विशेषज्ञ से मिलने की सलाह दी। तंत्रिका विशेषज्ञ डॉक्टर सप्तऋषि ने मर्करी के दिमाग को स्कैन करने के बहाने कृत्रिम तंत्रिकाओं को रीप्रोग्राम कर दिया। उन्होंने नोवा और मर्करी को सलाह दी कि अभी भ्रूण का निर्माण करना उचित नहीं होगा क्योंकि मर्करी के दिमाग में कुछ अनियमितताएँ हैं जिनकी विस्तृत जाँच करनी पड़ेगी। उसके बाद ही वो कुछ बता पाएँगें।

अब डॉक्टर सप्तऋषि और नोवा को इंतजार करना था। इंतजार मर्करी की भावनाएँ वापस आने का।

तीन दिन बाद रात के बारह बजे मर्करी की आकृति नोवा के दूरभाष यंत्र पर प्रकट हुई। मर्करी ने अपना नाइट गाउन पहन रखा था और अपने शयन कक्ष से ही नोवा से संपर्क किया था। मर्करी की आवाज़ सुनकर नोवा उठ बैठा। मर्करी की बदहवास हालत देखकर ही उसे अंदाजा हो गया कि इसके भी स्वप्न में पुरानी यादें आनी शुरू हो गईं। मर्करी ने नोवा से कहा कि पिछले तीन दिनों से उसे अजीब अजीब स्वप्न दिखाई पड़ रहे हैं।

“ऐसे तुम्हारी समझ में नहीं आएगा। तुम्हें एक लंबी कहानी सुनानी पड़ेगी ऐसा करो तुम मेरे पास आ जाओ।” नोवा ने कहा।

“अभी।” मर्करी बोली।

“हाँ, बिल्कुल अभी। तुम्हें बहुत सारी बातें बतानी हैं।” नोवा ने कहा।

मर्करी को सारी बात समझाने में नोवा को तीन घंटे लग गए। बात करते करते दोनों नोवा के शयनकक्ष में ही सो गए। एक घंटे बाद मर्करी चीखकर उठ गई। उसने फिर कोई बुरा सपना देखा था। उसकी चीख सुनकर नोवा की नींद भी खुल गई।

“जब तक तुम्हारी यादें पूरी तरह वापस नहीं आ जातीं ऐसे बुरे सपने आते रहेंगे”। कहकर नोवा ने मर्करी को अपनी बाहों में भर लिया। नोवा के लिए ये बिल्कुल नया अहसास था क्योंकि अब तक नोवा ने केवल यंत्रों के ढाँचे पर कृत्रिम माँस से बनी साइबोर्ग स्त्री को हो अपनी बाहों में लिया था। साइबोर्ग स्त्री काम क्रीड़ा यंत्र का ही एक हिस्सा थी जो किसी का भी रूप और आकार ग्रहण कर अपने मालिक का मनोरंजन किया करती थी। जिस स्त्री का वो रूप ग्रहण करती थी उसे यंत्र बनाने वाली कंपनी रॉयल्टी देती थी। जो महिला इस तरह की कंपनी से संबंधित नहीं होती थी साइबोर्ग से उसका रूप ग्रहण करवाना तब तक कानूनन अपराध था जब तक की वह महिला उपभोक्ता के बच्चे की जैविक माँ बनने को तैयार न हो जाय या उपभोक्ता की विवाहिता न हो। ये यंत्र उपभोक्ता के दिमाग का गहन अध्ययन करने के पश्चात बनाए जाते थे और उपभोक्ता को बहुत ही कम समय में चरमानंद तक पहुँचा देने में सक्षम थे। ये यंत्र बहुत महँगे थे इसलिए ऐसे लोगों में इनकी माँग ज्यादा थी जिनके पास पैसों की कोई कमी नहीं थी किंतु समय का अभाव था। मर्करी की भी हालत नोवा के ही जैसी थी।

दूसरे दिन सुबह नोवा ने अपने डॉक्टर को सूचना दी कि उसने और मर्करी ने पहले विवाह करने और फिर प्राकृतिक तरीके से माँ बाप बनने का निर्णय लिया है।

कुछ ही दिनों में नोवा और मर्करी ने मिलकर उन सभी लोगों को कृत्रिम तंत्रिकाओं के प्रभाव से मुक्त करा लिया जो उड़नकार का प्रयोग करते थे। जो उड़नकार का प्रयोग नहीं करते थे उन्हें कभी न कभी तो इसका प्रयोग करना ही था। नोवा और मर्करी ने ऐसे सारे लोगों से संपर्क कर एक युवा मोर्चा बनाया। अगले चुनाव में युवा मोर्चा के समर्थन से स्लम की पार्टी जीती। नए दल ने बहुमत से संविधान और कानूनों में भारी बदलाव किए जिनमें से कुछ इस प्रकार थे।

1. न्यायपालिका को जिम्मेदार बनाया गया। हर निर्णय के लिए न्यायधीशों को अंक देने की व्यवस्था की गई। सही निर्णय के लिए धनात्मक अंक और ऐसे निर्णय जो उनसे ऊँची अदालतों द्वारा गलत करार दिए जाएँ उनके लिए ऋणात्मक अंक। न्यायधीशों की पदोन्नति एवं वेतनवृद्धि इस तरह से प्राप्त कुल अंको के आधार पर करने का निर्णय हुआ। यदि किसी न्यायधीश के कुल अंक ऋणात्मक हो जाएँ तो उसे सेवामुक्त करने का भी प्रावधान रखा गया।

2. धन का सारा विनिमय ऑनलाइन कर दिया गया एवं जिसके पास जितना धन हो उसे उतना क्रेडिट दे दिया गया। व्यक्ति का डीएनए, रेटिना और उँगलियों के निशान मिलकर उसके क्रेडिट कार्ड का काम करने लगे।

3. पूँजीपतियों द्वारा एक निश्चित सीमा से ज्यादा कमाया गया सारा धन कर के रूप में वसूलने और गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों के खाते में सीधे क्रेडिट करने की व्यवस्था की गई।

आज 22 सितंबर सन 2192 है। नोवा और मर्करी एक बेटे और एक बेटी के माता पिता हैं। स्लम के हालात पहले से बेहतर हुए हैं मगर अमीरों और गरीबों के बीच का अंतर सैकड़ों वर्षों से पूँजीपतियों के सुनियोजित शोषण का परिणाम था इसे कम होने में कुछ दशक तो लगेंगे ही लगेंगे। कुछ युवा पूँजीपतियों की भावनाएँ वापस आ जाने से उम्मीद जगी है। पर कुछ ऐसे भी पूँजीपति हैं जो जन्म से ही भावनाहीन होते हैं ऐसे पूँजीपतियों के विरुद्ध स्लम की जंग जारी है|

Posted सितम्बर 28, 2012 by ‘सज्जन’ धर्मेन्द्र in Uncategorized

कहानी : मठ और गढ़   Leave a comment

सौ साल बाद एक पैसे का सिक्का गढ्ढे से बाहर निकला। एक ऊँची इमारत बनाने के लिए खुदाई चल रही थी। एक मजदूर के फावड़े से टकराकर मिट्टी के साथ उछला और जाकर सड़क के किनारे गिरा। वर्षों बाद उसने खुली हवा में साँस ली और अपने आस पास नजर घुमाई तो उसे कई निर्माणाधीन इमारतें दिखाई पड़ीं। थोड़ी देर खुली हवा में साँस लेने के बाद धीरे धीरे उसकी चेतना लौटने लगी। उसे याद आने लगा कि कैसे वो एक सेठ की थैली से निकलकर गढ्ढे में गिर गया था। सेठ ने उसे निकालने की कोशिश की मगर अंत में थक हारकर सेठ ने उसे गढ्ढे में ही छोड़ दिया था। पर तब तो यहाँ जंगल हुआ करते थे, उसने सोचा। खैर मुझे इससे क्या मैं तो आखिरकार आज इस मिट्टी की कैद से आजाद हो ही गया हूँ। पहले थोड़ी देर इस स्वतंत्रता का आनंद उठा लूँ फिर कुछ सोचूँगा।

तभी सड़क किनारे खेलते हुए एक मजदूर के बच्चे की निगाह उस सिक्के पर पड़ी। उसने दौड़कर सिक्का उठा लिया। बस फिर क्या था वो सिक्का बच्चे का खिलौना बन गया। बच्चा दिनभर उस सिक्के से खेलता रहा और शाम को ले जाकर अपने गुल्लक में डाल आया। जैसे ही सिक्का गुल्लक में रखे एक रूपए के सिक्कों के ऊपर गिरा उनमें खलबली मच गई। एक रूपए के सिक्के एक साथ बोल उठे, “अरे ये घिसा पिटा, पुराना, मूल्यहीन बेकार सिक्का यहाँ कहाँ से आ गया। ये खुद तो गंदा है ही हमें भी गंदा बना देगा। एक तो हम पहले ही इतनी कम जगह में एडजेस्ट कर रहे हैं ऊपर से ये चिरकुट और टपक पड़ा।” एक पैसे का सिक्का इतने सारे रूपयों को एक साथ देखकर आश्चर्यचकित रह गया। आज से पहले उसने एक रूपए के सिक्के ज्यादातर सपनों में ही देखे थे। कभी कभार ही उसकी मुलाकात एक रूपए के किसी सिक्के से हो पाती थी वो भी इतने कम समय के लिए कि उनके बीच कोई बात हो पानी पूर्णतया असंभव थी। एक दूसरे से टकराकर खनकना तो बहुत दूर की बात थी। वैसे भी उस जमाने में एक रूपए के सिक्के कम हुआ करते थे तिसपर उनकी कीमत भी बहुत ज्यादा थी। अपनी कीमत के घमंड में चूर ढेरों चवन्नियों और अठन्नियों के साथ मौज मस्ती करते हुए उन्हें इस बात की खबर भी नहीं हो पाती थी कि कोई एक पैसे का सिक्का हसरत भरी निगाहों से उनकी तरफ देख रहा है। उनसे दो बातें करना चाहता है और हो सके तो अपनी कीमत बढ़ाने का तरीका भी सीखना चाहता है। एक पैसे के मन में एक रूपए के लिए उस समय अपार श्रद्धा थी। एक पैसा तो इस बात के लिए भी तैयार था कि अगर एक रूपया गुरु बनने को तैयार हो गया तो गुरुदक्षिणा में वो अपना अगूँठा भी काटकर उसे दे देगा।

अब इतने सारे एक रूपए कि सिक्कों को एक साथ इतनी कम जगह में रहते देखकर उस पुरानी छवि को एक जोरदार झटका लगा। रही सही कसर इस बात ने पूरी कर दी कि उनके पास अब न कोई चवन्नी थी न कोई अठन्नी। फिर भी पुरानी आदतों के कारण उसने हाथ पैर जोड़े कि इसमें मेरा कोई कुसूर नहीं था ये तो उस बच्चे ने गलती से उसे उनके साथ रख दिया। पर एक रूपए के सिक्कों ने उस पर कोई दया नहीं की वो रात भर उसे कोसते रहे और उसे उसकी मूल्यहीनता का अहसास कराते रहे।

दूसरे दिन सारे सिक्कों ने जोर जोर से खनकना शुरू किया। बच्चे की माँ ने समझा कि गुल्लक भर गया है और उसे तोड़कर अब वो अपने लिए एक नई साड़ी खरीद सकती है। थोड़ी ही देर बाद गुल्लक एक तरफ फूटा पड़ा था और बच्चे की माँ सिक्के गिन रही थी। उसे एक पैसे का सिक्का दिखा तो उसने घृणा से नाक मुँह सिकोड़ लिया और बच्चे को बुलाकर सिक्का उसे थमा दिया।

बच्चा सिक्के के साथ खेल रहा था। निर्माणाधीन इमारत का मालिक अपने बेटे के साथ वहाँ निर्माणकार्य का निरीक्षण करने आया हुआ था। मालिक के बेटे को पुराने सिक्के इकट्ठा करने का शौक था। उसने बच्चे के हाथ में सिक्का देखा तो देखने के लिए माँगा। बच्चे ने सिक्का दे दिया। देखने के बाद मालिक के बेटे ने कहा कि ये सिक्का मुझे बेचोगे। गरीब बच्चे को क्या पता बेचना खरीदना क्या होता है। उसने समझा कि ये मुझसे मेरा सिक्का माँग रहा है। बच्चे ने इंकार कर दिया और अपना सिक्का वापस माँगने लगा। मालिक के बेटे ने कहा नहीं ये सिक्का तुम्हारे किसी काम का नहीं है तुम इसे मुझको बेच दो। पता नहीं बच्चे ने क्या समझा मगर अगले ही पल बच्चे ने वही किया जिसे करना बच्चे अच्छी तरह जानते हैं। उसने दहाड़ मारकर रोना शुरू कर दिया। बच्चे का रोना सुनकर उसका बाप दौड़ा दौड़ा वहाँ आया। अन्य मजदूर भी उसी तरफ देखने लगे। मजदूर ने सारी बात सुनी तो उसने अपने बच्चे को समझाया बेटा ये तुम्हें एक सिक्के के बदले में ढेर सारे सिक्के दे देंगे फिर मैं तुम्हें उन सिक्कों से खिलौने खरीद दूँगा। बात बच्चे की समझ में आ गई। मालिक ने भी मौके की नजाकत को समझते हुए उस सिक्के के बदले दो सौ रूपए दिए। मालिक को पता नहीं था कि ये सिक्का उसी की जमीन से निकला है।

अब एक पैसे के सिक्के के पास दीवाल पर अपना एक खूबसूरत घर था। सप्ताह में एक बार उसे निकालकर उसकी सफाई की जाती थी। उसके आस पास की दीवाल पर बने कमरों में उसी की तरह कई पुराने सिक्के रह रहे थे। चवन्नियाँ अठन्नियाँ अपने अलग कमरे की आशा में फिलहाल एक ही कमरे में रह रही थीं। बड़े बड़े लोग वहाँ आते और इतने पुराने सिक्कों को एक साथ देखकर दंग रह जाते थे। इन सिक्कों को देखकर कितने संभ्रांत वृद्ध अपने बचपन और जवानी के दिन याद करने लगते थे। यह सब देख सुनकर एक पैसे के सिक्के का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता था।

एक दिन एक पैसे के सिक्के ने देखा कि कमरे के कोने में रखी मेज की दराज में कुछ एक रूपए के सिक्के पड़े हुए हैं। उन पर धूल जम गई थी। इतने बड़े घर में रेजगारी को कौन पूछता है। उन सिक्कों को देखते ही उसे अपने अपमान की याद हो आई जो उस रात एक रूपए के सिक्कों ने मिलकर किया था। क्रोध से उसके नथुने फूलने पिचकने लगे। उसने उन सिक्कों से कहा, “तुम्हारे जैसे सैकड़ों सिक्के मिलकर भी आज मेरी कीमत की बराबरी नहीं कर सकते। तुम लोग इसी काबिल हो कि इसी दराज में पड़े पड़े सड़ जाओ”। ऐसा कहकर उसने बाकी पुराने सिक्कों की तरफ देखा। पुराने सिक्के प्रशंसा भरी निगाहों से उसे देखने लगे। सिर्फ़ चोर ही मौसेरे भाई नहीं होते। कुछ चवन्नियों ने तो उसकी तरफ चुम्बन भी उछाले। पुराने सिक्कों को अपना अनुभवी नेता मिल गया था। अब बस अगले चुनावों की घोषणा होने का इंतजार था।

कहानी : आँखों के साँप   Leave a comment

कजरी गाँव से नई नई आई थी शहर में अपने मामा के पास। उसकी माँ और तीन छोटी बहनें गाँव में ही थे। उसका बाप चौथी बेटी के जन्म के बाद घर छोड़कर भाग गया था ऐसा गाँव के लोग कहते थे। उसकी माँ का कहना था कि उसका बाप इलाहाबाद के माघ मेले में नहाने गया था और मेले के दौरान संगम के करीब जो नाव डूबी थी उसमें उसका बाप भी सवार था। जिन लोगों को थोड़ा बहुत तैरना आता था उनको तो बचा लिया गया पर जो बिल्कुल ही अनाड़ी थे उनको गंगाजी ने अपनी गोद में सुला लिया। तब वह छह साल की थी। उसकी माँ ने पुलिस में रिपोर्ट भी लिखाई थी। तत्कालीन दरोगा का घर इलाहाबाद में था इसलिए जब तक वो थाने में रहा उसने इस केस के नाम पर हर शनिवार इलाहाबाद का कार्यालयीन दौरा किया, उसका तबादला होने के बाद नए दरोगा ने कुछ दिन इधर उधर करके यह लिखकर मामला बंद कर दिया कि उस डूबी हुई नाव में उसका बाप भी सवार था। नाव वाले अपनी सवारियों का नाम पता लिखकर बैठाते नहीं और गोताखोर सारी लाशें ढूँढ नहीं पाते। रिपोर्ट की एक प्रति नया दरोगा उसकी माँ को दे कर गया था जो उसकी माँ ने सँभाल कर रख ली थी। उनकी झोपड़ी और थोड़ी सी जमीन जो झोपड़ी के पीछे थी उसके बाप के नाम पर थी।

उसकी माँ दूसरों के घरों में झाड़ू पोंछा बर्तन (कुछ संज्ञाओं को समय क्रिया बना देता है और कुछ क्रियाओं को संज्ञा) करती थी। पहले तो वह अपनी माँ के जाने के बाद दिनभर झोपड़ी में अपनी बहनों की देखभाल करती थी पर जब उससे छोटी वाली बहन थोड़ा बड़ी हो गई तो कजरी की माँ कजरी को भी अपने साथ हाथ बँटाने के लिए ले जाने लगी। वक्त बीतने लगा और देखते ही देखते कजरी बारह साल की हो गई। वो बिल्कुल अपनी माँ पर गई थी। उसका भी रंग हल्का साँवला और बदन भारी था। बारह साल की उम्र में ही उसका बदन चौदह पंद्रह साल की लड़कियों जैसा लगने लगा था। एक दिन उसकी माँ बीमार पड़ गई और उसने अकेले ही कजरी को काम पर भेज दिया। पहले दो घरों का काम निबटाने के बाद जब वो तीसरे घर में पहुँची तो घर के मालिक रामकिशोर पांडेय अपनी दैनिक पूजा में व्यस्त थे। उसने घर में जाकर देखा सारा घर सूना पड़ा हुआ है।

कजरी ने उनके पास जाकर पूछा, “पंडित जी प्रणाम, पंडिताइन और घर के बाकी लोग कहाँ चले गए।”

“सब मंदिर गए हैं आ रहे होंगें। जाओ अपना काम करो और मुझे पूजा करने दो।”

उसने पोंछा उठाया और बगल वाले कमरे की तरफ चली गई। थोड़ी देर बाद पांडेय जी अपनी पूजा समाप्त करके आए और देखा कि कजरी उनके ही कमरे में पोंछा लगा रही थी।

अचानक उन्होंने कहा, “अरे मैंने यहीं सौ का नोट रखा था कहाँ गया”।

कजरी ने कहा, “मुझे क्या मालूम, मैंने तो यहाँ कोई नोट नहीं देखा”।

“अच्छा बड़ी ईमानदार बनती है, रुक जा अभी तेरी तलाशी लेता हूँ”।

“तलाशी लेनी है तो ले लीजिए लेकिन बेवजह इल्ज़ाम मत लगाइए”। कहकर कजरी ने पंडित जी के चेहरे की तरफ देखा।

अचानक कजरी को पंडित जी की आँखों में एक साँप दिखाई पड़ा, वैसा ही साँप जैसा कुछ दिन पहले उसने अपनी झोपड़ी के पीछे खेतों में देखा था। जिसको देख कर वो इतना डर गई थी कि कुछ पलों तक एकदम जड़ होकर रह गई। लेकिन वो साँप तो कजरी की आहट पाते ही भागने लग गया था। तभी कजरी ने देखा कि साँप पंडित जी की आँखों से बाहर निकल आया और उसने पंडित जी को डस लिया। पल भर में पंडित जी कजरी के सामने मरे पड़े थे और वो साँप अब धीरे धीरे कजरी के करीब आ रहा था। कजरी डर के मारे हिल भी नहीं पा रही थी। जैसे ही साँप का मुँह उसके पाँवों की अँगुलियों से छुआ उसको लगा बर्फ़ का एक टुकड़ा उसकी अँगुलियों के बीच रख दिया गया हो। उसका पैर काँप उठा साँप धीरे धीरे उसके पैरों को अपनी कुंडली में लपेटता हुआ ऊपर की ओर बढ़ने लगा और वो अपने पैरों को काँपने से रोकने की भरपूर कोशिश करने लगी। उसकी माँ ने कहा था कि साँप के सामने लाश की तरह साँस रोककर बिना हिले डुले खड़ी हो जाओ तो साँप काटता नहीं। आज माँ की बात की सच्चाई परखने का समय आ गया था। साँप ने जब उसके फ़्राक के भीतर मुँह घुसेड़ा तो साँस रोकने के बावजूद उसके मुँह से हल्की सी चीख निकल गई। उसने अपनी आँखें कस कर बंद कर लीं। साँप ने एक पल के लिए उसके फ़्राक से बाहर मुँह निकाला और उसकी आँखें बंद देखकर फिर उसके पैरों से लिपटता हुआ ऊपर चढ़ने लगा। कजरी का पैर साँप के ठंढे शरीर की वजह से धीरे धीर सुन्न पड़ता जा रहा था। जब साँप का मुँह उसकी जाँघों से ऊपर की ओर बढ़ा तो उसके मुँह से एक जोर की चीख निकली और न जाने कैसे उसने अपने पैर को जोर से झटक दिया। साँप की कुंडली खुल गई और वो दीवाल से टकराकर नीचे गिरा। कजरी ने देखा कि अचानक पंडित जी जिंदा हो उठे और साँप जल्दी से उनकी आँखों में घुसकर गायब हो गया।

उसने घर पहुँचकर सारी कहानी अपनी माँ को सुनाई तो उसकी माँ को विश्वास ही नहीं हुआ। उसकी माँ बोली, “ऐसा तो पुराने किस्से कहानियों में होता था लेकिन सचमुच में ऐसा कहीं होता है? साँप तो आदमी को देखते ही भाग जाता है और वो तो पंडित जी हैं भूतों पिशाचों को भी अपने मंतर से वश में कर लेते हैं तो एक साँप की क्या मजाल। तू ये बता फिर पंडित जी ने रूपयों के बारे में क्या कहा।”

कजरी बोली, “दुबारा जिंदा होने के बाद पंडित जी ने कहा कि हो सकता है पंडिताइन ने नोट उठा लिया हो या मैंने ही कहीं और रखा हो”।

“चलो अच्छा है वरना बेवजह चोरी का इल्ज़ाम लगता और गाँव के बाकी घरों में भी काम मिलना मुश्किल हो जाता।”

लेकिन कजरी को यकीन था कि जो कुछ उसने देखा वो सब सच था। उसके दिमाग में तरह तरह के विचार आने लगे। वो सोचने लगी क्या हर आदमी की आँख में साँप रहता है? क्या ऐसा भी होता है कि कुछ आदमी साँप के विष से मरने के बाद दुबारा जिंदा ही न हो सकें? क्या सारे साँप आदमियों की आँखों में ही छिपकर रहते हैं? सोचते सोचते उसके मन में साँपों के प्रति एक अजीब सा डर पैदा हो गया। उसने अपनी माँ से कह दिया कि अब से वो अकेले पंडित जी के घर नहीं जाएगी उसे साँपों से बहुत डर लगता है। उसके बाद जब भी वो अपनी माँ के साथ पंडित जी के घर में पोंछा कर रही होती उसे वही साँप अक्सर पंडित जी की आँखों से बाहर निकलने को बेताब दिखाई पड़ता। वो अपनी माँ के कान में जाकर बताती मगर जब तक उसकी माँ देखती साँप गायब हो जाता। धीरे धीरे उसे वही साँप एक दो और घरों के आदमियों की आँखों में दिखाई पड़ने लगा। अक्सर वो भोर में सपना देखती कि एक साँप ने उसको अपनी कुंडली में जकड़ रखा है। वो छूटने की कोशिश कर रही है मगर सारी ताकत लगाकर भी वो हिल तक नहीं पाती। आखिरकार वो थककर चूर हो जाती और छटपटाने की कोशिश भी बंद कर देती तब साँप उसके होंठों पर डस लेता और वो चीखते हुए उठ जाती। उसकी माँ ओझा के पास से ताबीज ले आई, मौलवी से कलमा पढ़वाकर नमक खिलाया, पंडित से मंतर मरवाकर प्रसाद खिलाया मगर कोई फायदा नहीं हुआ।

कुछ दिन बाद शहर से कजरी का मामा आया। वो शहर में रिक्शा चलाता था और कजरी की मामी लोगों के घरों में झाड़ू पोंछा करती थी। उनकी शादी को पंद्रह साल हो गए थे लेकिन कोई बच्चा नहीं हुआ था। कजरी की माँ ने उनको सपने के बारे में बताया। उसके मामा ने कहा, “जरूर किसी ने भूत परेत कर दिया है। गाँव में लोगों को कोई काम धाम तो है नहीं बस भूत परेत करते रहते हैं। शहर में ये सब नहीं होता। वहाँ किसको इतनी फुर्सत है कि दूसरों के घरों मे झाँके। सब अपने अपने में मस्त। हमें तो कोई औलाद दी नहीं भगवान ने। कजरी को हमारे साथ भेज दो। अब तो तुम्हारी दूसरी बेटी भी काम करने लायक हो गई है, उसे काम पर ले जाया करो। कजरी शहर में रहेगी तो कुछ शऊर सीख जाएगी, यहाँ रहेगी गँवार की गँवार बनी रहेगी और ऊपर से ये भूत-परेत। इसको हम गोद ले लेते हैं।”

कजरी की माँ को अपने भाई की बात सही लगी और कजरी आ गई गाँव से शहर। अगले दिन उसकी मामी उसे लेकर राहुल शर्मा के घर गई। राहुल शर्मा एक प्राइवेट कंपनी में मार्केटिंग मैनेजर थे। उनकी पत्नी ललिता शर्मा बच्चों के स्कूल में पढ़ाती थीं। पति पत्नी की जोड़ी किसी रोमांटिक फ़िल्म के नायक नायिका जैसी थी। अभी चार महीने पहले उनको पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी। राहुल की माँ ललिता और बच्चे की देखभाल के लिए आई हुई थीं मगर एक हफ़्ते बाद वो वापस उसके पिता और छोटे भाई के पास जाने वाली थीं। कस्बे में राहुल के पिता की परचून की दूकान थी और राहुल का भाई भी उनके साथ दूकान में हाथ बँटाता था। राहुल और उनकी पत्नी दोनों नौकरी करते थे इसलिए बच्चा सँभालने के लिए स्थायी रूप से किसी को रखना चाहते थे जो सुबह से शाम तक बच्चे की देखभाल कर सके। कजरी का मामा कजरी को इसीलिए गाँव से ले आया था।

राहुल शर्मा उसे देखते ही बोले, “अरे ये तो अभी बच्ची है इससे काम करवाना तो कानूनन जुर्म है। अगर आपसे कोई पूछे तो किसी से कहिएगा नहीं कि ये हमारे यहाँ काम करती है। कह दीजिएगा यहाँ पढ़ने आती है।”

“जैसा आप कहें।” कहकर उसकी मामी उसे शाम तक वहीं रहकर बच्चा सँभालने की हिदायत देकर चली गईं।

कजरी की निगाह राहुल की आँखों पर गई। वहाँ उसे कोई साँप नहीं दिखाई पड़ा। उसे राहत मिली। ललिता ने उसको समझाया दी कि बच्चा जब रोए तो कैसे बच्चे का दूध गर्म करना है फिर बॉटल और निपल उबालना है। उसके कपड़े और डायपर कैसे बदलने हैं। सारी हिदायत देकर दोनों पति पत्नी अपने काम पर चले गए। कजरी के दिन आराम से कटने लगे। अब उसे लोगों की आँखों में साँप दिखाई देना काफी कम हो गया था। उसे अपने मामा और राहुल की आँखों में वो साँप अब तक कभी नहीं दिखा इसलिए धीरे धीरे वो पूरी तरह निश्चिंत हो गई।

दो साल और बीत गए। कजरी थी तो चौदह साल की लेकिन शरीर भारी होने के कारण अठारह की लगने लगी थी। एक दिन वो पोंछा मार रही थी और ललिता स्नान कर रही थी। अचानक कजरी की निगाह ऊपर उठी तो उसने देखा राहुल उसे ही देख रहे हैं और उनकी आँखों में भी एक साँप लहरा रहा है। पर कजरी से निगाह मिलते ही वो साँप डर कर भाग गया। कजरी को लगा कि ये वही खेत वाला साँप है जो इंसानों से डरकर भाग जाता है। कजरी को आज थोड़ी खुशी हुई कि उसके पास साँप को डराकर भगाने की भी ताकत है। अब कजरी जानबूझकर तभी पोंछा लगाती जब ललिता स्नान करने के लिए जाती ताकि वो राहुल की आँखों के साँप पर अपनी ताकत आजमा सके। उसने कई बार राहुल की आँखों में साँप को आते और डरकर भागते देखा। अब ललिता को ये एक तरह का खेल लगने लगा और इसे खेलने में उसे मजा आने लगा। धीरे धीरे ललिता में आत्मविश्वास जागने लगा कि वो जब चाहे राहुल की आँखों में साँप को बुला सकती है और फिर उसे पलक झपकते ही भगा सकती है।

एक दिन रात में अचानक कोई आवाज सुनकर ललिता की नींद टूट गई। उसने अँधेरे में इधर उधर देखा पर उसे कुछ भी नहीं दिखा। कुछ क्षण बाद वही आवाज़ दुबारा आई तो उसे पता लगा कि आवाज़ उस कमरे से आ रही है जिसमें उसके मामा मामी सोते हैं। उसने दरवाज़े की झिरी से अंदर झाँका तो दंग रह गई। कमरे की लाइट जली हुई थी और उसकी मामी बिना कपड़ों के लेटी हुई थीं। एक मरियल से साँप ने उनको अपनी कुंडली में जकड़ रखा था। साँप बार बार उसकी मामी के होंठों पर डस रहा था। एक नागिन उसकी मामी के एक तरफ़ मरी पड़ी थी और दूसरी तरफ़ उसके मामा मरे पड़े थे। थोड़ी देर तक यही क्रम जारी रहा फिर अचानक उसके मामा जिंदा हो गए और वो साँप उनकी आँखों में समा गया। उसके मामा के सोने के बाद वो नागिन भी जिंदा हो गई और उसकी मामी की आँख में जाकर गायब हो गई। उसे आश्चर्य हुआ कि ये दोनों भी जानते हैं आँखों में रहने वाले साँप के बारे में तो उसकी कहानी पर विश्वास क्यों नहीं करते। अचानक उसे लगा कि उसकी आँखों में कुछ चुभ रहा है। उसने धीरे से अपने कमरे का बल्ब जलाया और आइना उठाकर अपना चेहरा देखा। उसकी मुँह से चीख निकलते निकलते रह गई। एक नागिन उसकी आँखों से धीरे धीरे बाहर आ रही थी। अचानक नागिन तेजी से बाहर निकली और उसने कजरी को डस लिया। उसके बाद उसकी नींद तब खुली जब उसकी मामी दरवाजा खटखटा रही थी। वो जल्दी से उठी और अपने काम में जुट गई। आज उसे अपना बदन फूलों जैसा हल्का फुल्का लग रहा था। उसे आज एक नई बात पता चली कि औरतों की आँखों में नागिन रहती है।

एक दिन कजरी जब राजेश के घर गई तो राजेश को हल्का बुखार था। उसने आफ़िस से छुट्टी ले ली थी और एक क्रोसिन खाकर बिस्तर पर पड़ा हुआ था। ललिता ने उसे बच्चे के साथ साथ राजेश का ख्याल रखने की भी हिदायत दी और स्कूल चली गई। डेढ़ घंटे बाद राजेश की तबीयत कुछ सुधरी तो उसने ललिता से पानी माँगा। वह पानी लेकर राजेश के पास गई तो उसे वही साँप फिर राजेश की आँखों में दिखाई पड़ा। उसने उसे डराकर भगाने की कोशिश की मगर वह न तो डर कर भाग रहा था न ही बाहर निकल रहा था। कजरी को न जाने क्यूँ अब इस साँप से डर नहीं लगता था। राजेश ने कजरी को खाना लगाने के लिए कहा। खाना लगाने के बाद कजरी वहीं राजेश के सामने ही डाइनिंग टेबल पर बैठ गई। साँप लगातार राजेश की आँखों में दिखाई पड़ रहा था। थोड़ी देर बाद कजरी को अपनी आँखों में चुभन महसूस हुई। वो उठकर बाथरूम में गई तो उसे वही नागिन दिखाई पड़ी जिसने उस रात उसे डसा था। वह वापस आकर फिर कुर्सी पर बैठ गई। अचानक दोनों की आँखें मिलीं। कजरी ने सोचा क्या राजेश को पता है कि उसकी आँखों में नागिन रहती है? क्या मेम साहब की आँखों में भी नागिन रहती है? पर उसने तो कभी मेम साहब की आँखों में नागिन नहीं देखी। अचानक साँप राजेश की आँखों से बाहर निकला और उसने राजेश को डस लिया। कजरी के सामने राजेश मरा पड़ा था और साँप धीरे धीरे उसकी तरफ बढ़ रहा था। उसे लगा कि साँप अब भी उससे डर रहा है। अचानक कजरी की आँखों से नागिन बाहर निकली और उसने कजरी को डस लिया।

उसके बाद जब कजरी की आँखें खुलीं तो उसने अपने आप को राजेश के साथ बिना कपड़ों के बेड पर लेटा पाया। राजेश गहरी नींद सो रहा था और साँप शायद वापस उसकी आँख में घुसकर गायब हो गया था। उसने घड़ी देखी मेमसाब के आने का समय हो गया था। उसने फटाफट राजेश को जगाया। अब राजेश की आँखों में उसे वह साँप नहीं दिखाई दे रहा था। दोनों ने जल्दी से अपने कपड़े पहन लिए। कजरी की कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि अगर सब की आँखों में साँप रहता है तो लोग उसकी बात का विश्वास क्यों नहीं करते। उसने राजेश से पूछा क्या आपको मेरी आँखों में नागिन दिखी थी। राजेश ने हाँ में सिर हिला दिया। फिर उसने अपनी कहानी राजेश को सुनाई और ये भी बताया कि लोग उसकी बात का विश्वास ही नहीं करते। राजेश ने कहा कि उसे कजरी पर पूरा विश्वास है। ये सुनकर कजरी खुश हो गई। उस रात कजरी ने सपना देखा कि राजेश के बेडरूम में वो दोनों मरे पड़े हैं और राजेश की आँखों का साँप और उसकी आँखों की नागिन एक दूसरे के इर्द गिर्द लिपटकर झूम रहे हैं। लेकिन उसे इस सपने से बिल्कुल भी डर नहीं लगा।

इसके बाद महीने में तीन चार बार राजेश घर में अकेले रहने का कोई न कोई बहाना ढूँढ ही लेता। कभी दफ़्तर से जल्दी आ जाता, कभी सर दर्द का बहाना करके घर में ही पड़ा रहता। एक दिन वो दफ़्तर से जल्दी घर आया तो देखा कजरी बिस्तर पर पड़ी हुई है।

उसने कजरी से पूछा, “क्या हुआ तबियत ठीक नहीं है क्या?”

वो बोली, “नहीं सारे बदन में अजीब सा दर्द है। सर भारी भारी लग रहा है।”

राजेश ने उसका माथा छुआ। कजरी को तेज बुखार था। वो उसे लेकर अपने मित्र अनुज के पास गया। राजेश और अनुज इंटर तक एक ही स्कूल में पढ़े थे। उसके बाद राजेश ने इंजीनियरिंग करके एमबीए कर लिया था और अनुज एमबीबीएस और फिर मेडिसिन में एमडी करके राजेश के घर से थोड़ी दूर स्थित एक बड़े प्राइवेट हास्पिटल में नौकरी कर रहा था। राजेश ने अनुज को कजरी के बारे में बताया। अनुज ने कजरी की आँखें देखीं। आँखें लाल हो रही थीं। कजरी ने अनुज की आँखें देखीं उसमें उसे साँप नहीं दिखाई पड़ा।

अनुज ने राजेश से कहा, “लगता है इसे मलेरिया हो गया है। इसके खून की जाँच करनी पड़ेगी।”

खून की जाँच रिपोर्ट देखकर अनुज को झटका लगा।

उसने राजेश से कहा, “अरे ये लड़की तो प्रेगनेंट है। ये तो पुलिस केस है। नाबालिग के साथ रेप का मामला है।”

उसके बाद राजेश ने अनुज को एक कोने में ले जाकर सारी बात समझाई कि इसमें उसका कोई कसूर नहीं है वो चाहे तो कजरी से पूछ ले। जो कुछ किया है आँखों में रहने वाले साँप ने किया है। वरना वो तो एक सीधा सादा इज्जतदार आदमी है और कानून की बहुत इज़्जत करता है। अनुज ने कजरी से पूछा तो कजरी ने उसे भी साँप वाली कहानी सुनाई। कजरी ने देखा कि वो कहानी सुनने के बाद अनुज की आँखों में भी वैसा ही साँप दिखाई पड़ने लगा है। अनुज ने किसी तरह कजरी का गर्भपात कराया और आगे से राजेश को साँप से सावधान रहने की हिदायत दी। लेकिन अगले दिन शाम को ललिता के आने से बहुत पहले अनुज और राजेश दोनों घर आ गए। कजरी ने देखा दोनों की आँखों में साँप लहरा रहे हैं। आज उसे राजेश की आँखों के साँप से भी डर लगा। फिर अचानक कजरी ने देखा कि दोनों की आँखों से साँप बाहर निकले और दोनों को डस लिया। पल भर में कजरी के सामने दोनों मरे पड़े थे। दोनों साँप तेजी से कजरी की ओर बढ़े। कजरी की आँखों से आज कोई नागिन नहीं निकली। आज वो साँपों को देखकर डर से काँप रही थी। फिर दोनों साँपों ने उसे एक साथ अपनी कुंडली में जकड़ लिया। अचानक न जाने कहाँ से कजरी में इतनी ताकत आ गई कि उसने जोर से झटका दिया और दोनों साँप जाकर दीवार से टकराए। उसने जल्दी से दरवाजा खोला और बाहर निकलते निकलते उसने देखा कि राजेश और अनुज जिंदा हो गए हैं और दोनों साँप उनकी आँखों में समा रहे हैं।

अगले दिन कजरी काम पर नहीं आई और उसका मामा राजेश के घर आया।

ललिता ने पूछा, “आज कजरी क्यों नहीं आई। आज बच्चा कौन सँभालेगा।“

कजरी के मामा ने कहा, “आज कजरी बीमार है और बच्चा वो खुद सँभालेगा”।

ललिता के जाने के बाद राजेश आफ़िस जाने की तैयारी कर रहा था कि कजरी के मामा ने उससे कहा, “कल कजरी ने मुझे घर आने के बाद सारी बात बता दी। आपने ठीक नहीं किया मालिक। बच्ची है वो।”

राजेश को जैसे लकवा मार गया। वो तो सोचे बैठा था कि जैसे अब तक कजरी ने घर पर कुछ नहीं कहा था कल भी कुछ नहीं कहेगी। मगर ये क्या हो गया। राजेश का मुँह लटक गया।

कजरी के मामा ने मौका देखकर कहा, “मालिक अब जो हो गया सो हो गया। बात बढ़ाकर मैं आपके सुखी परिवार में आग नहीं लगाना चाहता। लेकिन मैं चाहता हूँ कि अब कजरी की शादी हो जाय और बात खत्म हो। पर मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि मैं उसकी शादी कर सकूँ। समझ रहे हैं न मालिक।”

राजेश पल भर में सबकुछ समझ गया। उसके बाद कजरी के मामा ने रिक्शा बेचकर आटो खरीद लिया और उसकी मामी ने घरों में झाड़ू पोंछा लगाना बंद कर दिया। कुछ दिन के बाद कजरी की शादी चालीस साल के एक विधुर से कर दी गई जिसके दो छोटे बच्चे थे और पत्नी की मौत के बाद उसे बच्चा सँभालने वाली चाहिए थी। शादी के बाद पहली रात जब कजरी का पति उसके पास आया तो कजरी ने उसकी आँखों में वैसा ही साँप लहराता हुआ देखा। तभी कजरी ने देखा कि उसकी आँखों से नागिन चुपचाप निकली और उसने फर्श पर अपना सर पटक पटक कर दम तोड़ दिया। अचानक उसके पति की आँखों के साँप ने बाहर निकलकर उसके पति को डस लिया। अब उसका पति उसकी बगल में मरा पड़ा था और साँप उसे कुंडली में लपेटकर उसके होंठों पर डसने जा रहा था। उसके मुँह से घुटी घुटी चीख निकली और साँप बार बार उसके होंठों पर डसने लगा। कुछ देर बाद साँप ने उसे छोड़ा तो उसका पति जिंदा हो गया और साँप उसके पति की आँखों में समा गया। फर्श पर मरी हुई नागिन भी जिंदा हो गई और उसके सीने पर चढ़ कर झूमने लगी। आज उसे इस नागिन से डर लग रहा था। वो न तो उसे डस रही थी न ही उसकी आँखों में समा रही थी। बस उसके सीने पर चढ़कर झूमे जा रही थी। फिर नागिन उसके सीने से उतरी और फर्श पर कुंडली मारकर झूमने लगी। कजरी का भी मन हो रहा था कि वो भी नागिन के साथ झूमे। थोड़ी देर बाद वो भी फर्श पर बैठकर नागिन के साथ झूमने लगी। उसके बाल खुलकर बिखर गये। काफी देर तक यही चलता रहा फिर अचानक नागिन ने उसे डस लिया। सुबह जब वो उठी तो उसका पति गहरी नींद में था। वो घर के कामों में लग गई।

कई महीनों तक यही चलता रहा। एक दिन रात में उसके पति की नींद टूट गई और उसने कजरी को फर्श पर बैठकर झूमते हुए देखा। उसे नागिन नहीं दिखाई पड़ी। डर के मारे उसकी हालत खराब हो गई। उसकी समझ में कुछ नहीं आया। उसने कजरी के कंधों पर हाथ रखा तो वो चीखमार बेहोश हो गई। उसके पति ने सुबह उसके मामा से बात की तो उसके मामा ने गाँव में भूत परेत किए जाने की बात स्वीकार की। कजरी का पति उसे लेकर तुरंत एक बाबा के पास गया। कजरी को बाबा की आँखों में भी वही साँप दिखाई पड़ा। कजरी के पति ने सारी कहानी बाबा को सुनाई। कजरी ने देखा कि कहानी सुनने के बाद वो साँप बाबा की आँखों से बाहर निकलने के लिए जोर जोर से फुँफकार रहा था। बाबा ने कजरी के पति से कजरी को एक सप्ताह के लिए उनके आश्रम में छोड़ कर जाने के लिए कहा। कजरी का पति उसे छोड़कर चला गया। बाबा ने अपने चेलों से उसकी कुटिया में एक हवनकुंड बनाने के लिए कहा।

रात को जब बाहर झिल्ली जोर जोर से झनझना रही थी कुटिया के अंदर हवनकुंड में आग की लपटें उठ रही थीं। हवन कुंड के एक तरफ बाबा बैठा था। दूसरी तरफ कजरी बैठी थी और बाकी दोनों तरफ बाबा के दो चेले बैठे थे। कजरी की निगाहें बार बार बाबा की आँखों की तरफ जा रही थी जहाँ साँप जोर जोर से लहरा रहा था। बाबा ने कजरी से कहा कि अब तक जो कुछ भी उसके साथ हुआ है वो सबकुछ उसे बता दे। कजरी ने सारी बातें बाबा को बता दीं। बाबा ने कजरी को समझाया कि आँखों में रहने वाला साँप अगर कच्ची उम्र में किसी लड़की को छू ले तो वो लड़की अभिशप्त हो जाती है। उसे वही साँप जीवन भर सारे मर्दों की आँखों में दिखलाई पड़ता है। इस शाप से छुटकारा पाना बहुत मुश्किल है। अगर वो किसी को भी यहाँ हुए अनुष्ठान के बारे में बताएगी तो उसे इस शाप से छुटकारा कभी नहीं मिलेगा। ऐसा कहकर बाबा ने चेलों को बाहर जाने का इशारा किया। चेलों के बाहर जाने के बाद कजरी को फिर वही जाना पहचाना दृश्य दिखाई पड़ा। साँप बाबा की आँखों से बाहर निकला और बाबा को डँसने के बाद उसकी ओर बढ़ा। कजरी की आँखों से नागिन निकली और उसने फर्श पर फन पटक पटककर दम तोड़ दिया। धीरे धीरे साँप ने उसे अपनी कुंडली में भर लिया। जैसे ही साँप ने कजरी के होंठों पर डँसा वो जोर से चीख पड़ी। साँप बार बार उसके होंठों पर डँसने लगा और वो बार बार चीखने लगी। आश्रम में इस तरह के अनुष्ठान और चीखें आम रही होंगी इसलिए कजरी को बचाने कोई नहीं आया। कुछ देर बाद कजरी ने देखा कि नागिन जीवित हो उठी। वो तेजी से आकर उस नाग से लिपट गई। साँप ने कजरी को छोड़ दिया और नागिन से लिपटने लगा। अब कजरी के सामने साँप और नागिन एक दूसरे से लिपट लिपटकर खेल रहे थे। थोड़ी देर बाद दोनों थककर चूर हो गए और साँप और नागिन जहाँ से निकले थे वहीं जाकर गायब हो गए। कजरी को रात भर नींद नहीं आई। आज नागिन बीच में ही कैसे जिंदा क्यों हो गई और जिंदा होने के बाद उसने कजरी को डसा क्यों नहीं? ऐसे प्रश्न बार बार उसके दिमाग में घूम रहे थे मगर उसे लगता था कि उसे इन प्रश्नों का उत्तर कभी नहीं मिलेगा।

एक सप्ताह बीतने पर उसका पति वापस आया और उसे अपने साथ ले गया। कजरी की आँखों से एक महीने तक नागिन बाहर नहीं निकली। एक महीने बाद उसे पता चला कि वो गर्भवती हो गई है। रात में उसने स्वप्न देखा कि वो अस्पताल में है और नर्स उसे उसका बच्चा दिखा रही है। उसकी निगाह अपने बच्चे पर गई तो उसकी चीख निकल गई। उसे बच्चे की जगह नर्स के हाथ में कुंडली मारे बैठा साँप दिखाई पड़ा। वो चीखकर जग गई। उसने अपने पति को जगाकर सपने के बारे में बताया। उसके पति ने समझा कि भूत परेत फिर से उसके सिर पर सवार हो गए हैं। वो उसे ले जाकर फिर बाबा के आश्रम में छोड़ आया। लेकिन इस बार वहाँ हफ़्ते भर रहने के बाद उसकी हालत और खराब हो गई। आश्रम से वापस आकर एक दिन उसने अपने पेट में पल रहे साँप को मुक्के मारकर खत्म कर देने की कोशिश की। उसका पति उसे डाक्टर के पास ले गया। कजरी ने डाक्टर को बताया कि उसके पेट में साँप है और वो उसे मार डालना चाहती है। डाक्टर ने अल्ट्रासाउंड किया तो उसे कजरी के पेट में बच्चा दिखाई पड़ा। डाक्टर ने घोषित कर दिया कि कजरी की मानसिक स्थिति ठीक नहीं है और बच्चा पैदा होने तक उसे अस्पताल में ही रखा जाय। उसके आठ महीने बाद कजरी को बच्चा पैदा हुआ। कजरी उसे देखकर जोर से चीखी और बेहोश हो गई। कजरी को पागलखाने में डाल दिया गया।

पागलखाने में कजरी को कभी वार्ड ब्वाय की आँखों में कभी डाक्टर की आँखों में वही साँप दिखाई पड़ता। कभी उसे लगता कि साँप उसके भीतर है और उसका पेट फाड़कर बाहर आ रहा है। वक्त बीतता गया और वक्त के साथ कजरी का पागलपन बढ़ता गया। एक बार उसने डाक्टर की आँखों में उँगलियाँ घुसेड़ने की कोशिश की। उसके बाद उसे खतरनाक पागलों के वार्ड में भेज दिया गया।

कहानी : होलिका   Leave a comment

प्रथमोध्याय : अनुमोदन

यमराज के दरबार में कई युगों से एक मुकदमा लटका हुआ है। कारण है पर्याप्त जानकारी एवं सबूतों का अभाव। यमराज कई बार सोचते हैं कि अपराधिन को नर्क भेजकर जैसे तैसे मामले को निपटा दिया जाय मगर दिक्कत ये है कि उन्हें अपने फैसलों के लिए श्रीभगवान को जवाब देना पड़ता है। एक गलत फैसला और लगा भगवान के नाम पर बट्टा। यूँ ही तो नहीं कहा जाता कि भगवान के घर देर है अंधेर नहीं।

युगों पहले जब मुकदमा आया था तो सभी सबूत एवं गवाह अपराधिन के विरुद्ध थे मगर जब अपराधिन का अचूक ‘लाई डिटेक्टर टेस्ट’ किया गया तब पता चला कि स्वयं के निर्दोष होने के बारे में वह सच बोल रही थी। मगर लोगों की भावना के विरुद्ध केवल अपराधिन के बयान के आधार पर फैसला सुनाने को यमराज ने ठीक नहीं समझा। आखिर वो इतनी महत्वपूर्ण गद्दी पर इतने युगों से ऐसे ही थोड़े जमे हुए थे।

फिर देवताओं की एक जाँच समिति बनाई गई और मामला उसे सौंप दिया गया। समिति ने सारे सबूतों का दुबारा और भी ज्यादा गहनता से अध्ययन किया तथा सारे गवाहों के दुबारा बयान लिए कि कुछ नया पता चले मगर अंत में वही ढाक के तीन पात। समिति ने अपनी जाँच रिपोर्ट अभी कुछ ही दिन पहले यमराज को सौंपी थी। यमराज ने जब देखा कि अंत में फिर से बॉल उनके ही कोर्ट में आ गई है तो वो कुछ बेचैन हुए। कई रातों तक सोच सोचकर उन्हें नींद नहीं आई। आखिरकार उन्होंने माँ सरस्वती का ध्यान किया और उन्हें एक स्वर्ण-हंस देने का वायदा किया तो एक रात उन्हें उपाय सूझ गया और उस रात वो चैन की नींद सोए।

अगले रोज वो रिपोर्ट लेकर श्री भगवान के पास पहुँचे। श्री भगवान अपने दफ़्तर में दोपहर का भोजन करने के पश्चात झपकी ले रहे थे। उनके पीए ने यमराज को वस्तुस्तिथि से अवगत कराया तो यमराज भी बाहर पड़े सोफे पर अधलेटे से हो गए और धीरे धीरे निद्रा देवी उन्हें अपनी बाहों में भरने की कोशिश करने लगीं। थोड़ी देर बाद चाय माता ने प्रवेश किया तो निद्रा देवी शर्माकर भाग गईं और पीए ने बताया कि श्री भगवान का बुलावा आ गया है। यमराज ने जल्दी जल्दी चाय खत्म की और रिपोर्ट बगल में दबाकर श्री भगवान के पास पहुँचे। चाय की एक चुस्की लेते हुए श्री भगवान बोले, “आओ यमराज बैठो। बताओ कहाँ हस्ताक्षर करना है?”

“प्रभो हस्ताक्षर बाद में करवाऊँगा पहले मैंने सोचा कि मामले से आपको अवगत करा दूँ। वो होलिका वाले मामले में मैं सोच रहा हूँ कि अग्नि देव का भी बयान लिया जाय।”

“क्या बात कर रहे हो, धरती वासियों के किसी भी मामले में देवताओं का बयान हमारे संविधान के विरुद्ध है।”

“प्रभो मामला नाजुक है। होलिका कहती है वो निर्दोष है और ‘लाई डिटेक्टर टेस्ट’ कहता है वो सच बोल रही है। सारे सबूत और गवाह उसके खिलाफ हैं। उसे नर्क भेजते हैं तो अंधेर करने से दुर्वासा के श्राप के कारण आपको गद्दी छोड़कर इंसान बनना पड़ेगा और अगर स्वर्ग भेजते हैं तो लोग आपके सारे पुराने किस्से कहानियों को शक की निगाह से देखने लगेगें। कालान्तर में वो आपकी पूजा करना बंद भी कर सकते हैं। उस स्थिति में भी बहुमत न होने से आपकी सरकार गिर जाएगी। संकट घनघोर है प्रभो।”

“तो क्या किया जाय।”

“संविधान में संशोधन किया जाय और अग्नि देव का बयान दर्ज करवाया जाय। आखिर आग की लपटों के बीच होलिका ने क्या किया ये अग्निदेव से बेहतर और कौन जान सकता है। उनके बयान से सबकुछ स्पष्ट हो जाएगा। वो कभी झूठ नहीं बोलते और उनके बयान पर सभी विश्वास करते हैं। आखिर श्री राम और देवी सीता वाले केस में भी उन्होंने बयान दिया ही था।”

“वो मामला धरती का था पर एक देवी पर आरोप लगाए गए थे इसलिए वहाँ संविधान संसोधन की आवश्यकता नहीं थी। बहरहाल दूसरा कोई रास्ता भी तो नहीं है आप संविधान संशोधन की नोटशीट ले आइए।”

“ये लीजिए, यहाँ हस्ताक्षर कर दीजिए।” कहकर यमराज ने नोटशीट, जो वो पहले से ही बनाकर ले आए थे, श्रीभगवान के सम्मुख रख दी।

श्रीभगवान ने मुस्कराकर यमराज की तरफ देखा और बोले, “इतने युगों बाद भी तुममें वही धार बाकी है।”

द्वितीयोध्याय : अग्निदेव

वातावरण किसी हिंदी फ़िल्म में अदालत के सेट जैसा लग रहा था। यमराज ने आकर जज का आसन ग्रहण किया। अग्निदेव को कटघरे में बुलाया गया। होलिका उनके सामने वाले कटघरे में खड़ी थी।

अग्निदेव को गीता की सौगंध दिलवाने के बाद चित्रगुप्त ने प्रश्न पूछना शुरू किया।
“उस दिन जब होलिका ने प्रह्लाद को लेकर अग्नि में प्रवेश किया तो उसके बाद और अग्नि के शांत होने तक क्या हुआ इसकी संपूर्ण जानकारी आप अदालत को दीजिए।”

प्रश्न सुनकर अग्निदेव के मुखपर दर्द की रेखाएँ उभर आईं और वो फ़्लैशबैक में चले गए।

लकड़ियाँ धू धू करके जल रही थीं, ऊँची ऊँची लपटों की तपिश दूर तक महसूस की जा सकती थी। तभी होलिका ने अग्निरोधी कंबल में स्वयं एवं प्रह्लाद को अच्छी तरह लपेटकर उसमें प्रवेश किया। अग्निदेव सोच में पड़े हुए थे कि भगवान का आदेश है अग्निरोधी कंबल और होलिका दोनों भस्म हो जाने चाहिए और प्रह्लाद का बाल भी बाँका नहीं होना चाहिए। मगर ये कंबल तो बड़ा विशिष्ट है इसको भस्म करने के लिए जितना तापमान चाहिए यदि मैं वहाँ तक गया तो प्रह्लाद का बचना भी नामुमकिन हो जाएगा। धर्मसंकट में पड़े अग्निदेव ने लपटें तेज कर दीं और ताप बढ़ना शुरू हो गया। जैसे ही कंबल ने आग पकड़ी अग्निदेव की आँखों के सामने एक विचित्र घटना घटी। अचानक होलिका कंबल से बाहर आ गई और उसने कंबल में लिपटे प्रह्लाद को कस कर अपनी बाहों में भर लिया। कुछ ही क्षणों में होलिका जलकर भस्म हो गई। अग्निदेव की आँखें आश्चर्य से फटी रह गईं। बहरहाल अग्निदेव की चिंता दूर हो गई क्योंकि भगवान का आदेश पूरा हो गया था। होलिका और कंबल जल कर राख हो गए थे और प्रह्लाद का बाल भी बाँका नहीं हुआ था।

अग्निदेव से ये अप्रत्याशित बयान सुनकर चित्रगुप्त के मुँह से ये प्रश्न अपने आप निकल गया, “होलिका ने आखिर ऐसा क्यों किया?”

जवाब में होलिका ने जो कुछ कहा उसका लब्बोलुबाब यह है।
जब होलिका को हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को भस्म करने का आदेश दिया तो उसने इस बात का विरोध किया। उसने कहा कि जिस बच्चे को उसने अपनी गोद में खिलाया है उसे वह भस्म कैसे कर सकती है। उसने हिरण्यकश्यप को मनाने की बहुत कोशिश की पर अंत में हिरण्यकश्यप ने कहा कि अगर होलिका प्रह्लाद को आग से जिंदा बाहर लाई तो वह अपने हाथों से दोनों का सर काट डालेगा। होलिका रात भर सोचती रही अंत में उसे यही उपाय सूझा कि प्रह्लाद को बचाने का एक ही रास्ता है कि वह स्वयं भस्म हो जाय। हो सकता है कि अपनी बहन के भस्म हो जाने पर हिरण्यकश्यप का दिल पिघल जाय और वह प्रह्लाद को मारने का विचार त्याग दे या कम से कम मुल्तवी ही कर दे। इसलिए उसने प्रह्लाद को बचाने के लिए अपनी जान दे दी। पर हाय रे दैव कि आग की ऊँची लपटों में किसी ने भी उसका यह बलिदान नहीं देखा। यह भी होलिका का दुर्भाग्य रहा कि प्रह्लाद की कथा लिखने वाले सब पुरुष थे। उन्होंने एक बार भी ये नहीं सोचा कि होलिका अपने हाथों कैसे अपने नन्हें से भतीजे को भस्म कर सकती है। वो राक्षसी होने के साथ साथ एक स्त्री भी तो है।

होलिका मे मुँह से ऐसा सुनकर सब आश्चर्यचकित रह गए। चित्रगुप्त का मुँह खुला का खुला रह गया। वही हुआ जिसका डर था यानि सदियों से चली आ रही एक कहानी के बदल जाने का डर। अरबों लोगों के सदियों से कायम झूठे विश्वास के टूट जाने का डर। धर्म के सारे के सारे ढाँचे के चरमरा जाने का डर। धर्म ग्रंथों में स्त्री पर लिखी गई हर कहानी पर उँगली उठने का डर। डर बहुत बड़ा था और अनुभवी चित्रगुप्त ने इस डर को यमराज के चेहरे पर फौरन पढ़ लिया। उसने गोली की तरह अग्निदेव पर ये सवाल दागा, ““जब आपने होलिका को कंबल हटाते देखा तो क्या ये नहीं हो सकता कि होलिका प्रह्लाद को बाहर फेंकने जा रही हो मगर तापमान इतना बढ़ चुका था कि कंबल हटाते ही उसकी आँच से होलिका जल मरी और प्रह्लाद श्री भगवान के प्रताप के कारण सुरक्षित रहा।”

अग्निदेव ने कुछ क्षण सोच कर जवाब दिया, “अब होलिका के मन की बात मैं कैसे जान सकता हूँ। आप जो कह रहे हैं वो भी एक विकल्प हो सकता है।”

चित्रगुप्त को मसाला मिल चुका था। उन्होंने तुरंत गियर बदला, “मी लार्ड इस बात को नोट किया जाय कि अग्निदेव ने जो कुछ देखा उससे होलिका निर्विवाद रूप से न तो दोषी साबित होती है न ही निर्दोष। अग्निदेव ने जो कुछ देखा वह सब सच है मगर इनके बयान के बाद भी दोनों विकल्प खुले हुए हैं। मौजूद सबूतों और गवाहों से किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचना नामुमकिन है। अभी इस मामले में और ज्यादा जानकारी की आवश्यकता है। मैं अदालत से ये भी अनुरोध करूँगा कि होलिका का ‘लाई डिटेक्टर टेस्ट’ अवचेतन अवस्था में करने की अनुमति प्रदान की जाय। ऐसे घाघ अपराधी कई बार सामान्य ‘लाई डिटेक्टर टेस्ट’ को भी मात दे देते हैं।”

यमराज ने प्रशंसा भरी निगाहों से चित्रगुप्त को देखा और बोले, “सारे सबूतों और गवाहों के बयान को ध्यान में रखते हुए अदालत इस नतीजे पर पहुँची है कि कोई नतीजा निकाल पाना फिलहाल संभव नहीं है। इसलिए इस मामले को माननीय त्रिदेवों की सर्वोच्च स्तरीय जाँच कमेटी के हवाले किया जाता है। ये कमेटी अग्निदेव के बयान की रोशनी में सामने आए तथ्यों की पुनः जाँच करेगी। अदालत होलिका का ‘लाई डिटेक्टर टेस्ट’ अवचेतन अवस्था में करने की अनुमति प्रदान करती है। मामले की अगली सुनवाई माननीय त्रिदेवों की रिपोर्ट आने के बाद की जाएगी।”

होलिका एक गहरी साँस लेकर रह गई, जब देवों की सामान्य सी जाँच कमेटी ने अपनी रिपोर्ट देने में इतने युग लगा दिए तो माननीय त्रिदेवों की जाँच कमेटी की रिपोर्ट तो शायद कयामत के दिन ही आएगी। पर चलो इस बहाने मैं नर्क में जाने से तो बची रहूँगी। सुना है नर्क का संचालन तालिबानियों के हाथ में सौंप दिया गया है।

तृतीयोध्याय : उपसंहार

शाम को श्री भगवान के दफ़्तर में यमराज और चित्रगुप्त बैठे थे। एक भुना हुआ बादाम मुँह में डालकर चाय का एक घूँट भरते हुए यमराज बोले, “चलिए प्रभो अब आपकी कुर्सी को कोई खतरा नहीं है। चित्रगुप्त जी का इतने युगों की वकालत का अनुभव आखिर काम आ ही गया।”

फिर यमराज ने चित्रगुप्त को संबोधित करते हुए पूछा, “तुम्हें ये विचार आया कैसे कि इस सुलझे हुए मामले को अनंत काल के लिए लटका देना ही एकमात्र विकल्प है।”

चित्रगुप्त के मुखारविंद पर नवोदित अंशुमाली की रक्तिमा छा गई। उन्होंने सर झुकाकर कहा, “प्रभो अब वह समय आ गया है जब हम अपनी इतने युगों की मेहनत से उगाए गए पेड़ का फल खाना शुरू करें। मैं धरती के समाचार पत्र निरंतर पढ़ता रहता हूँ और जिस फैसले से जनता के किसी विशेष वर्ग की भावनाएँ जुड़ी हुई हों उसको अनंत काल तक के लिए लटकाना ही श्रेयस्कर होता है। ये मैंने मानवों से सीखा है।”

चित्रगुप्त के श्रीमुख से ऐसे वचन सुनकर श्री भगवान और यमराज के मुख पर हँसी की एक रेखा दौड़ गई। कुछ क्षण चुप रहकर यमराज बोल उठे, “प्रभो मैंने सरस्वती जी को मामला निबट जाने पर एक सोने का हंस देने का वादा किया था। आप तो जानते ही हैं कि हमारे यहाँ दुर्वासा जी के श्राप के कारण धरती की तरह भ्रष्टाचार हो नहीं सकता। इस महीने मेरा हाथ थोड़ा तंग है। कहीं सरस्वती जी रुष्ट न हो जायँ।”

श्री भगवान बोले, “ठीक है सरस्वती जी के साथ किसी केस में मार्गदर्शन के लिए आप हमारी एक मीटिंग फ़िक्स कीजिए। उसमें उनको बतौर ‘टोकन ऑफ़ एप्रीसियेशन’ एक सोने का मोर दे दिया जाएगा।”

यमराज पुनः बोले, “प्रभो चित्रगुप्त जी इतने सालों से इतनी निष्ठा पूर्वक काम कर रहे हैं मेरे विचार से अब इन्हें वरिष्ठ वकील का पद देने का समय आ गया है।”

“आपने तो मेरे मुँह की बात छीन ली, आप संबंधित नोटशील ले आइए मैं अनुमोदित कर दूँगा।”

यमराज ने तुरंत एक नोटशीट निकालकर श्रीभगवान के सामने रख दी और श्रीभगवान के नाम की तरफ उँगली उठाकर बोले, “प्रभो यहाँ हस्ताक्षर कर दीजिए।”

उधर होलिका को जब यमलोक के कैदखाने की कोठरी की तरफ ले जाया जा रहा था तो एक और लंबित मामले का कैदी, जिससे जनता के वर्ग विशेष की भावनाएँ जुड़ी हुई थीं, मद्दिम सी आवाज में ये गीत गा रहा था।

देख तेरे यमलोक की हालत क्या हो गई इंसान
कितना बदल गया भगवान……….।

समाप्त

Posted अप्रैल 13, 2012 by ‘सज्जन’ धर्मेन्द्र in Uncategorized