कहानी : होलिका   Leave a comment

प्रथमोध्याय : अनुमोदन

यमराज के दरबार में कई युगों से एक मुकदमा लटका हुआ है। कारण है पर्याप्त जानकारी एवं सबूतों का अभाव। यमराज कई बार सोचते हैं कि अपराधिन को नर्क भेजकर जैसे तैसे मामले को निपटा दिया जाय मगर दिक्कत ये है कि उन्हें अपने फैसलों के लिए श्रीभगवान को जवाब देना पड़ता है। एक गलत फैसला और लगा भगवान के नाम पर बट्टा। यूँ ही तो नहीं कहा जाता कि भगवान के घर देर है अंधेर नहीं।

युगों पहले जब मुकदमा आया था तो सभी सबूत एवं गवाह अपराधिन के विरुद्ध थे मगर जब अपराधिन का अचूक ‘लाई डिटेक्टर टेस्ट’ किया गया तब पता चला कि स्वयं के निर्दोष होने के बारे में वह सच बोल रही थी। मगर लोगों की भावना के विरुद्ध केवल अपराधिन के बयान के आधार पर फैसला सुनाने को यमराज ने ठीक नहीं समझा। आखिर वो इतनी महत्वपूर्ण गद्दी पर इतने युगों से ऐसे ही थोड़े जमे हुए थे।

फिर देवताओं की एक जाँच समिति बनाई गई और मामला उसे सौंप दिया गया। समिति ने सारे सबूतों का दुबारा और भी ज्यादा गहनता से अध्ययन किया तथा सारे गवाहों के दुबारा बयान लिए कि कुछ नया पता चले मगर अंत में वही ढाक के तीन पात। समिति ने अपनी जाँच रिपोर्ट अभी कुछ ही दिन पहले यमराज को सौंपी थी। यमराज ने जब देखा कि अंत में फिर से बॉल उनके ही कोर्ट में आ गई है तो वो कुछ बेचैन हुए। कई रातों तक सोच सोचकर उन्हें नींद नहीं आई। आखिरकार उन्होंने माँ सरस्वती का ध्यान किया और उन्हें एक स्वर्ण-हंस देने का वायदा किया तो एक रात उन्हें उपाय सूझ गया और उस रात वो चैन की नींद सोए।

अगले रोज वो रिपोर्ट लेकर श्री भगवान के पास पहुँचे। श्री भगवान अपने दफ़्तर में दोपहर का भोजन करने के पश्चात झपकी ले रहे थे। उनके पीए ने यमराज को वस्तुस्तिथि से अवगत कराया तो यमराज भी बाहर पड़े सोफे पर अधलेटे से हो गए और धीरे धीरे निद्रा देवी उन्हें अपनी बाहों में भरने की कोशिश करने लगीं। थोड़ी देर बाद चाय माता ने प्रवेश किया तो निद्रा देवी शर्माकर भाग गईं और पीए ने बताया कि श्री भगवान का बुलावा आ गया है। यमराज ने जल्दी जल्दी चाय खत्म की और रिपोर्ट बगल में दबाकर श्री भगवान के पास पहुँचे। चाय की एक चुस्की लेते हुए श्री भगवान बोले, “आओ यमराज बैठो। बताओ कहाँ हस्ताक्षर करना है?”

“प्रभो हस्ताक्षर बाद में करवाऊँगा पहले मैंने सोचा कि मामले से आपको अवगत करा दूँ। वो होलिका वाले मामले में मैं सोच रहा हूँ कि अग्नि देव का भी बयान लिया जाय।”

“क्या बात कर रहे हो, धरती वासियों के किसी भी मामले में देवताओं का बयान हमारे संविधान के विरुद्ध है।”

“प्रभो मामला नाजुक है। होलिका कहती है वो निर्दोष है और ‘लाई डिटेक्टर टेस्ट’ कहता है वो सच बोल रही है। सारे सबूत और गवाह उसके खिलाफ हैं। उसे नर्क भेजते हैं तो अंधेर करने से दुर्वासा के श्राप के कारण आपको गद्दी छोड़कर इंसान बनना पड़ेगा और अगर स्वर्ग भेजते हैं तो लोग आपके सारे पुराने किस्से कहानियों को शक की निगाह से देखने लगेगें। कालान्तर में वो आपकी पूजा करना बंद भी कर सकते हैं। उस स्थिति में भी बहुमत न होने से आपकी सरकार गिर जाएगी। संकट घनघोर है प्रभो।”

“तो क्या किया जाय।”

“संविधान में संशोधन किया जाय और अग्नि देव का बयान दर्ज करवाया जाय। आखिर आग की लपटों के बीच होलिका ने क्या किया ये अग्निदेव से बेहतर और कौन जान सकता है। उनके बयान से सबकुछ स्पष्ट हो जाएगा। वो कभी झूठ नहीं बोलते और उनके बयान पर सभी विश्वास करते हैं। आखिर श्री राम और देवी सीता वाले केस में भी उन्होंने बयान दिया ही था।”

“वो मामला धरती का था पर एक देवी पर आरोप लगाए गए थे इसलिए वहाँ संविधान संसोधन की आवश्यकता नहीं थी। बहरहाल दूसरा कोई रास्ता भी तो नहीं है आप संविधान संशोधन की नोटशीट ले आइए।”

“ये लीजिए, यहाँ हस्ताक्षर कर दीजिए।” कहकर यमराज ने नोटशीट, जो वो पहले से ही बनाकर ले आए थे, श्रीभगवान के सम्मुख रख दी।

श्रीभगवान ने मुस्कराकर यमराज की तरफ देखा और बोले, “इतने युगों बाद भी तुममें वही धार बाकी है।”

द्वितीयोध्याय : अग्निदेव

वातावरण किसी हिंदी फ़िल्म में अदालत के सेट जैसा लग रहा था। यमराज ने आकर जज का आसन ग्रहण किया। अग्निदेव को कटघरे में बुलाया गया। होलिका उनके सामने वाले कटघरे में खड़ी थी।

अग्निदेव को गीता की सौगंध दिलवाने के बाद चित्रगुप्त ने प्रश्न पूछना शुरू किया।
“उस दिन जब होलिका ने प्रह्लाद को लेकर अग्नि में प्रवेश किया तो उसके बाद और अग्नि के शांत होने तक क्या हुआ इसकी संपूर्ण जानकारी आप अदालत को दीजिए।”

प्रश्न सुनकर अग्निदेव के मुखपर दर्द की रेखाएँ उभर आईं और वो फ़्लैशबैक में चले गए।

लकड़ियाँ धू धू करके जल रही थीं, ऊँची ऊँची लपटों की तपिश दूर तक महसूस की जा सकती थी। तभी होलिका ने अग्निरोधी कंबल में स्वयं एवं प्रह्लाद को अच्छी तरह लपेटकर उसमें प्रवेश किया। अग्निदेव सोच में पड़े हुए थे कि भगवान का आदेश है अग्निरोधी कंबल और होलिका दोनों भस्म हो जाने चाहिए और प्रह्लाद का बाल भी बाँका नहीं होना चाहिए। मगर ये कंबल तो बड़ा विशिष्ट है इसको भस्म करने के लिए जितना तापमान चाहिए यदि मैं वहाँ तक गया तो प्रह्लाद का बचना भी नामुमकिन हो जाएगा। धर्मसंकट में पड़े अग्निदेव ने लपटें तेज कर दीं और ताप बढ़ना शुरू हो गया। जैसे ही कंबल ने आग पकड़ी अग्निदेव की आँखों के सामने एक विचित्र घटना घटी। अचानक होलिका कंबल से बाहर आ गई और उसने कंबल में लिपटे प्रह्लाद को कस कर अपनी बाहों में भर लिया। कुछ ही क्षणों में होलिका जलकर भस्म हो गई। अग्निदेव की आँखें आश्चर्य से फटी रह गईं। बहरहाल अग्निदेव की चिंता दूर हो गई क्योंकि भगवान का आदेश पूरा हो गया था। होलिका और कंबल जल कर राख हो गए थे और प्रह्लाद का बाल भी बाँका नहीं हुआ था।

अग्निदेव से ये अप्रत्याशित बयान सुनकर चित्रगुप्त के मुँह से ये प्रश्न अपने आप निकल गया, “होलिका ने आखिर ऐसा क्यों किया?”

जवाब में होलिका ने जो कुछ कहा उसका लब्बोलुबाब यह है।
जब होलिका को हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को भस्म करने का आदेश दिया तो उसने इस बात का विरोध किया। उसने कहा कि जिस बच्चे को उसने अपनी गोद में खिलाया है उसे वह भस्म कैसे कर सकती है। उसने हिरण्यकश्यप को मनाने की बहुत कोशिश की पर अंत में हिरण्यकश्यप ने कहा कि अगर होलिका प्रह्लाद को आग से जिंदा बाहर लाई तो वह अपने हाथों से दोनों का सर काट डालेगा। होलिका रात भर सोचती रही अंत में उसे यही उपाय सूझा कि प्रह्लाद को बचाने का एक ही रास्ता है कि वह स्वयं भस्म हो जाय। हो सकता है कि अपनी बहन के भस्म हो जाने पर हिरण्यकश्यप का दिल पिघल जाय और वह प्रह्लाद को मारने का विचार त्याग दे या कम से कम मुल्तवी ही कर दे। इसलिए उसने प्रह्लाद को बचाने के लिए अपनी जान दे दी। पर हाय रे दैव कि आग की ऊँची लपटों में किसी ने भी उसका यह बलिदान नहीं देखा। यह भी होलिका का दुर्भाग्य रहा कि प्रह्लाद की कथा लिखने वाले सब पुरुष थे। उन्होंने एक बार भी ये नहीं सोचा कि होलिका अपने हाथों कैसे अपने नन्हें से भतीजे को भस्म कर सकती है। वो राक्षसी होने के साथ साथ एक स्त्री भी तो है।

होलिका मे मुँह से ऐसा सुनकर सब आश्चर्यचकित रह गए। चित्रगुप्त का मुँह खुला का खुला रह गया। वही हुआ जिसका डर था यानि सदियों से चली आ रही एक कहानी के बदल जाने का डर। अरबों लोगों के सदियों से कायम झूठे विश्वास के टूट जाने का डर। धर्म के सारे के सारे ढाँचे के चरमरा जाने का डर। धर्म ग्रंथों में स्त्री पर लिखी गई हर कहानी पर उँगली उठने का डर। डर बहुत बड़ा था और अनुभवी चित्रगुप्त ने इस डर को यमराज के चेहरे पर फौरन पढ़ लिया। उसने गोली की तरह अग्निदेव पर ये सवाल दागा, ““जब आपने होलिका को कंबल हटाते देखा तो क्या ये नहीं हो सकता कि होलिका प्रह्लाद को बाहर फेंकने जा रही हो मगर तापमान इतना बढ़ चुका था कि कंबल हटाते ही उसकी आँच से होलिका जल मरी और प्रह्लाद श्री भगवान के प्रताप के कारण सुरक्षित रहा।”

अग्निदेव ने कुछ क्षण सोच कर जवाब दिया, “अब होलिका के मन की बात मैं कैसे जान सकता हूँ। आप जो कह रहे हैं वो भी एक विकल्प हो सकता है।”

चित्रगुप्त को मसाला मिल चुका था। उन्होंने तुरंत गियर बदला, “मी लार्ड इस बात को नोट किया जाय कि अग्निदेव ने जो कुछ देखा उससे होलिका निर्विवाद रूप से न तो दोषी साबित होती है न ही निर्दोष। अग्निदेव ने जो कुछ देखा वह सब सच है मगर इनके बयान के बाद भी दोनों विकल्प खुले हुए हैं। मौजूद सबूतों और गवाहों से किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचना नामुमकिन है। अभी इस मामले में और ज्यादा जानकारी की आवश्यकता है। मैं अदालत से ये भी अनुरोध करूँगा कि होलिका का ‘लाई डिटेक्टर टेस्ट’ अवचेतन अवस्था में करने की अनुमति प्रदान की जाय। ऐसे घाघ अपराधी कई बार सामान्य ‘लाई डिटेक्टर टेस्ट’ को भी मात दे देते हैं।”

यमराज ने प्रशंसा भरी निगाहों से चित्रगुप्त को देखा और बोले, “सारे सबूतों और गवाहों के बयान को ध्यान में रखते हुए अदालत इस नतीजे पर पहुँची है कि कोई नतीजा निकाल पाना फिलहाल संभव नहीं है। इसलिए इस मामले को माननीय त्रिदेवों की सर्वोच्च स्तरीय जाँच कमेटी के हवाले किया जाता है। ये कमेटी अग्निदेव के बयान की रोशनी में सामने आए तथ्यों की पुनः जाँच करेगी। अदालत होलिका का ‘लाई डिटेक्टर टेस्ट’ अवचेतन अवस्था में करने की अनुमति प्रदान करती है। मामले की अगली सुनवाई माननीय त्रिदेवों की रिपोर्ट आने के बाद की जाएगी।”

होलिका एक गहरी साँस लेकर रह गई, जब देवों की सामान्य सी जाँच कमेटी ने अपनी रिपोर्ट देने में इतने युग लगा दिए तो माननीय त्रिदेवों की जाँच कमेटी की रिपोर्ट तो शायद कयामत के दिन ही आएगी। पर चलो इस बहाने मैं नर्क में जाने से तो बची रहूँगी। सुना है नर्क का संचालन तालिबानियों के हाथ में सौंप दिया गया है।

तृतीयोध्याय : उपसंहार

शाम को श्री भगवान के दफ़्तर में यमराज और चित्रगुप्त बैठे थे। एक भुना हुआ बादाम मुँह में डालकर चाय का एक घूँट भरते हुए यमराज बोले, “चलिए प्रभो अब आपकी कुर्सी को कोई खतरा नहीं है। चित्रगुप्त जी का इतने युगों की वकालत का अनुभव आखिर काम आ ही गया।”

फिर यमराज ने चित्रगुप्त को संबोधित करते हुए पूछा, “तुम्हें ये विचार आया कैसे कि इस सुलझे हुए मामले को अनंत काल के लिए लटका देना ही एकमात्र विकल्प है।”

चित्रगुप्त के मुखारविंद पर नवोदित अंशुमाली की रक्तिमा छा गई। उन्होंने सर झुकाकर कहा, “प्रभो अब वह समय आ गया है जब हम अपनी इतने युगों की मेहनत से उगाए गए पेड़ का फल खाना शुरू करें। मैं धरती के समाचार पत्र निरंतर पढ़ता रहता हूँ और जिस फैसले से जनता के किसी विशेष वर्ग की भावनाएँ जुड़ी हुई हों उसको अनंत काल तक के लिए लटकाना ही श्रेयस्कर होता है। ये मैंने मानवों से सीखा है।”

चित्रगुप्त के श्रीमुख से ऐसे वचन सुनकर श्री भगवान और यमराज के मुख पर हँसी की एक रेखा दौड़ गई। कुछ क्षण चुप रहकर यमराज बोल उठे, “प्रभो मैंने सरस्वती जी को मामला निबट जाने पर एक सोने का हंस देने का वादा किया था। आप तो जानते ही हैं कि हमारे यहाँ दुर्वासा जी के श्राप के कारण धरती की तरह भ्रष्टाचार हो नहीं सकता। इस महीने मेरा हाथ थोड़ा तंग है। कहीं सरस्वती जी रुष्ट न हो जायँ।”

श्री भगवान बोले, “ठीक है सरस्वती जी के साथ किसी केस में मार्गदर्शन के लिए आप हमारी एक मीटिंग फ़िक्स कीजिए। उसमें उनको बतौर ‘टोकन ऑफ़ एप्रीसियेशन’ एक सोने का मोर दे दिया जाएगा।”

यमराज पुनः बोले, “प्रभो चित्रगुप्त जी इतने सालों से इतनी निष्ठा पूर्वक काम कर रहे हैं मेरे विचार से अब इन्हें वरिष्ठ वकील का पद देने का समय आ गया है।”

“आपने तो मेरे मुँह की बात छीन ली, आप संबंधित नोटशील ले आइए मैं अनुमोदित कर दूँगा।”

यमराज ने तुरंत एक नोटशीट निकालकर श्रीभगवान के सामने रख दी और श्रीभगवान के नाम की तरफ उँगली उठाकर बोले, “प्रभो यहाँ हस्ताक्षर कर दीजिए।”

उधर होलिका को जब यमलोक के कैदखाने की कोठरी की तरफ ले जाया जा रहा था तो एक और लंबित मामले का कैदी, जिससे जनता के वर्ग विशेष की भावनाएँ जुड़ी हुई थीं, मद्दिम सी आवाज में ये गीत गा रहा था।

देख तेरे यमलोक की हालत क्या हो गई इंसान
कितना बदल गया भगवान……….।

समाप्त

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Posted अप्रैल 13, 2012 by ‘सज्जन’ धर्मेन्द्र in Uncategorized

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