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कहानी : बदसूरत   Leave a comment

(१)

मैं जब भी आईना देखती हूँ, मुझे हमेशा दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की नज़र आती है। पता नहीं, वह खूबसूरत लड़की दुनिया को क्यों नहीं दिखाई पड़ती। दुनिया कहती है कि मैं काली हूँ, मोटी हूँ, बदसूरत हूँ। मेरी नाक बहुत बड़ी है, मेरी ठोढ़ी उभरी हुई है, मेरे बाल दोमुँहे हैं, मेरी आँखें छोटी हैं और भी न जाने क्या-क्या कहते हैं लोग मेरे बारे में। मैंने आज तक किसी को यह कहते नहीं सुना कि मेरा कोई भी अंग सही अनुपात में है।
मेरी बड़ी बहन, मेरी माँ और मेरे पिताजी भी यही कहते हैं। अपनी तस्वीरों में भी मुझे दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की नज़र आती है लेकिन दूसरों को वही सबसे बदसूरत लगती है। मैं कभी समझ नहीं पाई कि मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है। मैंने कई बार माँ को आईने में अपना प्रतिबिंब दिखाकर विश्वास दिलाने की कोशिश की, मगर आईने में भी वह खूबसूरत लड़की सिर्फ़ और सिर्फ़ मुझे ही नज़र आती है।
जब से मैंने होश सँभाला उसके बाद से कई वर्षों तक मैं सबसे लड़ती रही। यह साबित करने की कोशिश करती रही कि मैं बदसूरत नहीं हूँ। अंत में मैंने हार मान ली और स्वीकार कर लिया कि मैं दुनिया की सबसे बदसूरत लड़की हूँ। आईने में जो लड़की मुझे नज़र आती है वह कोई देवी है जिसने मेरे शरीर को माध्यम बनाया हुआ है। कहते हैं जिस खाली स्थान को भरने के लिए दिमाग के पास कोई तर्क नहीं होता उसे दिमाग ऊलजुलूल कल्पनाओं द्वारा भर देता है।
पहली बार मेरा चेहरा देखकर मेरे माता-पिता ने यही सोचा होगा कि यह लड़की जिंदगी भर लोगों के घरों में झाड़ू-पोंछा करके या फिर मेहनत-मजदूरी करके अपना जीवन गुजारेगी। मैं अक्सर अनुमान लगाने की कोशिश करती हूँ कि खूबसूरत लड़की के माता-पिता उसके पैदा होने पर क्या सोचते होंगे? यही न कि इसकी शादी या तो खूब कमाने वाले लड़के से होगी या फिर यह फ़िल्मों में नायिका का काम करेगी, नहीं तो कम से कम मॉडल बन ही जाएगी। बाकी बचती हैं सामान्य लड़कियाँ जिनके भविष्य में एक सामान्य जीवन और सामान्य मौत होती है। कैसी विडंबना है कि पुरुष का भविष्य ईश्वर भी नहीं जान सकते लेकिन ज्यादातर लड़कियों का भविष्य उनके पैदा होते ही निश्चित हो जाता है।
मोटी, काली, बदसूरत, भैंस, चुड़ैल, राक्षसी कितने सारे नाम थे मेरे। कभी-कभी मुझे लगता है कि पुरा-कथाओं में जिन्हें चुडैल और राक्षसी बताया जाता है वो सब मेरी ही तरह बदसूरत लड़कियाँ रही होंगी। उन्हें इसलिए जिंदा जला दिया गया होगा ताकि यह बदसूरत डीएनए ही जीवन के वृक्ष से गायब हो जाए। आश्चर्य तो इस बात का है कि यह डीएनए इतना जोर लगाए जाने के बाद भी क्रमिक विकास में जीवन के वृक्ष से गायब नहीं हुआ। इस डीएनए में आखिर ऐसा क्या खास था जो, नष्ट करने के तमाम प्रयासों के बावजूद, इसे अब तक बचाए रहा; मुझे इस कदर बदसूरत बनाने के लिए।
अगर दूसरों ने मुझे बताया न होता तो मुझे कभी पता ही नहीं चलता कि मैं बदसूरत हूँ और इस कदर बदसूरत हूँ। दर’असल आईने से मैं जब-जब पूछती हूँ कि मैं देखने में कैसी लगती हूँ तो वह कहता है कि मैं बहुत खूबसूरत हूँ। कई बार लगता है कि मुझ पर किसी देवी का साया-वाया कुछ नहीं है और यह सब आईने की कारस्तानी है। आईने ने बदसूरत लड़कियों को आत्महत्या करने से बचाने का यह तरीका खोजा है कि वह बदसूरत लड़कियों को उनका चेहरा नहीं बल्कि उनकी आत्मा दिखाता है लेकिन आत्मा इस दुनिया में कौन देखना चाहता है?
जितनी बदसूरत लोग मुझे बताते हैं इतनी बदसूरत न तो मेरी माँ है, न वह आदमी जिसे वह मेरा पिता बताती हैं। यह किसी और का डीएनए है जो मेरी माँ के डीएनए के साथ मिलकर मुझे ऐसा कुरूप बना गया है। लेकिन जब वह इतना ही कुरूप आदमी था तो मेरी माँ ने उसके साथ मिलकर एक नया डीएनए बनाया ही क्यों? आखिर मेरी माँ ने उस आदमी में ऐसा क्या देख लिया?
मैं बड़ी ही न होती तो कितना अच्छा होता। मेरी माँ दिन भर मेरा ख्याल रखती। मेरी बड़ी बहन मुझे अपनी गोदी में लिए रहती। खूबसूरत लोगों के लिए यह दुनिया बहुत खूबसूरत है लेकिन इसमें मेरे जैसी बदसूरत लड़कियों के लिए कोई स्थान नहीं है। मुझ जैसी लड़कियों को पैदा ही नहीं होना चाहिए। अगर पैदा हो भी गईं तो बचपन में ही मर जाना चाहिए और यदि इसके बावजूद भी बड़ी हो जाएँ तो उन्हें महत्वाकांक्षी नहीं होना चाहिए। महत्वाकांक्षा और बदसूरती साथ-साथ जीवित नहीं रह सकतीं। ऐसी लड़कियों के लिए अनपढ़ रहना और दूसरों के घरों में झाड़ू-पोंछा-बर्तन करके जीवन गुजारना ही अच्छा है। लेकिन मुझे यह बताने वाला कोई नहीं था इसलिए मैं सपने देखती गई और उन्हें पूरा करने के लिए मुझसे जो बन पड़ा करती गई।
सुंदरता के रसिया इस संसार में बदसूरती बुरी बनकर ज्यादा दिन जिंदा नहीं रह सकती। बदसूरती को अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए झक मारकर अच्छा बनना पड़ता है। सुंदरता का काम बुरी बनकर भी चल जाता है। सच कहूँ तो मुझे लगता है कि सुंदरता ज्यादातर बुरी ही होती है। मैंने हमेशा अच्छी लड़की बने रहने की कोशिश की मगर हर बार किसी न किसी घटना ने मुझे और बदसूरत बना दिया।
मुझे लगता है कि ज्यादातर खूबसूरत लड़कियों में बुद्धि नहीं होती और जिन थोड़ी-सी खूबसूरत लड़कियों में बुद्धि होती भी है उन्हें कभी उसका इस्तेमाल करने का मौका नहीं मिलता। दुनिया की सारी सुख-सुविधाएँ प्राप्त करने के लिए सुंदरता ही काफी है और जब सब कुछ आसानी से मिल रहा हो तो बुद्धि का इस्तेमाल कौन करता है। कहते हैं कि बुद्धि का इस्तेमाल करने में व्यायाम करने से अधिक ऊर्जा खर्च होती है।
मैं अक्सर सोचती हूँ कि क्या कभी कोई कविता बदसूरती की तारीफ़ में भी लिखी गई है। बदसूरती पर जब-जब लिखा गया है उसका मजाक उड़ाने के लिए ही लिखा गया है। क्या कभी कोई कवि मेरे जैसी लड़कियों पर कविता लिखने की हिम्मत कर सकेगा। नहीं न! क्योंकि कवि को कविता की प्रेरणा सुंदरता से ही मिलती है बदसूरती से नहीं।
क्रमिक विकास में इंसान ने सुंदरता से प्रेम करना और बदसूरती से घृणा करना कब सीखा होगा? जानवर सुंदरता और बदसूरती में अंतर करना नहीं जानते। बदसूरती से घृणा करना बंदर ने मनुष्य बनने के बाद धीरे-धीरे ही सीखा होगा। प्रकृति तो सबसे बराबर प्रेम करती है। सूरज मुझे देखकर अपना मुँह दूसरी तरफ नहीं घुमा लेता। हवा मुझसे दूर नहीं भागती। बारिश मुझे भी उतना ही भिगोती है जितना किसी और को।

(२)
जब मैं तीन साल की थी तो मुझे और बदसूरत बनाने वाली पहली घटना घटी। घर के ठीक बाहर पिताजी बड़े से कड़ाहे में गन्ने का रस गुड़ बनाने के लिए पका रहे थे। बगल में पड़ोस के बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे। गेंदबाज ने अपनी पूरी ताकत से एक बाउंसर फेंकी और बल्लेबाज ने पूरी ताकत से बल्ला घुमा दिया। गेंद जाकर गिरी पकते हुए गुड़ में और गुड़ उछलकर गिरा मेरे ऊपर। मैं बेहोश होकर गिर पड़ी। जब होश आया तो मेरे बदन पर ढेर सारी पट्टियाँ बँधी हुई थीं। कुछ सप्ताह बाद जब पट्टियाँ खोली गईं तो मेरी माँ ने मुझे बताया कि मेरे चेहरे से लेकर घुटनों तक की, शरीर के दाहिनी तरफ वाले हिस्से की, त्वचा काफी जल गई है। मैंने आइने में देखा कि मेरी त्वचा जलने के बाद कैसी लगती है तो उसमें मुझे अपनी त्वचा पहले से भी ज्यादा खूबसूरत लगी। झूठा आईना।
जब मैं पाँच साल की थी तो दूसरी घटना घटी। मेरे माता-पिता मुझे और दीदी को लेकर मेरे छोटे मामा की शादी में जा रहे थे। मुझे ट्रेन की खिड़की के बाहर पीछे की ओर भागते हुए वृक्षों को देखना अच्छा लगता था। मैं खिड़की से बाहर झाँक रही थी तभी अचानक इंजन ने जोर की सीटी दी और ढेर सारा धुआँ छोड़ा। उन दिनों ट्रेन कोयले के इंजन से चलती थी। हम इंजन से ठीक पीछे वाले डिब्बे में बैठे थे। एक अनबुझी चिंगारी मेरी दाहिनी आँख में आकर गिरी। मैं अपनी आँख भींचकर जोर से चिल्लाई। मेरी माँ ने पूछा क्या हुआ। मैंने बताया कि मेरी दाहिनी आँख में कुछ गिर गया है। माँ मेरी पुतलियाँ अपनी उँगलियों से खोलकर उसमें फूँक मारने लगी लेकिन मेरा दर्द कम नहीं हुआ। दर्द कम न होते देख माँ ने पीने का पानी उठाया और मेरी आँख पर पानी के छींटे मारे तब मुझे कुछ आराम मिला।
ट्रेन से उतरने के बाद माँ ने मेरी आँख गाँव के एक डॉक्टर को दिखाई। डॉक्टर ने कुछ दवाएँ खाने को कुछ आँख में डालने के लिए दीं। कुछ दिनों बाद मुझे दर्द और जलन से आराम तो मिल गया लेकिन आँख के सफेद हिस्से में एक काला निशान रह गया। मेरे जिस्म के इस सफेद हिस्से को भी एक काले दाग ने बदसूरत बना दिया।
मेरे गाँव में एक कहावत है कि बचपन में जो तीन बार निश्चित मौत से बच जाता है वो एक दिन कोई बड़ा काम कर गुजरता है। मैं भी एक बार नहीं तीन बार निश्चित मौत से बची हूँ। पहली बार तो मैं मौत से साफ-साफ बच गई। एक दिन जब मैं स्कूल जाने के लिए घर से निकली तो देखा कि एक ट्रैक्टर सीधा मेरी ओर ही चला आ रहा है। मैं डर के मारे जहाँ की तहाँ खड़ी रह गई। जब मेरे और ट्रैक्टर के बीच की दूरी चार या पाँच फ़ुट रह गई तो अचानक ट्रैक्टर मुड़ा और बगल में रखे कूड़े के ढेर पर चढ़कर रुक गया। तब जाकर ट्रैक्टर के पीछे-पीछे आ रहे लोगों ने उसे बंद किया।
दरअसल हुआ यह कि रामआसरे चाचा ने अपना खेत जुतवाने के लिए ट्रैक्टर मँगवाया। ट्रैक्टर वाला चाबी ट्रैक्टर में ही छोड़कर उन्हें बुलाने घर के अंदर गया कि तब तक चाचा का सात साल का लड़का न जाने कहाँ से आकर ड्राइविंग सीट पर बैठ गया। न जाने कैसे उसने ट्रैक्टर स्टार्ट कर लिया। न जाने कैसे उसने गियर लगा लिया। चाचा और ट्रैक्टर ड्राइवर दोनों आवाज सुनकर फौरन पीछे-पीछे भागे। चाचा ट्रैक्टर तक पहुँच भी गए मगर उन्होंने ब्रेक की जगह एक्सीलरेटर दबा दिया। इस तरह ट्रैक्टर भागता हुआ लगभग पाँच सौ मीटर दूर मेरे घर के सामने तक आया। मैं न जाने कैसे बच गई इस निश्चित मौत से।
दूसरी बार मैं स्कूल से वापस आ रही थी। अचानक चारकोल से भरे हुए दो ड्रम आकर गिरे। एक मेरी दायीं ओर दूसरा बायीं ओर। मैं अवाक खड़ी रह गई। तभी कड़ई काका दौड़कर कर आए और मुझे उठाकर अपने घर ले गये। मुझे कुछ समझ में नहीं आया कि आखिर हुआ क्या। लोगों ने जो बताया उसके अनुसार मेरे पीछे-पीछे एक घोड़ागाड़ी वाला आ रहा था। उसने चारकोल से भरे हुए चार ड्रम लाद रखे थे। दो इधर, दो उधर ताकि घोड़ागाड़ी का संतुलन बना रहे। अचानक उसका एक पहिया सड़क से नीचे उतरा। जहाँ उतरा वहाँ सड़क के बगल में काफी बड़ा गड्ढा था। पहिया गड्ढे में गया और घोड़ागाड़ी को जोरदार झटका लगा। जिस रस्सी से तारकोल के ड्रम बँधे हुये थे वो टूट गई और ऊपर वाला ड्रम मेरे सर के ऊपर से गुजरते हुये बायीं तरफ आकर गिरा और नीचे वाला ड्रम दायीं तरफ। मैं एक फुट इधर-उधर और होती तो चारकोल से भरे ड्रमों के नीचे पिस जाती। एक बार फिर मौत आते-आते रह गई। बस दाहिनी तरफ गिरे ड्रम ने लुढ़ककर मेरे पैर पर कुछ खरोंचें बना दीं।
तीसरी बार मैं शाम को बाजार से सामान लेकर वापस लौट रही थी। सूरज धीरे-धीरे छिप रहा था और अँधेरा धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा था। अमावास की रात थी इसलिए अँधेरा होने से पहले घर पहुँचने के चक्कर मे मैंने ठाकुरों के बगीचे से होकर जाने वाला छोटा रास्ता पकड़ लिया। ये रास्ता लोग कम ही इस्तेमाल करते थे क्योंकि ठाकुर नहीं चाहते थे कि उनके बगीचे से होकर जाने वाला यह पतला-सा रास्ता एक आम रास्ता बन जाय। गाँव में सभी मानते थे कि इस बगीचे में चुडैल रहती है जो रात बारह बजे के बाद बगीचे में घूमा करती है। लेकिन अभी तो सात भी नहीं बजे थे और इस वक्त तक इक्का-दुक्का लोग उस रास्ते से आते-जाते रहते थे। फिर भी डर के मारे मैं दौड़ने लगी। अचानक मेरा पैर पत्तों के ढेर पर पड़ा और मुझे लगा जैसे चुडैल ने मुझे पकड़ लिया है और मैं उसके द्वारा लगाई गई नर्क की आग में जल रही हूँ। इसके बाद मैं होश खो बैठी।
बाद में मुझे पता चला कि उस बगीचे में सूखे पत्तों को जलाने के लिए एक गड्ढा खोदा गया था। वो गड्ढा इतना गहरा था कि मेरे जैसी बच्ची उसमें गिर जाए तो खुद से बाहर न निकल सके। उस गड्ढे में रोज बगीचे में गिरे सूखे पत्ते इकट्ठा करके आग लगा दी जाती थी ताकि बगीचा भी साफ रहे और आग को फैलने से रोका जा सके। कुछ दिनों बाद आस-पास रहने वाले लोग कूड़ा करकट भी उसी गड्ढे में डालने लगे। उस गड्ढे में एक बार लगी आग कई-कई दिन तक सुलगती रहती थी। रोज शाम को पत्ते इकट्ठा करके उस गड्ढे को भर दिया जाता था। उस दिन मैं उस गड्ढे में गिर गई और अगर जयलाल चाचा उधर से न गुजर रहे होते और उन्होंने मुझे गड्ढे में गिरते हुए न देखा होता तो मैं जल कर मर गई होती। एक बार फिर मैं निश्चित मौत से बच गई मगर मेरे हाथ और पैर काफी जल गये।
कहते हैं हर वह चोट जो आपकी जान नहीं लेती आपको और मजबूत बना देती है। पर मुझे लगता है हर वह चोट जो आपकी जान नहीं लेती आपको और बदसूरत बना देती है।

(३)
ब्रह्मा ने राक्षस बनाए, देव बनाए, न जाने क्या-क्या बनाया मगर कभी इतना बदसूरत इंसान बनाया हो ऐसी कोई कहानी मैंने नहीं सुनी। तो आखिर उसके बनाए इंसान के वंशजों में यह बदसूरती आई कहाँ से। दर’असल सारी बदसूरत लड़कियाँ एक अभिशप्त अप्सरा की वंशज हैं। बहुत समय पहले की बात है, एक जंगल में एक ऋषि घोर तपस्या कर रहे थे। वो इंद्र को प्रसन्न करने के लिए तप कर रहे थे। इंद्र मन ही मन बड़े खुश थे कि त्रिदेवों को प्रसन्न करने के बजाय कोई मुझे प्रसन्न करने के लिए तप कर रहा है। वह तुरंत प्रकट होना चाहते थे लेकिन दूसरे देवताओं पर रोब जमाने के लिए भाव खा रहे थे। अपने जीवन में कितने सारे काम न चाहते हुए भी हमें केवल दूसरों पर रोब जमाने के लिए करने पड़ते हैं।
एक दिन इंद्र के सब्र का बाँध टूट गया। वह प्रकट हुए और बोले, ‘ऋषिवर वर माँगिए।’ ऋषि बोले, ‘मैंने तो सुना था कि आप तपस्या भंग करने के लिए पहले अग्नि, पवन इत्यादि देवताओं को भेजते हैं। फिर अप्सराओं के साथ कामदेव को भेजते हैं। पर आप तो स्वयं आ गए।’
अब इंद्र कैसे कहते कि कभी-कभी तो कोई मेरे नाम की तपस्या करता है। अगर मैं ऐसे लोगों की भी परीक्षा लेने लग जाऊँ तो मेरा कोई भक्त धरती पर बचेगा ही नहीं। लेकिन वो बोले, ‘मुनिवर आपकी भक्ति में मुझे कोई संदेह नहीं है। मैं जानता हूँ कि आप मोक्ष प्राप्ति के लिए तप कर रहे हैं। आप वर माँगिए।’
ऋषि बोले, ‘इंद्रदेव मैं मोक्ष प्राप्ति के लिए नहीं, अमुक अप्सरा को पाने के लिए तप कर रहा था। अगर आप प्रसन्न हैं तो अमुक अप्सरा का विवाह मेरे साथ करा दें।’
इंद्र के पास इतनी अप्सराएँ थीं कि उनके नाम भी उन्हें नहीं याद रहते थे। मगर एक भी अप्सरा कोई और माँग ले तो उनका जी जल जाता था। अंदर ही अंदर आगबबूला होते हुए वो बोले, ‘अमुक अप्सरा आप को नहीं मिल सकती ऋषिवर, कोई और वर माँगना हो तो माँगिए।’
ऋषि बोले, ‘नहीं इंद्रदेव मुझे तो अमुक अप्सरा ही चाहिए।’
अब तो इंद्र का क्रोध सातवें आसमान पर जा पहुँचा। उन्होंने सोचा इस तुच्छ ऋषि की ये मजाल। रहता झोपड़ी में है और शादी करना चाहता है अप्सरा से। क्या इसे नहीं पता कि अप्सराओं के सर्वाधिकार देवताओं के पास सुरक्षित हैं तथा उनका किसी भी रूप में पूर्ण एवं आंशिक प्रयोग किसी और के द्वारा किया जाना वर्जित है। इस तरह से अगर हम सबको अप्सराएँ बाँटते रहे तो हमारे लिए क्या बचेगा। हमें अप्सराओं की जगह अपनी पत्नियों का नृत्य देखना पड़ेगा। कुछ ऐसा उपाय करना होगा कि यह ऋषि किसी और देवता को प्रसन्न करके यही वर न माँग सके। भूतकाल में त्रिदेवों ने ऐसे-ऐसे वर दिए हैं कि अब मुझे उन पर भरोसा नहीं रहा।
थोड़ी देर सोचने के पश्चात इंद्र बोले, ‘हे तुच्छ ऋषि! तूने स्वर्ग की अप्सराओं पर कुदृष्टि डाली तुझे इसका दंड मिलेगा। जा आज के बाद तू कितनी भी तपस्या कर ले कोई भी देवता तुझ पर कभी प्रसन्न नहीं होगा।’
अब ऋषि की समझ में आया कि जिस देवता की वह तपस्या कर रहे थे वह इंसानों से भी ज्यादा स्वार्थी है। ऋषि भी गुस्से से तिलमिला उठे। शाप देने की शक्ति उनके पास भी थी। उन्होंने भी इंद्र को शाप दिया, ‘हे इंद्र तूने तुच्छ अप्सराओं के लिए मेरा अपमान किया है। ऐसी अप्सराएँ जिनमें खूबसूरती के अलावा और कुछ भी नहीं है। जो अपनी कमर हिलाकर देवों का मनोरंजन करने के अलावा और कुछ नहीं कर सकतीं। आज के बाद ये अप्सराएँ स्वर्ग से निकलकर मृत्यु आने तक धरती पर निवास करेंगी। स्वर्ग में आज के बाद कोई अप्सरा नहीं रह सकेगी। यदि किसी अप्सरा को जबरदस्ती स्वर्ग ले जाया गया तो वह जलकर भस्म हो जाएगी।’
इतना कहकर ऋषि चुप हो गए। थोड़ी देर तक चुप रहे। फिर उन्हें लगा कि अभी कसर बाकी है। वो फिर बोले, ‘और हाँ, अप्सराओं के जिस नृत्य पर तुम देवताओं का एकाधिकार था वह नृत्य अब सारा संसार देखेगा। अब से ये अप्सराएँ और इनकी वंशज धरती के सामान्य जन का मनोरंजन किया करेंगी। ये सब तब तक चलता रहेगा जब तक ये अप्सराएँ अपनी खूबसूरती के साथ-साथ अपने दिमाग का इस्तेमाल करना शुरू नहीं करतीं। जिस अप्सरा के कारण तुमने मेरा अपमान किया है वह आज से दुनिया की सबसे बदसूरत स्त्री हो जाएगी और उसके वंशज भी बदसूरत होंगे। उसका वंश मिटाने के लिए किया गया तुम्हारा हर प्रयास विफल साबित होगा और सृष्टि के अंत तक उसका वंश बचा रहेगा।’
बेचारी अप्सराओं को ब्रह्मा ने केवल खूबसूरत शरीर ही दिया था। दिमाग के नाम पर वो शून्य थीं। न तो इंद्र से, न ही मुनि से वे यह प्रश्न पूछ सकीं कि आप दोनों के इस झगड़े की सजा हमें क्यों मिल रही है? उन्होंने इस शाप को अपना दुर्भाग्य समझकर स्वीकार कर लिया। उस दिन के बाद से इन अप्सराओं ने धरती पर अपने खूबसूरत जिस्म के दम पर धन, वैभव और शक्ति इकट्ठा करना शुरू कर दिया। शाप के कारण बदसूरत बनी अमुक अप्सरा ऋषि के पास गई और उनसे अपनी खूबसूरती वापस देने की प्रार्थना करने लगी। ऋषि बोले, ‘मैं अपना शाप तो वापस नहीं ले सकता मगर इसका प्रभाव कम कर सकता हूँ, अगर तुम मुझसे विवाह करने को तैयार हो जाओ, तो।’
अप्सरा के हाँ कहने पर मुनि ने कहा, ‘तुम सूरज ढलने के बाद अपनी खूबसूरती वापस पा लोगी किंतु सूरज उगते ही फिर से बदसूरत हो जाओगी।’
अप्सरा बोली, ‘और मेरे वंशज जिन्हें आपने बदसूरत होने का शाप दिया है। उनका क्या?’
मुनि बोले, ‘मेरे और तुम्हारे वंशज बदसूरत भले ही हों लेकिन उनकी बुद्धि उत्तरोत्तर तीव्र होती जाएगी। सृष्टि के विकास क्रम में एक वक्त ऐसा भी आएगा जब मस्तिष्कविहीन सुंदरता लोगों के दिल को बहलाने वाला खिलौना मात्र बनकर रह जाएगी। अंततः इस दुनिया पर तीव्र बुद्धि वाले लोग ही शासन करेंगे।’
आप मुझे देवताओं का मजाक उड़ाने और धार्मिक कथाओं को विकृत करने के लिए कोस सकते हैं। पर यकीन कीजिए आज तक न जाने कितनों ने, न जाने कितनी बातों पर, न जाने कितनी बार मुझे कोसा है लेकिन उनके कोसने से मेरा कभी कुछ नहीं बिगड़ा। न ही ये देवता मेरा कुछ बिगाड़ सकते हैं जिनका मैं मजाक उड़ा रही हूँ। मेरे पापों का दंड ईश्वर ने मुझे बदसूरत बनाकर बचपन में ही दे दिया था। तब तो मैं जानती भी नहीं थी कि पाप किसे कहते हैं।

(४)
प्राइमरी स्कूल में मैं सबसे पीछे बैठती थी। मेरे साथ किसी के बैठने का तो सवाल ही नहीं उठता था। यहाँ तक कि कक्षा का सबसे भोंदू बच्चा जो शायद हाथी और इंसान के डीएनए के मिलन का परिणाम था वो भी मेरे साथ नहीं बैठता था। मैं अपना होमवर्क रोज पूरा करके जाती थी। अध्यापक द्वारा दिए गए पाठ नियम से याद करती थी। फिर भी न तो मुझे विद्यालय में कोई शाबासी मिलती थी न ही घर में। शायद सबने यह सोच लिया था कि अंततः मुझे झाड़ू-पोंछा करके ही अपनी जिंदगी गुजारनी पड़ेगी।
मैं मेधावी छात्रा नहीं थी लेकिन मुझे पढ़ना अच्छा लगता था। शायद समय काटने का मेरे पास यही एकमात्र तरीका भी था। कहानियाँ पढ़ने के लिए मैं कुछ भी कर सकती थी। पड़ोस में रहने वाले मनोज भैया से माँग-माँग कर मैंने तोता-मैना, अकबर-बीरबल, विक्रम-बेताल, सिंहासन बत्तीसी और पंचतंत्र की कहानियाँ न जाने कितनी बार पढ़ीं। न जाने कितनी बार मैं उन कहानियों की नायिका बनी। न जाने कितनी बार मेरी मृत्यु हुई। न जाने कितनी बार मेरा जन्म हुआ। फिर एक दिन मैं सोकर उठी तो वो सारी कहानियाँ भूल गई।
फिर मुझे कॉमिक्स पढ़ने का चस्का लगा। ये चस्का पहले मनोज भैया को लगा था फिर मुझे भी लग गया। वो कॉमिक्स ले आते और पढ़ने के बाद मुझे दे देते। चाचा चौधरी, ताऊजी, बिल्लू, पिंकी, राजन इकबाल, लम्बू-मोटू, क्रुकबांड, नागराज, सुपर कमांडो ध्रुव, परमाणु, डैडी जी और न जाने कितने सारे सुपर हीरो मेरे दोस्त बन गए। मैंने उनके साथ बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ लड़ीं। राका जैसे अमर खलनायक को हराया। बौना वामन जैसे खलनायक को भागने पर मजबूर किया। ब्रह्मांड के कोने-कोने से खलनायक आए और मुझसे हारकर वापस चले गए। नायक तो बहुत सारे थे पर मुझे प्रेम हुआ सुपर कमांडो ध्रुव से। क्यों? कारण था उसका विलक्षण दिमाग। वो अपने दिमाग के दम पर देवताओं को भी मात दे देता था। मैं सुपर कमांडो ध्रुव की नीली-पीली पोशाक में खो जाती थी। कई बार मैं मनोज भैया को बताए बिना उनके कमरे से कॉमिक्स उठा लाती थी। एक दिन इसके लिए मुझे मनोज भैया ने खूब डाँटा। पर मुझे इस बात की परवाह कहाँ थी। मैंने फिर ऐसा किया। मुझे फिर डाँट पड़ी। मैंने फिर ऐसा किया। मुझे फिर डाँट पड़ी। थककर उन्होंने मुझे डाँटना बंद कर दिया और अपनी कॉमिक्स छुपा कर रखने लगे। मैं उनके कमरे से कॉमिक्स खोजने के नए-नए तरीके ईजाद करने लगी।
इन सबके बीच न जाने कब मैं प्राइमरी स्कूल से निकलकर इंटर कालेज में पढ़ने लगी। जो मुझसे मिलता यही पूछता कि इस बार उत्तीर्ण हो जाओगी क्या? और मैं मन ही मन बहुत हँसती। मैं बायें हाथ से भी लिख दूँ तो भी उत्तीर्ण हो जाऊँ, ये लोग मुझे समझते क्या हैं? उत्तीर्ण चेहरे से नहीं दिमाग से हुआ जाता है। ऐसे सवालों पर बाहर से चुप्पी साधकर किंतु अंदर से हँसते हुए मैं उत्तीर्ण होते-होते एक दिन आठवीं कक्षा में पहुँच गई।
यूँ ही एक दिन मैं कॉमिक्स लेने मनोज भैया के घर गई। उनकी किताबों के बीच ढूँढते-ढूँढते मुझे एक फटा हुआ उपन्यास मिला। उपन्यास का कवर गायब था। शुरू और आखिरी के कुछ पन्ने भी नहीं थे। मैंने उसके कुछ पन्ने पढ़े तो स्त्री और पुरुष के प्रेम संबंधों से मेरा पहला परिचय हुआ। मैंने उस फटे उपन्यास को कपड़ों के भीतर छुपा लिया और चुपके से घर आ गई। मैंने उस पर अखबार चढ़ा दिया और अपने स्कूल बैग में रख दिया ताकि कोई देखे तो यही समझे कि कोर्स की किताब है। उपन्यास की शुरुआत और अंत वाले पन्ने फटे हुए थे लेकिन जितना हिस्सा था उसे मैंने कई बार पढ़ा। वो उपन्यास मेरे लिए एक ऐसी प्रेम कहानी था जिसकी न कोई शुरुआत थी न कोई अंत। नायक-नायिका उपन्यास के पहले पन्ने पर ही एक दूसरे से प्रेम करने लगे थे और आखिरी पन्ने तक उनका प्रेम कायम था। कुछ दिनों बाद मैं सोचने लगी कि काश मेरी प्रेम कहानी भी ऐसी ही हो जिसमें शुरू और आखिरी का हिस्सा ही न हो। मैं जिस क्षण उसे देखूँ उसी क्षण से वह मुझसे प्रेम करने लगे और जिस क्षण वह मुझसे बोर होने लगे उसी क्षण जीवन की किताब के बाकी पन्ने फटकर खो जाएँ। मैंने वह उपन्यास इतनी बार पढ़ा कि एक दिन मैं उससे बोर होने लगी। उसी दिन मैं उसे ले जाकर स्कूल के पीछे फेंक आई। अब मुझे उपन्यास भी अच्छे लगने लगे थे। यह बात मुझे बहुत बाद में पता चली कि इस तरह के उपन्यास को पल्प-फ़िक्शन कहते हैं। असली उपन्यास वो होते हैं जिन्हें साहित्यिक उपन्यास कहा जाता है और जिन्हें पढ़ने की हिम्मत जुटाने के लिए ज्ञान के एक न्यूनतम स्तर की आवश्यकता पड़ती है।

(५)
मनोज भैया के दोस्त थे अमन। दोनों एक ही कक्षा में पढ़ते थे। अमन बहुत बुद्धिमान थे और बुद्धिमान लड़के मेरी कमजोरी थे। यह बात मुझे बहुत बाद में पता चली कि बुद्धिमान लड़कों के प्रति आकर्षण अनुवांशिक होता है। मुझे यह आकर्षण मेरी माँ से मिला था। वह भी एक बुद्धिमान लड़के की बुद्धि पर मर मिटी थी। इस कदर मर मिटी थी कि जब तक सचमुच नहीं मर गईं उस लड़के की खातिर मर-मर कर जीती रही।
बुद्धिमान लड़कों की एक खासियत होती है। वो प्रेम दिल से नहीं दिमाग से करते हैं। बुद्धिमान लड़कों की दूसरी खासियत होती है कि वे जमीन से आसमान तक का फासला बहुत जल्द तय कर लेते हैं क्योंकि उन्हें लोगों को और खासकर लड़कियों को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करना आता है। बुद्धिमान लड़कों की तीसरी खासियत भी होती है। उनके पास पैसा बहुत जल्द और बहुत सारा आता है और वे प्यार के बदले में पैसा देकर समझते हैं कि उन्होंने प्यार की कीमत चुका दी। मेरे पिता को कभी पता नहीं चला कि मेरी माँ उनकी धेले भर की दिहाड़ी में से घर चलाने के अलावा हम दो बहनों और छोटे भाई की पढ़ाई-लिखाई का खर्चा कैसे निकाल पाती है। उनके पास न इतना दिमाग था न इतनी फ़ुर्सत कि वो ऐसी बातें सोच पाते। मेरे मामा शहर में मजदूरी करते थे। माँ को जब भी पैसे की जरूरत पड़ती वो पैसेंजर ट्रेन पकड़कर बिना टिकट शहर चली जाती। मामा के यहाँ ठहरती और मेरे बुद्धिमान लेकिन बदसूरत बाप से मिलकर पैसा ले आतीं। यह बात मुझे बाद में पता चली कि मेरा बाप किसी बड़ी राजनीतिक पार्टी का बड़ा कार्यकर्ता बन गया था और उन दिनों अपनी खुद की अलग पार्टी बनाने की तैयारी कर रहा था।
अमन अक्सर मनोज भैया के घर आया करते थे। मुझे उनसे बातें करना अच्छा लगता था। मैं जानती थी कि उन्हें मुझसे बातें करना अच्छा नहीं लगता लेकिन मुझसे बातें करना तो किसी को भी अच्छा नहीं लगता था। मैं ऊल-जलूल सवाल पूछ लेती थी। मैं चुभने वाली बातें कह देती थी। फिर भी जैसे ही मैं अमन की आवाज सुनती सब कुछ छोड़-छाड़कर मनोज भैया के घर आ जाती। मुझे ऐसी सुंदरता मिल गई होती जिसे दुनिया देख सके तो मैं भी अमन की अच्छी पत्नी बनकर घर सँभाल रही होती। तो मुझमें इतनी कटुता न होती। तो मैं ऊल-जलूल सवाल भी न पूछती और चुभने वाली बातें भी न कहती।
मनोज भैया और अमन की क्लास में ही मेरी दीदी भी पढ़ती थी। शुरू-शुरू में तो सब ठीक चल रहा था। मैं अक्सर अमन के साथ वाद-विवाद करती रहती थी। घर में अकेले बैठकर मैं अक्सर अमन के बारे में ही सोचा करती थी। अमन ने सुपर कमांडो ध्रुव को मेरे दिमाग से निकाल दिया था और उसकी जगह खुद आ गए थे। फिर एक दिन धरती पर सिर्फ़ मैं और अमन ही रह गए। एक घर था जिसमें जरूरत पड़ने पर हर चीज इच्छा करते ही प्रकट हो जाती थी। उसमें मैं और अमन रहते थे। मैं चाय बनाकर लाती थी और अमन उसे पीकर कहते थे कि यह दुनिया की सबसे अच्छी चाय है। हम दोनों घंटों एक दूसरे की आँखों में आँखें डाले बातें किया करते थे। हमें डिस्टर्ब करने वाला दुनिया में कोई नहीं था। फिर अचानक सौरमंडल से सूरज ही गायब हो गया और हर तरफ़ अँधेरा ही अँधेरा छा गया। मैं टटोल-टटोल कर अमन को ढूँढने लगी पर कहीं कुछ भी नहीं था। तभी दीदी ने मुझे झिंझोड़कर जगा दिया और पूछने लगी कि मैं क्या बड़बड़ा रही थी। मैं उसे क्या बताती।
एक दिन अमन ने मुझे अपने क्लास नोट्स दिए और बोले कि तुम्हारी दीदी ने मँगाए थे दे देना। फिर उसके बाद अक्सर दीदी अमन से क्लास नोट्स मँगाने लगी। एक दिन मुझे शक हुआ। दूसरे दिन मैंने दीदी को देने से पहले क्लास नोट्स खुद पढ़े। वो क्लास नोट्स ही थे लेकिन उनके बीच में एक कागज था। मैंने उसे पढ़ा। वह वैसा कागज था जैसा मैं चाहती थी कि अमन मुझे दे। मुझे बहुत गुस्सा आया। मैंने वह कागज ले जाकर माँ को दे दिया। माँ ने पिताजी को दे दिया। पिताजी दीदी के लिए लड़का ढूँढने निकल पड़े। जल्दी ही उन्हें एक लड़का मिल गया। दीदी की शादी तय हो गई। दीदी की शादी में सबसे ज्यादा खुश मैं थी। दीदी नहीं रहेगी तो शायद अमन वैसा कागज मुझे देने के बारे में सोचेगा। दीदी अपने ससुराल चली गई। अमन ने मनोज भैया के घर आना बंद कर दिया। मैं रोने लगी। मेरे आँसुओं से समुद्र का पानी खारा हो गया। गाँधीजी ने मेरे आँसुओं से नमक बनाकर कानून तोड़ा। टाटा मेरे आँसुओं को पैकेट में भर-भर कर बेचने लगा। एक दिन मेरे आँसू सूख गए। मैं समझ गई कि अमन मेरे लिए नहीं मेरी दीदी से मिलने के लिए मनोज भैया के घर आता था। मैं उसके लिए सीढ़ी थी और दीदी आसमान।
मैं अमन को आधा जमीन में गाड़कर और आधे भाग पर गुड़ लगा कर उसपर कुत्ते छोड़ देना चाहती थी। मैं उसके दिमाग के छोटे-छोटे टुकड़े करके नाले में बहा देना चाहती थी। मैं उसे उल्टा लटकाकर कोड़े मारना चाहती थी। मैं उसे गधे से बाँधकर घसीटते हुए पूरे गाँव में घुमाना चाहती थी। मैं उसे जिंदा जलाकर उसकी राख पेशाबघर में बिखेरना चाहती थी। मैं उसे मरते दम तक टूटे हुए काँच पर दौड़ाना चाहती थी। मैं न जाने क्या-क्या करना चाहती थी पर मैं कुछ नहीं कर सकी।
फिर एक दिन मैं सोकर उठी और अमन को भूल गई। मनोज भैया उपन्यास लाते थे और पढ़कर मुझे दे दिया करते थे। शायद वे भी समझने लगे थे कि मैं अब उपन्यास पढ़ने लायक बड़ी हो गई हूँ।

(६)
उत्तर प्रदेश, बिहार और आस-पास के इलाकों में गरीब आदमी अपनी बेटी की शादी इसलिए जल्दी करता है ताकि उसे दहेज कम से कम देना पड़े। जब लड़की दसवीं या बारहवीं में पढ़ रही हो अथवा सत्रह-अठारह साल की हो तभी शादी कर देने से दहेज कम देना पड़ता है क्योंकि तब दहेज लड़के के बाप की हैसियत देखकर दिया जाता है। एक बार यदि लड़का नौकरी करने लग गया तो गरीब से गरीब बाप भी मुँह फाड़कर दहेज माँगता है। कम उम्र में विवाह दरअसल एक जुआ है। यदि लड़का लायक निकल जाता है तो लड़की की जिंदगी सँवर जाती है और यदि नालायक निकल गया तो लड़की का बाप मानता है कि मेरी लड़की का भाग्य ही खराब था। जिनके पास दहेज देने लायक पैसा होता है वे तब तक इंतजार करते हैं जब तक नाते-रिश्तेदार यह न कहने लगें कि बेटी को जिंदगी भर घर में ही बिठाए रखने का इरादा है क्या? कुछ लोग यह भी कहते हैं कि जवान लड़की को घर में बिठा रक्खा है कल को कहीं कुछ ऐसा-वैसा हो गया तो। अगर बेटी पढ़ने-लिखने में अच्छी हो तो नाते-रिश्तेदारों के मुँह कम से कम उसकी पढ़ाई पूरी होने तक बंद रहते हैं। उसकी नौकरी लगने तक भी तानों की तीव्रता सहन करने लायक होती है। कई बार मैं सोचती हूँ कि ये ताने मारने वाले लोग अपने काम से काम क्यों नहीं रखते। दरअसल ये लोग चाहते हैं कि जैसे इनकी लड़कियाँ गाय की तरह खूँटे से बाँध दी गई हैं और अब चारा खाकर, बछड़े जनकर तथा दूध देकर अपना जीवन गुजारेंगी वैसे ही दूसरों की लड़कियाँ भी खूँटे से बाँध दी जाएँ। इससे पहले कि लड़कियाँ नारी मुक्ति और पितृसत्तात्मक व्यवस्था जैसे फ़ैंसी शब्द जानें इन्हें किसी खूँटे से बाँधकर फटाफट इनका गर्भाधान कर दिया जाए।
दीदी की शादी के बाद मेरे पिता ने मेरे लिए भी एक लड़का तलाश किया। वो बारहवीं में पढ़ता था और मैं दसवीं में थी। मैं यह नहीं कहूँगी कि मैं शादी नहीं करना चाहती थी या मुझे लड़कों से किसी किस्म की घृणा थी। ऐसा भी नहीं था कि मेरे पिता जबरन मेरी शादी कराना चाहते थे। नारी मुक्ति और नारी के अधिकार किस चिड़िया का नाम है मुझे पता भी नहीं था। पितृसत्तात्मक व्यवस्था जैसे शब्दों का तो मैंने नाम भी नहीं सुना था। एक दिन लड़के वाले मुझे देखने आए। दीदी भी ससुराल से आई हुई थी। दीदी ने मुझे कम सजाया और खुद ज्यादा सज गईं। मैं समझ नहीं पाई कि उन्हें खुद को और ज्यादा खूबसूरत दिखाने की क्या जरूरत है उनकी तो शादी पहले ही हो चुकी है। एक कमरे में मैं और दीदी जाकर बैठे। वह लड़का अपने और मेरे माँ-बाप के साथ अंदर आया। पहले उसकी नज़र दीदी पर पड़ी। उसके चेहरे पर मुस्कान आई। फिर उसकी नज़र मुझ पर पड़ी। उसने अपना मुँह दीदी की तरफ घुमा लिया। मेरी समझ में नहीं आया कि यह लड़का मुझे देखने आया है या दीदी को। फिर मेरे पिता ने मेरी तरफ इशारा करके कहा यह है मेरी छोटी लड़की। एक सच यह भी था कि दीदी देखने में मुझसे छोटी लगती थी। उस लड़के का मुँह दुबारा मेरी तरफ घूमा। अचानक वह कमरे से निकला और अपने बाप को धकियाते हुआ बाहर निकल गया। मुझे उस लड़के पर बहुत गुस्सा आया। मुझे दीदी पर भी बहुत गुस्सा आया। उस दिन मुझे एक कड़वे सच का पता चला। जब लड़के वाले लड़की देखने आएँ तो लड़की के साथ कभी उससे सुंदर लड़की नहीं रहनी चाहिए। जैसे किसी छोटी रेखा के बगल में एक बड़ी रेखा खींच देने पर छोटी रेखा और छोटी लगने लग जाती है उसी तरह बदसूरती, सुंदरता के बगल खड़ी होकर और बदसूरत लगने लगती है। बाद में पता चला कि वह लड़का घर छोड़कर शहर भाग गया है, इस डर से कि कहीं उसके माँ-बाप जबरन उसकी शादी मुझसे न करा दें।
मेरे पिताजी ने एक और लड़का तलाश किया। इस बार दीदी को मायके से नहीं बुलाया गया। लड़के वाले मुझे देखने आए। वह लड़का और उसके माता-पिता घर के आँगन में पड़ी चारपाई पर बैठे हुए थे। मैं जितना सज-सँवर सकती थी उतनी सज-सँवरकर उनके सामने गई। मेरी निगाह जैसे ही लड़के पर गई मेरे मुँह से बेसाख्ता हँसी निकल पड़ी। न जाने कितनी देर तक मैं हँसती रही। मेरे हँसते-हँसते सूरज मेरे सिर के ऊपर से भागकर दूर कहीं पहाड़ों के पीछे जाकर छिप गया। सूरज फिर से निकला तो मेरे देखते ही देखते वह पहाड़ ऊँट में बदल गया। जब सूरज चढ़ता हुआ फिर से मेरे सिर के ऊपर आया तो वह ऊँट आदमी में बदलने लगा। अचानक जो जादूगर दृश्य बदल रहा था उसे दिल का दौरा पड़ा और वह चल बसा। अब मेरे सामने जो था वह आधा लड़का था आधा उँट। उसका चेहरा आधा आदमी का था आधा उँट का। उसकी पीठ आधी आदमी की थी आधी उँट की। वह बैठा हुआ था जैसे ऊँट बैठता है मगर मेरी तरफ देख रहा था जैसे आदमी देखता है। मैं हँसते-हँसते घर के भीतर भाग गई। जब मेरे पिता ने लड़के वालों का अपमान करने के लिए मेरे बालों को पकड़कर मुझे आँगन में घसीटा मैं तब भी हँसे जा रही थी। जब मेरी माँ ने मुझे गालियाँ दीं मैं तब भी हँस रही थी। मैं न जाने कब तक हँसती रही। मै हँसते-हँसते बेहोश हो गई। जब होश आया तो दो साल गुजर चुके थे और मैं बारहवीं कक्षा में पढ़ रही थी। तब तक आस-पास के गाँवों में यह बात फैल चुकी थी कि मेरी दिमागी हालत ठीक नहीं है और मुझ पर भूत-प्रेत का साया है।
इस घटना से मुझे दो फायदे हुए। एक तो मेरे पिताजी ने मान लिया कि मेरा घर कभी नहीं बस सकता और दूसरे मेरी माँ समझ गई कि इस लड़की को कुछ भी समझाना-बुझाना बेकार है। अब तो सब ऊपर वाले के और इस लड़की के बदसूरत भाग्य के भरोसे है।

(७)
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के केंद्रीय पुस्तकालय में घुसते ही मैं किताबों के महासागर में पहुँच गई। रंग-बिरंगी किताबें, छोटी-बड़ी किताबें, नई-पुरानी किताबें, धर्म और दर्शन की किताबें, कहानी और कविता की किताबें, उपन्यास और महाकाव्य, विज्ञान और इंजीनियरिंग की किताबें, चारों तरफ किताबें ही किताबें। मैं सारी किताबें पढ़ना चाहती थी मगर इसके लिए मुझे हजारों जन्म लेने पड़ते। वह मेरी जिंदगी का सबसे खूबसूरत समय था। मैं एक किताब से ब्रश करती थी। दूसरी किताब से नहाती थी। तीसरी किताब सामने रखकर कपड़े बदलती थी। चौथी किताब का नाश्ता करती थी। पाँचवी किताब पर चढ़कर क्लास में जाती थी। छठीं किताब पर बैठती थी। सातवीं किताब क्लास में पढ़ती थी। आठवीं किताब का लंच करती थी। नौवीं किताब लाइब्रेरी में पढ़ती थी। दसवीं किताब पर चढ़कर छात्रावास लौटती थी। ग्यारहवीं किताब का डिनर करती थी और बारहवीं किताब तकिए के नीचे रखकर सो जाती थी।
मेरी ही क्लास में एक और बदसूरत लड़की थी जो मेरे जितनी बदसूरत तो नहीं थी लेकिन इतनी बदसूरत जरूर थी कि उसे बदसूरत कहा जा सके। वह इतनी भी बदसूरत नहीं थी कि कोई बदसूरत लड़का उसके साथ पिया-मिलन चौराहे पर खड़ा न हो सके। धीरे-धीरे उसके साथ मेरी बातचीत होने लगी। एक दिन मैं उसे अपनी दोस्त समझने लगी। दूसरे दिन वह भी मुझे अपनी दोस्त समझने लगी। हम दोनों में अक्सर लम्बी-लम्बी बहसें छिड़ने लगीं। कभी वह जीतती तो कभी मैं। बहस करने के लिए मुझे और पढ़ना पड़ता। धीरे-धीरे साहित्यिक उपन्यासों से मेरा परिचय हुआ। मैंने प्रेमचंद को पढ़ा और गाँव को इस तरह जाना जिस तरह मैंने गाँव में रहकर भी नहीं जाना था। मैंने फणीश्वरनाथ रेणु को पढ़ा और गाँव की भाषा को गँवारों की भाषा समझने की मेरी धारणा बदल गई। मैंने हरिशंकर परसाई को पढ़ा और मेरे कटाक्ष ज्यादा नुकीले हो गए। मैंने जयशंकर प्रसाद को पढ़ा और मेरी भाषा संस्कृतनिष्ठ हो गई। पढ़ते-पढ़ते मैं बीए के द्वितीय वर्ष में पहुँच गई।
अमन भी न जाने कैसे एमटेक करने वहीं पहुँच गया। एक दिन शाम को वह मुझसे मिलने आया। हम आटो-रिक्शा में बैठकर अस्सी घाट गए। आटो-रिक्शा पूरा भरा हुआ था इसलिए अमन को मुझसे सटकर बैठना पड़ा। हम अस्सी घाट पर दो घंटे बैठे रहे। अमन ने कहा कभी यहाँ सूरज को निकलते हुए देखना। घाट इतना सुंदर लगता है कि दंग रह जाओगी। मैंने फ़ौरन कहा ठीक है रविवार की सुबह आते हैं। उसका मुँह बन गया। मैं समझ गई कि इसके आने का कारण वह नहीं है जो मैं समझ रही हूँ। सूरज धीरे-धीरे छिप रहा था।
अचानक उसने कहा, ‘तुम्हारी सहपाठी नूतन अपने पास वाले गाँव की है। उसको एक खत देना है। आते-जाते ट्रेन में दो-तीन बार मेरी उससे बातचीत हुई है। अगर तुम यह खत उसे दे दो तो मैं तुम्हारा यह अहसान जीवन भर नहीं भूलूँगा।’
तब मुझे बुद्धिमान लड़कों की चौथी खास बात पता चली। बुद्धिमान लड़के सबसे खतरनाक वार करने से पहले सामने वाले को वहाँ तक लेकर जाते हैं जहाँ सामने वाला सबसे कमजोर होता है। सबकुछ जानते हुए भी मैंने उससे खत ले लिया। इस बार मैं सबकुछ जानते हुए अपनी इच्छा से उसकी सीढ़ी बन गई। उसने मेरे ऊपर पैर रखा और नूतन तक पहुँच गया। मेरी दीदी खूबसूरत थी। नूतन खूबसूरत थी। शायद खूबसूरती बुद्धिमान लड़कों की कमजोरी होती है। जब तक खतों का आदान-प्रदान होता रहा अमन मुझसे मिलता रहा। उसके बाद वह मुझे भूल गया।
धीरे-धीरे मैं फिर से अमन की दुनिया से निकलकर किताबों की दुनिया में चली गई और मेरा कमरा लाइब्रेरी बन गया। कोई मुझसे पूछे कि पढ़ाई में ज्यादा ध्यान कौन देता है तो मैं कहूँगी वह जिसका कोई प्रेमी या प्रेमिका नहीं होता।
पढ़ते-पढते एक दिन मुझे शब्दों की ताकत समझ में आई। मुझे समझ में आया कि शब्दों से कुछ भी किया जा सकता है। शब्दों से आग लगाई जा सकती है। शब्दों से आग बुझाई जा सकती है। शब्द इंसान को राक्षस बना सकते हैं। शब्द राक्षस को इंसान बना सकते हैं। शब्द विश्वयुद्ध का कारण बन सकते हैं। शब्द विश्वयुद्ध खत्म करवा सकते हैं। शब्द ईश्वर को मृत्युलोक में जन्म लेने पर विवश कर सकते हैं। शब्द इंसान को सशरीर स्वर्ग पहुँचा सकते हैं। शब्द क्या नहीं कर सकते?

(८)
मेरी माँ एक दिन एक बदसूरत आदमी के साथ छात्रावास के बाहर मुझसे मिलने आई। मैंने पूछा कि यह आदमी कौन है? वो बोली ये तुम्हारे मामा के दोस्त हैं। लेकिन मैं उसका चेहरा और अपनी माँ की आँखों के भाव देखकर समझ गई कि मेरा बदसूरत डीएनए इसी आदमी के बदसूरत डीएनए से बना है। उस आदमी की आँखों में मेरे लिए अपार स्नेह था। लेकिन मुझे उस आदमी से घृणा थी। तब से घृणा थी जब से मुझे यह अंदाजा हुआ था कि मेरे डीएनए को बनाने में मेरे पिता का डीएनए इस्तेमाल नहीं हुआ। मुझे उसके चेहरे से घृणा थी। मुझे उसकी भाषा से घृणा थी। मुझे उसकी आत्मा से घृणा थी। मुझे अपनी माँ से घृणा थी। मुझे खुद से घृणा थी। यह घृणा पहले मेरी आँखों में उतरी, फिर मेरे चेहरे पर आई। फिर मेरे मुँह से आग की लपटें निकलीं। उसमें मेरी माँ के साथ वह आदमी भी जलने लगा। जलते-जलते वे दोनों मुझसे दूर भागने लगे। फिर वे मेरी नज़रों से ओझल हो गए।
मैं पहले भी कह चुकी हूँ कि बुद्धि मेरी कमजोरी है और वह आदमी जो मेरी बदसूरती का जिम्मेदार था वह काफी बुद्धिमान था। वह जानता था कि मेरे भीतर की घृणा पहले तो आग की लपट बनकर बाहर आएगी, फिर अंगारे बनकर, फिर चिंगारी बनकर, फिर भाप बनकर, फिर गर्म पानी बनकर। यही हुआ भी। वह हर महीने मेरी माँ के साथ आता। मेरा तापमान कम होता हुआ देखता। उसे सहने की कोशिश करता। जब लगता कि फफोले पड़ जाएँगें तो चला जाता। एक दिन मेरे भीतर की घृणा गर्म पानी बनकर निकली। उसका कंधा भीग गया।
उसने मेरे बालों में उँगलियाँ फिराईं। फिर वह, मैं और माँ साथ-साथ एक बड़े होटल में गए। वहाँ होटल के प्रवेश द्वार से लेकर कमरे तक कई लोगों ने उसे सलाम ठोंका तब मैं समझ पाई कि वह बहुत बड़ा आदमी है। वहाँ मैंने जीवन में पहली बार डोसा खाया। पहले थोड़ा अजीब लगा फिर अच्छा लगा। फिर मैं माँ को रेलवे स्टेशन छोड़कर छात्रावास वापस आ गई। यह घटना कई बार घटी। फिर एक दिन वह अकेला आया। हम होटल गए। खाना खाया। खाना खाने के दौरान देश-दुनिया की चर्चा की। फिर वह अक्सर अकेले आने लगा।
एक दिन उसने मुझसे पूछा, ‘बीए करने के बाद क्या करने का इरादा है।’
मैंने कहा, ‘एमए में दाखिला लूँगी और प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी करूँगी।’
वो बोला, ‘तुम इतनी बुद्धिमान नहीं हो कि प्रशासनिक सेवाओं में चुन ली जाओ।’
मैंने कहा, ‘अगर प्रशासनिक सेवाओं में नहीं चुनी गई तो पीएचडी करके लेक्चरर बन जाऊँगी।’
उसने पूछा, ‘लेक्चरर बनकर क्या करोगी?’
मैंने कहा, ‘क्या करोगी क्या मतलब? देश का भविष्य बनाने में अपना योगदान करूँगी।’
वह हँसा। जोर से हँसा। देर तक हँसता रहा। शायद हँसी भी अनुवांशिक होती है।
जी भर कर हँस लेने के बाद उसने कहा, ‘लगता है तुमने किताबें बहुत पढ़ ली हैं।’
मैं चकित रह गई। इसे कैसे पता चला? मेरा सिर अपने आप सहमति में हिला।
वह बोला, ‘किताबों में खूबसूरत कल्पनाएँ और आदर्शवादी स्वप्न मिलते हैं। सच किताबों में नहीं होता। जानती हो लक्ष्मी को कमल पर बैठी क्यों दिखलाया जाता है।’
मैंने कहा, ‘विष्णु पुराण के अनुसार वो कमल की तरह कोमलांगी और सुंदर हैं इसलिए।’
वह फिर हँसने लगा। जब शांत हुआ तब बोला, ‘नहीं। सच बात तो यह है कि कमल हमेशा कीचड़ में ही खिलता है और बिना कीचड़ में उतरे कमल को बाहर नहीं निकाला जा सकता। उसी तरह लक्ष्मी को हासिल करने के लिए आत्मा को कीचड़ में सानना पड़ता है। लक्ष्मी कमल पर विराजती हैं क्योंकि दोनों का कीचड़ से बड़ा गहरा संबंध है। बुद्धिमान व्यक्ति यह जल्द ही समझ जाते हैं कि लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए कीचड़ में उतरना आवश्यक है। इस सच का पता हमारे पूर्वजों को हजारों साल पहले चल गया था लेकिन किताबों में ऐसा सच नहीं लिखा जा सकता इसलिए इस सच का स्थान एक खूबसूरत कल्पना ने ले लिया।’
मैं उसकी तर्क-शक्ति पर चकित रह गई। अब मुझमें यह जानने की उत्सुकता होने लगी कि यह बुद्धिमान आदमी आखिर मुझ जैसी बदसूरत लड़की से चाहता क्या है। यह मेरी माँ से विवाह करने या मुझे अपनी बेटी घोषित करने से तो रहा। कुछ देर तक दिमाग लड़ाने के बाद आखिरकार तंग आकर मैंने पूछ ही लिया, ‘आप मुझसे क्या चाहते हैं?’
तब बुद्धिमान व्यक्तियों की पाँचवी खासियत का मुझे पता चला। ऐसे व्यक्ति यह अच्छी तरह जानते हैं कि कब उन्हें बात को सीधे-सीधे कहना है और कब तक उसको घुमा-घुमा कर जलेबी बनाते रहना है। वह बोला, ‘मैंने शादी नहीं की पर मुझे इस बात का कोई अफ़सोस नहीं है। राजनीति की इस भागदौड़ में यदि मैं शादी कर भी लेता तो भी अपने परिवार को समय नहीं दे पाता। जो लोग विवाह और राजनीति एक साथ निभाने की कोशिश करते हैं वे दरअसल राजनीति और परिवार दोनों से दगा करते हैं। मैंने जो पार्टी गठित की है उसमें ऐसा कोई नहीं है जो मेरे बाद पार्टी को सँभाल सके। मेरी कोई जायज औलाद नहीं है जिसके हाथ में पार्टी की बागडोर सौंपकर कम से कम मैं इतना तो निश्चिंत हो जाऊँ कि पार्टी का अच्छा-बुरा जो होगा वह मेरी औलाद के किए ही होगा। कोई पराया आकर तो मेरी इस वर्षों की मेहनत पर पानी नहीं फेरेगा। अब ले-दे कर एक तुम ही बचती हो। मैं चाहता हूँ कि तुम पार्टी की कार्यकर्ता बन जाओ। धीरे-धीरे मैं तुम्हें पार्टी अध्यक्ष बना दूँगा। एक न एक दिन तो हमारी पार्टी चुनाव जीत ही जाएगी तब तुम आसानी से मुख्यमंत्री बन सकती हो।’
ओह तो यह कारण था। यानि एक बार फिर मैं सीढ़ी बन जाऊँ। एक और बुद्धिमान व्यक्ति के सपनों को आसमान तक पहुँचाने के लिए। मैंने फौरन कहा, ‘नहीं मैं राजनीति में नहीं आउँगी। मुझे धन की नहीं ज्ञान की भूख है। मैं कीचड़ में नहीं उतरूँगी।’
वह बोला, ‘ये ज्ञान-व्यान, आदर्श-वादर्श सब सिर्फ़ तुम्हारा भ्रम है। जानती हो ईमानदार अधिकारी किसी एक जिले में साल भर भी नहीं टिकता। उसकी सारी जिंदगी ट्रांसफ़र में अपना सामान लदवाकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने में ही बीत जाती है। ऐसे में अब शायद ही कोई है जो ईमानदारी से अपना काम करता है। तो अंत में होता यह है कि जिन्हें सब देश की सर्वश्रेष्ठ परीक्षा से आए हुए सर्वश्रेष्ठ इंसान समझते हैं वे पदोन्नति और तबादले के लिए जीवन भर मंत्रियों और विधायकों के तलवे चाटते रहते हैं। उनमें से जिनकी जबान ज्यादा लंबी होती है और जो ज्यादा अच्छी तरह से तलवे साफ कर पाते हैं उनको पदोन्नति देते-देते सचिव वगैरह बना दिया जाता है। यह आदत कुछ लोगों को इस कदर लग जाती है कि सेवानिवृत्ति के बाद भी ये चाटने के लिए तलवे ढूँढते रहते हैं और ऐरी-गैरी नत्थू-खैरी समितियों के सदस्य बनकर सरकार को उसकी मनमाफ़िक रपट देने का काम करते हैं। यह हाल तो इस देश की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं का है। आम आदमी की तो बात ही मत पूछो। हर बुद्धिमान व्यक्ति आम आदमी का उपयोग अपने लिए और सुविधा इकट्ठी करने में करता है। धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र और भी न जाने कौन-कौन से नाम लेकर बुद्धिमान आदमी अपने फायदे के लिए आम आदमी का प्रयोग करता है। कोई पूछे कि धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र इत्यादि के नाम पर झगड़ा करके आखिर आम आदमी को क्या फायदा होता है। इसका फ़ायदा तो बुद्धिमान आदमी ही उठाता है। मैं इन्हें जाति के नाम पर भड़काता हूँ। इनसे कहता हूँ कि इतिहास में हमेशा से तुम्हारा शोषण होता आया है। अब समय है जागो और अपना हक माँगो। हमें वोट देकर शासन में ले आओ हम तुम्हारी आवाज संसद में उठाएँगें। इस बात को मैं बार-बार दुहराता रहूँगा तो एक दिन इन्हें यकीन हो जाएगा कि मैं ही इनका सबसे बड़ा शुभचिंतक हूँ। एक बार सत्ता मेरे हाथ लग जाय उसके बाद तो मेरे नाते-रिश्तेदारों की सात पुश्तों को भी कोई काम करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। तुम सोचने के लिए थोड़ा समय ले लो। अगर दुनिया के सबसे गंदे इंसानों के तलवे चाटना हो तो तुम्हारी मर्जी वरना अगर तुम चाहती हो कि जो तुम्हारे हिसाब से देश की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा है वे तुम्हारे तलवे चाटें तो पार्टी ज्वाइन कर लो। जानती हो तमाम बड़ी-बड़ी पाटिNयों के बड़े-बड़े विधायक, नेता, मंत्री जो बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, इन सबके चरित्र इतने गंदे हैं कि अगर इनकी सच्चाई जान लो तो तुम इन पर थूकना भी पसंद न करो। प्रशासनिक अधिकारी बनकर इनके नीचे काम करना तो बहुत दूर की बात है।’
अब मुझे बुद्धिमान व्यक्तियों की छठी खासियत का पता चला। अपने भीतर की सारी गंदगी इन्हें अमृत से भी ज्यादा स्वादिष्ट और असरदार लगती है। ये अपनी आत्मा को शब्दों से संतुष्ट करना जानते हैं। अपने गलत से गलत काम को भी तर्कों द्वारा सही ठहराने का मंत्र जानते हैं। मैं उठी और वहाँ से चली आई।

(९)
न जाने कितने सालों तक मैंने किताबों के अलावा किसी और की सूरत भी नहीं देखी। एक दिन मैं सिविल सेवा की प्रारंभिक परीक्षा में पास हो गई लेकिन कुछ महीने बाद मुख्य परीक्षा में फ़ेल हो गई। अगली बार मैंने दोनों परीक्षाएँ पास कीं और साक्षात्कार तक पहुँची। वहाँ मैंने सभी सवालों के सही-सही जवाब दिए फिर भी मेरा चयन नहीं हुआ। अगली बार मैं साक्षात्कार से पहले साक्षात्कार सिखाने वाले एक कोचिंग सेंटर में गई। वहाँ मुझे सिखाया गया कि साक्षात्कार में नंगा सच नहीं बोला जाता। पहले उसे खूबसूरत कपड़े पहनाए जाते हैं फिर उसे साक्षात्कार लेने वालों के समक्ष पेश किया जाता है। उसके बाद एक-एक करके उसके इतने कपड़े उतारे जाते हैं कि साक्षात्कार लेने वालों का भरपूर मनोरंजन हो सके और सच अश्लील भी न लगे। आखिरी कपड़ा उसके शरीर पर छोड़ दिया जाता है ताकि साक्षात्कार लेने वालों का अहंकार यह सोचकर तुष्ट हो सके कि सच को नंगा आज तक सिर्फ़ उन्होंने ही देखा है। मैंने यही किया और मेरा नाम महिलाओं की वरीयता सूची में चौथे स्थान पर रहा। मैं बहुत खुश हुई।
शुरू-शुरू में मुझे साँस लेने की भी फ़ुर्सत नहीं थी। इतना काम था कि दिन कब गुजर गया पता ही नहीं चलता था। एक दिन में कितनी सारी फ़ाइलें साइन करनी पड़ती थीं और कितनी सारी बैठकें करनी पड़ती थीं। एक दिन मुझे महसूस हुआ कि मेरे नए और लड़की होने का फायदा उठाकर ऐसे फालतू मामले भी मेरे पास लाए जा रहे हैं जिन्हें निचले स्तर पर ही सुलझाया जा सकता है। दूसरे दिन मैंने ज्यादातर काम नीचे के अधिकारियों में बाँट दिए तब जाकर मुझे कुछ राहत मिली।
एक दिन मैं अपने कार्यालय में बैठी उच्चतम न्यायालय का एक आदेश पढ़ रही थी। तभी फोन की घंटी बजी। मेरे सचिव ने फोन पर बताया कि मेरी एक मित्र मुझसे मिलना चाहती हैं। मैंने पूछा, ‘कौन मित्र।’ सचिव ने नाम बताया तब मेरे दिमाग की घंटी बजी। बीए करने के दौरान जो मेरी एकमात्र मित्र थी वह अंदर आई। उसे देखते ही मेरे मुँह से पहला प्रश्न यही निकला, ‘अरे तुम यहाँ कैसे?’
उसने कहा, ‘मेरे पति स्टेट बैंक में प्रबंधक हैं। एक महीने पहले उनका तबादला इस शहर की मुख्य शाखा में हो गया। हम एक हफ़्ते पहले ही अपने साजो-सामान के साथ यहाँ आए हैं। मैं बाल-सुधार नामक एक एनजीओ में कार्य करती हूँ। हमारा काम घर से भागे हुए, अन्य कारणों से भटके हुए, मानसिक रूप से कमजोर अथवा मानसिक रूप से चोटिल बच्चों की काउंसलिंग करके उन्हें वापस घर पहुँचाना या उनमें समाज में जीने योग्य आत्मविश्वास पैदा करना है। इस संबंध में हमें जिलाधिकारी के निरंतर संपर्क में रहना होता है। यहाँ आई तो दरवाजे पर तुम्हारा नाम देखा। मैं बता नहीं सकती कि तुम्हें यहाँ देखकर मुझे कितनी खुशी हो रही है।’ मैं बोली, ‘मुझे तुमसे भी ज्यादा खुशी हो रही है। चलो, इस शहर में कोई तो पुरानी जान-पहचान वाला मिला।’ वह बोली, ‘आज का डिनर हमारे साथ करो।’
मैं बोली, ‘ठीक है।’
रात को मैंने उसके घर पर डिनर किया। हमने पुराने दिन याद किए। उसने कहा, ‘तुम इतना पढ़ती थी कि मुझे मालूम था तुम एक न एक दिन कुछ बनकर दिखाओगी।’
मैं समझ नहीं पाई कि मैं आखिर ऐसा क्या बन गई हूँ जिस पर मुझे नहीं बल्कि इसे गर्व हो रहा है। दिन भर फ़ाइलें साइन करने और बैठकें करने के अलावा मैं और क्या करती हूँ। तब मेरे बाप की एक बात मेरे दिमाग में बिजली की तरह कौंधी ‘अपनी मर्जी से तो तुम रूटीन वर्क के अलावा और कुछ नहीं कर पाओगी।’ अब तक मैंने सारा काम अपनी मर्जी से ही किया था और वह सारा का सारा रूटीन वर्क ही था।

(१०)
एक दिन एक बड़ी पार्टी की एक छोटी सी कार्यकर्ता मरणासन्न अवस्था में शहर के बाहर नहर के किनारे पड़ी मिली। उसे जिला अस्पताल में भरती करवा दिया गया। उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था। होश में आने पर उससे पूछताछ की गई मगर कोई नतीजा नहीं निकला। कभी वह कहती थी कि सड़क पर चलते-चलते अचानक बेहोश होकर गिर गई थी और उसके बाद क्या हुआ उसे कुछ याद नहीं। कभी कहती थी कि वह घर में सो रही थी तभी अचानक उसे लगा कि उसकी नाक पर कुछ रख दिया गया है और उसके बाद उसे कुछ याद नहीं। कभी कहती थी कि कालेज के बाथरूम में उसे चक्कर आ गया था उसके बाद उसे कुछ याद नहीं। जितनी बार उसका बयान लिया जाता एक नई कहानी सामने आती। अंत में सबने यही निष्कर्ष निकाला कि यह पागल हो गई है और इसी पागलपन में इधर-उधर भटक रही थी कि कुछ लोगों ने इसके पागलपन का फायदा उठा लिया। किसी के भी विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज नहीं हो हुई और बात आई-गई हो गई।
कुछ दिनों बाद मेरी दोस्त मेरे दफ़्तर आई। उसके चेहरे से लग रहा था कि वह बहुत तनाव में है। मेरी तरफ झुककर फुसफुसाते हुए उसने जो कुछ भी बताया उसका सार यह है।
एक बड़ी पार्टी की एक छोटी सी कार्यकर्ता पार्टी अध्यक्ष के बेटे की ढेर सारी प्रेमिकाओं में से एक थी। इस बात से न तो उस छोटी सी कार्यकर्ता को कोई ऐतराज था न किसी और को। मगर अध्यक्ष के बेटे का प्रेम करने का तरीका दिनों-दिन गंदा होता जा रहा था। एक दिन अध्यक्ष के बेटे ने ऐसी माँग की जिसे पूरा करने से छोटी सी कार्यकर्ता ने इनकार कर दिया। इसके बाद अध्यक्ष के बेटे ने उसके साथ जबरदस्ती वही सब कुछ किया। अध्यक्ष के बेटे का बुखार उतरने के बाद छोटी सी कार्यकर्ता ने कहा, ‘मेरे साथ शादी करो वरना मैं पुलिस के पास जाती हूँ। अपने गुनाह का सबूत तुमने खुद अभी-अभी मेरे भीतर छोड़ा है।’
अध्यक्ष के बेटे को गुस्सा आ गया। उसने अपने पालतू चमचों से कहा, ‘इसके भीतर इतने सबूत डाल दो कि मेरा वकील इसे वेश्या साबित कर दे।’
तब छोटी सी कार्यकर्ता को पता चला कि वह कितनी छोटी है और पार्टी अध्यक्ष का बेटा कितना बड़ा। उसे तो इसी बात का आश्चर्य हो रहा था कि वह जिंदा कैसे बच गई। मेरी सहेली ने बड़ी मुश्किल से घंटों की बातचीत के बाद किसी को भी न बताने की शर्त पर उससे यह जानकारी प्राप्त की। यह सब सुनकर गुस्से में मेरा खून खौल उठा। पुरुष जाति के प्रति मेरी नफ़रत एकाएक बहुत बढ़ गई। मैं अपनी सहेली के साथ अस्पताल में जाकर उससे मिली। मैंने उससे कहा कि मैं तुम्हें पुलिस प्रोटेक्शन दिलवा दूँगी चिंता मत करो अपना सही बयान दर्ज करवा दो। मेरे सामने ही एसपी साहब ने खुद उसका सही बयान दर्ज किया और पार्टी अध्यक्ष के बेटे के विरुद्ध एफ़आईआर भी दर्ज की। उसी दिन पार्टी अध्यक्ष का बेटा गिरफ़्तार कर लिया गया।
अगले दिन बहुत सारी घटनाएँ एक साथ हुईं। मेरा ट्रांसफ़र आर्डर आ गया। जिस लड़की की हालत में सुधार हो रहा था उसकी हालत एकाएक बिगड़ने लगी। दिन भर वह पता नहीं क्या अंट-शंट बकती रही और शाम को चल बसी। पंचनामे की रपट के अनुसार आंतरिक रक्तश्राव ज्यादा होने की वजह से उसकी मृत्यु हुई। डॉक्टर की रिपोर्ट में लिखा गया था कि अपने अंतिम दिनों में वह विक्षिप्त हो चुकी थी जो इतना गहरा मानसिक सदमा लगने से अक्सर हो जाता है अतः उसके द्वारा दिया गया कोई भी बयान एक पागल के प्रलाप से अधिक कुछ भी नहीं है। मेरी सहेली की छोटी सी कार एक बड़े से ट्रक से टकरा गई। उसकी जान बच गई मगर एक पैर काटना पड़ा। ट्रक ड्राइवर गिरफ़्तार हुआ फिर जमानत पर छूट गया।
दूसरे दिन अध्यक्ष के बेटे ने न्यायालय में हलफ़नामा दिया कि वह बहुत ही चरित्रवान बेटा है और इस देश के भविष्य को सोने का मुलम्मा चढ़ाकर सुनहरा वही बनाएगा। छोटी सी कार्यकर्ता के द्वारा दिए गए बयान का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि यह बयान उसने पागलपन में दिया था।
न्यायलय ने उसकी रिहाई का हुक्म जारी किया और पुलिस को चेतावनी दी कि आगे से ऐसे इज्जतदार बेटे और देश के भविष्य पर इस प्रकार के झूठे इल्जाम न लगाए जाएँ।
सिर्फ़ एक काम मैंने रूटीन वर्क से हटकर किया और यह हालत हो गई। मेरा बाप ठीक ही कहता था। मगर मेरे जिस्म में खून का खौलना और तेज हो गया था। गर्मी खून से माँस में, माँस से त्वचा पर आ रही थी और मेरे पूरे शरीर में आग लगी हुई थी। अगले दिन मैंने इस्तीफ़ा दे दिया। बाप के पास गई और उसकी पार्टी ज्वाइन कर ली।
उसने कहा, ‘मुझे पहले से ही पता था कि यही होने वाला है।’
मैंने कहा, ‘मैं एक बड़ी पार्टी के अध्यक्ष के बेटे के खिलाफ़ प्रेस में एक बयान देना चाहती हूँ।’
उसने चौंककर कहा, ‘क्या?’
मैंने उसे पूरी कहानी सुनाई। सुनकर वह बोला, ‘यह सब तो मुझे भी पता है। उस लड़के के और भी कई राज मुझे पता हैं। यही नहीं इस देश की अधिकांश पाटिNयों के अधिकांश नेताओं के ऐसे-ऐसे कुकर्मों का मैं राजदार हूँ जो मीडिया के सामने आ जाएँ तो इन नेताओं को या तो आजीवन जेल में गुजारना पड़े या आत्महत्या करनी पड़े।’ मैंने कहा, ‘तो आप यह सब मीडिया को बताते क्यों नहीं।’
उसने कहा, ‘जिस तरह मैं उनके राज जानता हूँ उसी तरह वे मेरा और मेरी पार्टी के नेताओं का राज जानते हैं। इस हमाम में हम सब नंगे हैं इसलिए कोई एक, दूसरे को नंगा नहीं कह सकता। तुम क्या समझती हो कि मेरे विरोधी यह नहीं जानते कि तुम मेरी बेटी हो। यह बात सबको पता है। तुम इतने दिन उस शहर में रही पर क्या कोई नेता तुम्हारे पास अपना काम करवाने आया? सोचो क्यों नहीं आया? यह भी सोचो कि तुम औसत दिमाग की होते हुए भी प्रशासनिक सेवाओं की वरीयता सूची में चौथे स्थान पर कैसे आ गई। बेहतर होगा कि तुम इस मामले को भूल जाओ और पार्टी के क्रियाकलापों पर ध्यान दो। आने वाले दस पंद्रह वर्षों में मैं तुम्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी पर देखना चाहता हूँ।’
दूर से देखने पर आसमान कितना खूबसूरत लगता है। पर कभी आसमान पर जाकर देखिए चारों तरफ अँधेरा ही अँधेरा नज़र आएगा। आसमान से भी बड़ा भ्रम इंद्रधनुष पैदा करता है। इंद्रधनुष आसमान के ठहरे हुए आँसुओं से छिटकता हुआ प्रकाश है। इस तमाम की तमाम खूबसूरती को पास से जाकर देखिए आपको खूबसूरती और बदसूरती में कोई अंतर नज़र नहीं आएगा। सब प्रकाश में छुपे हुए रंगों द्वारा रचा गया मायाजाल है।

(११)
एक बार कीचड़ के दलदल में गिरने के बाद आप निकलने के लिए जितना ज्यादा जोर लगाते हैं उतना ही तेजी से उसमें धँसते चले जाते हैं। कीचड़ में डूबकर कीड़े की मौत मरने से तो अच्छा है कि कमल पर बैठी लक्ष्मी के पाँव पकड़ लिये जाएँ और जीवित रहा जाय। यही सोचकर मैंने भी अंत में कमल पर बैठी लक्ष्मी के पाँव पकड़ लिए।
मुझे परिस्थितियों के साथ समझौता करने में थोड़ा समय लगा लेकिन आखिरकार मैंने समझौता कर ही लिया। मेरे पास और कोई विकल्प भी तो नहीं था। इस हालत में कुछ करना आत्महत्या करने जैसा होता और जीवन तो तुच्छ से तुच्छ जीव को भी प्यारा लगता है।
समझौता करने के बाद मेरे दोस्तों और समर्थकों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ने लगी। दुनिया को मैं कम बदसूरत लगने लगी। पार्टी के कार्यकर्ता मुझे दीदीजी कहकर बुलाने लगे। अब मैं सावधानी से कपड़े चुनकर पहनती थी और अक्सर महिला कार्यकर्ताओं से मुझे यह सुनने को मिलता था कि फलाँ कपड़ा मुझ पर बहुत सूट कर रहा है, फलाँ कपड़े का रंग मुझ पर बहुत खिल रहा है इत्यादि। पुरुषों की नज़रों में भी मैंने अपने लिए बदलाव महसूस किया। बचपन से जो घृणा और उपेक्षा की दृष्टि मैं झेलती आई थी वह अब लगभग खत्म हो गई थी। खासकर उन लोगों की आँखों में जो मुझे जानने-पहचानने लगे थे। कुछ समय बाद मुझे शक होने लगा कि मैं धीरे-धीरे खूबसूरत होती जा रही हूँ। मगर आईना इसका उल्टा ही दिखा रहा था। आईने में मेरा प्रतिबिम्ब दिन-ब-दिन बदसूरत होता जा रहा था।
मेरे बाप ने मुझे पार्टी के विभिन्न पदों से गुजारते हुए अंत में पार्टी का उपाध्यक्ष बना दिया। एक दिन मेरे बाप को दिल का दौरा पड़ा और वो नर्क के रास्ते पर रवाना हो गया। उसके स्थान पर मुझे पार्टी का अध्यक्ष चुन लिया गया क्योंकि मेरे बाप के सारे विश्वासपात्र चमचों को पता था कि वह मेरा बाप था। मुझे न चाहते हुए भी उसके लिए रोना पड़ा। उसकी तस्वीरें पार्टी के कार्यालयों में लगवानी पड़ीं।
समय बीतता गया और धीरे-धीरे मैं सारी दुनिया की दीदीजी हो गई। एक तो मेरी सूरत उस पर मेरी हैसियत, इन दोनों ने मिलकर सारी दुनिया की नज़रों और भावनाओं को मेरे लिए पवित्र बना दिया। अक्सर अकेले में मुझे अमन की याद आती थी और मैं रोने लगती थी। फिर आँसू धीरे-धीरे कम होना शुरू हो जाते थे और गुस्सा बढ़ने लगता था। मैं सोचने लगती थी कि एक दिन ऐसा जरूर आएगा जब मेरे पास ताकत होगी और जिस दिन मेरे पास ताकत होगी मैं अमन का उसी तरह इस्तेमाल करूँगी जिस तरह उसने मेरा किया था। आखिरकार एक दिन मैं मुख्यमंत्री बन ही गई। उस दिन जरूर मेरा बाप नर्क में खुशी से फूला नहीं समा रहा होगा। मुख्यमंत्री बनने के बाद मैंने अमन की खोज करवानी शुरू की। पता चला वह अमेरिका में है और वर्तमान में किसी ऐसी कंपनी में काम रहा है जो निजी इस्तेमाल के लिए अंतरिक्ष यान बनाने में लगी हुई है। अमन मेरी पहुँच से बहुत दूर जा चुका था। मैं अपनी तमाम ताकत का इस्तेमाल करने के बावजूद भी उससे बदला नहीं ले सकती थी। मैंने अपना गुस्सा निकालने के लिए राज्य भर में प्रशासनिक अधिकारियों के तबादले करने शुरू कर दिए। अगले एक महीने तक हर रोज किसी न किसी का तबादला करती रही। कितने ऐसे अधिकारी भी थे जिनकी केंद्र तक पहुँच थी। जो बड़ी पाटिNयों के बड़े नेताओं के तलवे चाटते थे। पर मुझे किसी बात की परवाह नहीं थी। एक-दो बार लोगों ने मेरी जान लेने की कोशिश भी की पर उन्हें शायद यह नहीं पता था कि मुझे मरना होता तो मैं बचपन में ही मर गई होती।
अगले चुनावों में मेरी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। नहीं मिला तो न सही, मेरे सारे रिश्तेदारों ने एक बार में ही इतना कमा लिया कि उनकी सात पुश्तों को कुछ करने की जरूरत नहीं थी। मैंने भी बड़े-बड़े उद्योगपतियों से पार्टी फ़ंड में इतना धन जमा करवा लिया कि चार-पाँच चुनावों तक हाथ-पैर हिलाने की कोई जरूरत नहीं थी और इतना तो निश्चित था कि आने वाले पाँच चुनावों में मैं कभी न कभी तो फिर मुख्यमंत्री बन ही जाऊँगी। आजकल मैंने आईना देखना छोड़ दिया है। आईना बदसूरत लड़कियों से हमेशा झूठ बोलता है। जब तक वे बदसूरत रहती हैं तब तक उनका प्रतिबिम्ब खूबसूरत बनाता है। जब कोई बदसूरत लड़की मेरी तरह अपने दम पर खूबसूरत बन जाती है तो उसका प्रतिबिम्ब बदसूरत बनाने लगता है।

समाप्त

 

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